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________________ एकत्रिंशत्तमः सर्गः निजसारथिमाजिस्थः समुद्रविजयो जगौ । भद्र ! योधमिमं दृष्ट्वा सस्नेहं मे मनः कुतः ॥१०५॥ दक्षिणाक्षिभुजास्पन्दो बन्धुसंबन्धगन्धनः । युधि बध्यस्य सांनिध्ये वद संबध्यते कथम् ।।१०६।। सुनिमित्तविसंवादो नानुभूतश्च जातुचित् । विरुद्ध देशकालत्वात्संवादोऽपि न युज्यते ।।१०७॥ इत्युक्त सोऽवदत् स्वामिन्नभ्यमित्रमितस्य ते । अवश्यं बन्धुसंबन्धो जितजेयस्य जायते ॥१०॥ परै राजन्नजय्यस्य राजलोकस्य संनिधौ । परस्य विजये पूजा राजाजादवाप्स्यसि ।।१०९।। सोऽभिनन्दिततद्वाच्यः कार्मुकी तं सकार्मुकम् । शरधेः शरमुद्धत्य जगादोतसायकम् ।।११०॥ भी धीर ! ते यथादृष्टं मृधे धनुषि कौशलम् । तथा निर्वहणं तस्य त्वं कुरुष्व ममाग्रतः ॥११॥ शौर्यशैल ! तवोत्तङ्गभानशृङ्गमनावृतम् । आवृणोमि शरैमघैः समुद्रविजयस्त्वहम् ॥११२॥ कुमारः स्वरभेटेन जगौ किं नो बहूदितः । आवयोरिह राजेन्द्र ! रणे व्यक्तिभविष्यति ॥१३॥ समुद्र विजयस्त्वं चेत्संग्रामविजयस्त्वहम् । न चेत्प्रत्येषि तक्षिप्रं क्षिप संधाय सायकम् ॥१४॥ इत्युक्त मुक्तमाध्यस्थ्यो वैशाखस्थानमास्थितः । संधाय शरमाक्रष्य विव्याध क्रोधतो नृपः ॥११५॥ प्रतिक्षिप्तेन स क्षिप्रमाशुगेन तमाशुगम् । दूरादेव च विच्छेद वैशाखस्थानमण्डितः ॥११६॥ मुक्तान्मुक्कान्नृपेणासाविपूनिषुमिराहवे । प्रत्युन्मुक्तरतिक्षिप्रं दूरादेव निराकरोत् ॥११७॥ वायव्यवारुणायैस्तौ दिव्यास्त्रैरत्रकोविदौ । युयुधाते नृदेवानां साधुकारैः स्तुती चिरम् ॥११८॥ समुद्रविजयसे अधिष्ठित रथकी ओर धीरे-धीरे ही चला ॥१०४॥ युद्ध के मैदानमें आनेपर राजा समद्रविजयने अपने सारथिसे कहा कि हे भद्र! इस योद्धाको देखकर मेरा मन स्नेहयक्त क्यों हो रहा है ? ॥१०५।। दाहिनी आँख तथा भुजा भी फड़क रही है जो बन्धुके समागमको सूचित करनेवाली है परन्तु युद्धके मैदानमें जब कि शत्रु सामने खड़ा है इस शकुनकी संगति कैसे बैठ सकती है तुम्हीं कहो ॥१०६।। उत्तम शकुनोंमें विसंवाद-विरोधका कभी अनुभव नहीं किया और देश तथा कालके विरुद्ध होनेसे निमित्तोंका संवाद भी संगत नहीं जान पड़ता ।।१०७।। समुद्रविजयके इस प्रकार कहनेपर सारथिने कहा कि हे स्वामिन् ! अभी आप शत्रुके सामने खड़े हैं जब इसे आप जीत लेंगे तब अवश्य ही बन्धु-समागम होगा ॥१०८।। हे राजन् ! यह शत्र दूसरोंके द्वारा अजेय है अतः इसके जीत लेनेपर आप राजाओंके समक्ष राजाधिराज जरासन्धसे अवश्य ही विशिष्ट सम्मानको प्राप्त करेंगे ॥१०॥ समुद्रविजयने सारथिके वचनोंकी प्रशंसा कर धनुष उठाया और तरकशसे बाण निकालकर धनुष हाथमें ले बाण निकालकर खड़े हुए कुमार वसुदेवसे कहा कि हे धीर! युद्ध में तुम्हारे धनुषका जैसा कौशल देखा है अब मेरे आगे वैसा हो उसका समारोप करो-उसी प्रकारकी कुशलता दिखाते रहो तो जानें ॥११०-१११।। हे शूरवीरताके पर्वत ! तुम्हारा अतिशय उन्नत यह मानरूपी शिखर अभी तक अनाच्छादित है सो मैं बाणरूपी मेघोंसे अभी आच्छादित करता हूँ, मैं समुद्रविजय हूँ ।।११२।। कुमारने आवाज बदलकर कहा कि हे राजेन्द्र ! हम लोगोंको बहुत कहनेसे क्या लाभ है ? युद्ध में ही हम दोनोंकी प्रकटता हो जायेगी-जो जैसा होगा वह वैसा सामने आ जावेगा ।।११३।। यदि आप समुद्रविजय हैं तो मैं संग्रामविजय हूँ। यदि आपको प्रतीति न हो तो शीघ्र ही धनुषपर बाण रखकर छोडिए ॥११४|| वसदेवके इस प्रकार करनेपर जिनकी मध्य छूट गयी थी तथा जो वैशाख आसनसे खड़े थे ऐसे राजा समुद्रविजयने डोरीपर बाण रखकर तथा खींचकर क्रोधवश जोरसे मारा ॥११५।। उधर वैशाख आसनसे सुशोभित वसुदेवने शीघ्र ही बदलेमें चलाये हुए बाणसे समुद्रविजयके उस बाणको दूरसे ही काट डाला ॥११६।। इस प्रकार राजा समुद्रविजयने युद्ध में जितने बाण छोड़े उन सबको बदले में छोड़े हुए बाणोंके द्वारा वसुदेवने बहुत शीघ्र दूरसे ही निराकृत कर दिया ||११७।। तदनन्तर जो अस्त्र-विद्यामें निपुण थे और राजा लोग १. युद्धस्थः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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