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________________ एकत्रिंशत्तमः सर्गः श्वसुरास्तस्य यावन्तः सपुत्रास्तत्र संगताः । वान्धवाश्चापरे लग्ना रुरुदू रणरङ्गगाः ॥ १३१ ॥ जरासंधादयस्तुष्टा दृष्ट्वा भ्रातृसमागमम् । शशंसू रोहिणीं कन्यां तद्भ्रातृपितृबान्धवाः ॥१३२॥ यथास्वं शिबिरस्थानं दिनान्ते ते ययुर्नृपाः । वसुदेवकथासेक्ता निशा निन्युर्दिनान्यपि ॥ १३३ ॥ ततस्तिथौ प्रशस्तायां रोहिणी चन्द्रसंगमे । रोहिणीमुपयेमेऽसौ समुद्र विजयानुजः ॥ १३४ ॥ दृष्ट्वा विवाहमुर्वीशास्तुष्टिपुष्टिसमन्विताः । वर्षं तस्थुर्जरासन्धसमुद्र विजयादयः ॥ १३५॥ कृतसाहाय्यकः संख्ये वसुदेवः सुपूजितः । आपृच्छ्य प्रययौ प्रीतो निजं दधिमुखः पदम् ॥ १३६ ॥ वरो नववधूहारिवक्त्राम्भोजमधुव्रतः । न सस्मार स्मरासक्तः पूर्वं भुक्तवधूलताः ॥ १३७ ॥ शार्दूलविक्रीडितम् प्रादुर्भूतसमस्त भूतलमहाभूपाल लोकैः समं संभूयाद्भुतविक्रमैकशरणप्राणै प्राङ्गणे । प्रारब्धोऽप्यतिलुब्धबुद्धिभिरभूज्जय्यो न यद्दोः सखः शौरिः शौर्यं गिरिजिनोक्ततपसस्तप्तस्य तत्प्राभवम् ॥१३८॥ इत्यरिष्टनेमिपुराण संग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतौ रोहिणीस्वयंवर - भ्रातृसमागमवर्णन नाम एकत्रिंशः सर्गः ॥ ३१ ॥ 0 गये और आदि शेष भाई भी आ सब गले लगकर रोने लगे ||१३०|| उस समय युद्धभूमि में वसुदेव के जितने श्वसुर, साले तथा अन्य बन्धुजन थे वे सब उनसे लिपटकर रोने लगे ||१३१ ॥ जरासन्ध आदि राजा, भाइयोंके इस समागमको देखकर बहुत ही सन्तुष्ट हुए। रोहिणी के भाई, पिता तथा अन्य सम्बन्धी जन उसकी बहुत प्रशंसा करने लगे ||१३२॥ तदनन्तर सायंकाल के समय सब राजा लोग अपने-अपने शिविरोंमें गये और वसुदेवकी ही कथा में आसक्त हो दिन तथा रात्रियाँ व्यतीत करने लगे ॥ १३३॥ तत्पश्चात् शुभ तिथिमें जब कि चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्रपर था वसुदेवने रोहिणीको विधिपूर्वक विवाहा || १३४|| जरासन्ध तथा समुद्रविजय आदि राजा उस विवाहोत्सवको देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए और एक वर्ष तक वहीं राजा रुधिरके यहां रहे आये ||१३५ ॥ युद्ध में जिसने सहायता की थी तथा वसुदेवने जिसका अच्छा सम्मान किया था ऐसा दधिमुख वसुदेवसे आज्ञा लेकर प्रसन्न होता हुआ अपने स्थानपर चला गया ।। १३६ ।। कामासक्त वसुदेव नवीन स्त्रीके सुन्दर मुख कमलके भौंरे बन गये थे इसलिए उन्होंने पहले भोगी हुई स्त्रीरूपी लताओंका स्मरण भी नहीं किया || १३७|| गौतम स्वामी कहते हैं कि देखो शूरवीरताके पर्वत वसुदेव यद्यपि रणांगणमें अकेले ही थे केवल भुजाएँ ही उनकी सहायक थीं और अद्भुत पराक्रमके धारक, अतिशय लोभी पृथिवीतलके समस्त राजाओंने एक साथ मिलकर उन्हें पराजित करना चाहा था तथापि वे उन्हें पराजित नहीं कर सके सो यह अच्छी तरह हुए जिनेन्द्रकथित तपका ही प्रभाव समझना चाहिए || १३८ || इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें रोहिणीका स्वयंवर और भाइयोंके समागमका वर्णन करनेवाला इकतीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥ ३१ ॥ O Jain Education International १. शक्तो म. । २. वसुदेवः स पूजितः । म. वसुदेवेने सुपूजितः शिष्टाचारीकृत इत्यर्थः । ३९९ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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