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________________ अष्टाविंशः सर्गः अतः परं' परं शौरेः शृणु श्रेणिक ! चेष्टितम् । वेगवत्या वियुक्तस्य पुण्यपौरुषयोगिनः ॥१॥ पर्यटन्नटवीं वीरस्तापसाश्रममश्रमः । प्रविष्टोऽपश्यदाविष्टविकथान् तत्र तापसान ॥२॥ राजयुद्धकथासक्ताः यूयं किमिति तापसाः । तापसास्तपसा युक्तास्तपो वाक्संयमादिकम् ॥३॥ इति पृष्टा जगुस्ते तं विशिष्टजनवत्सलाः । नवप्रव्रजिता वृत्तिं मौनी विद्मो वयं न भोः ॥४॥ श्रावस्त्यामस्ति विस्तीर्णय शस्तीर्णमहार्णवः । एणीपुत्र इति क्षोणीपतिरक्षीणपौरुषः ॥५॥ प्रियङ्गुसुन्दरी तस्य दुहिता लोकसुन्दरी । तस्याः स्वयंवराथं तु तेनाहूता वयं नृपाः ॥६॥ केनापि हेतुना कोऽपि न वृतो वृतया श्रिया । कन्यया वन्यहस्तिन्या वन्येतरगजो यथा ॥७॥ भपाः संमय भयांसो विलक्षा लोभलक्षिताः। कन्यापित्रा ततः सत्रा सद्यो योद्धं समुद्यताः ॥८॥ तेन भोः क्षुमितान्याशु सहस्राणि महीभुजाम् । संकोचिानि संग्रामे नेत्राणि रविणा यथा ।।९।। तुङ्गाभिमानिनः केचिद् भङ्गाङ्गीकरणाक्षमाः । रणाङ्गणगता भूपाः प्राणान् सद्यो हि तस्यजुः ।।१०॥ विश्वेऽप्यश्वरवात्तस्मात्सहस्रकरतो वयम् । ध्वान्तोघा इव भीता भोः प्रविष्टा गह्वरं वनम् ।।११।। कुरु धर्मोपदेशं मो धर्मतत्वमजानताम् । त्वं वचोमि वोऽभिलक्ष्यसे ।।१२।। अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! अब तुम वेगवतीसे रहित तथा पुण्य और पुरुषार्थके समागमको प्राप्त वसुदेवका आगेका चरित सुनो ॥१॥ एक दिन बिना किसी थकावटके अटवीमें भ्रमण करते हुए वीर वसुदेवने तपस्वियोंके आश्रममें प्रवेश किया और वहाँ विकथा करते हुए तापसोंको देखा ।।२।। कुमारने उनसे कहा-अये तापसो! आप लोग इस तरह राज-कथा और युद्ध-कथामें आसक्त क्यों हैं ? क्योंकि तापस वे कहलाते हैं जो तपसे युक्त हों और तप वह कहलाता है जिसमें वचन संयम आदिका पालन किया जाय अर्थात् वचनोंको वशमें किया ३॥ इस प्रकार कहनेपर विशिष्ट आगन्तुकसे स्नेह रखनेवाले उन तपस्वियोने कहा कि हमलोग अभी नवीन ही दीक्षित हुए हैं। इसलिए मुनियोंकी वृत्तिको जानते नहीं हैं ।।४।। इसी श्रावस्ती नगरीमें विस्तृत यशसे समुद्रको पार करनेवाला एवं अखण्ड पौरुषका धारक एक एणीपुत्र नामका राजा है ।।५।। उसकी लोकमें अद्वितीय सुन्दरी प्रियंगुसुन्दरी नामकी कन्या है। उसके स्वयंवरके लिए एणीपुत्रने हम सब राजाओंको बुलाया था॥६॥ परन्तु किसी कारणवश, जिस प्रकार वनकी हस्तिनी वनके हस्तीके सिवाय किसी दूसरे हस्तीको नहीं वरती है उसी प्रकार उस शोभासम्पन्न कन्याने किसोको नहीं वरा ||७|| तदनन्तर जो कन्याके लोभसे युक्त थे, परन्तु उसके प्राप्त न होनेसे मन-ही-मन लज्जित हो रहे थे, ऐसे बहुतसे राजा मिलकर कन्याके पिताके साथ शीघ्र ही युद्ध करनेको तैयार हो गये ||८॥ परन्तु जिस प्रकार एक ही सूर्य हजारों नेत्रोंको अकेला हो संकोचित कर देता है उसी प्रकार उस अकेले एणीपुत्रने हजारों राजाओंको शीघ्र ही क्षुभित कर संकोचित कर दिया ||९|| उत्कट अभिमानसे भरे कितने ही राजाओंने जो पराजयको स्वीकृत करने में समर्थ नहीं थे, युद्धके मैदानमें जाकर शीघ्र ही प्राण त्याग दिये ॥१०॥ जिस प्रकार सूर्यसे डरकर अन्धकारके समूह सघन वनमें जा घुसते हैं उसी प्रकार हम सब भी घोड़ोंको हिनहिनाहटसे से डरकर इस सघन वनमें आ घुसे हैं ।।११।। भो महाशय ! हम लोग धर्मका कुछ भी १. श्रेष्ठम् । २. -दाविष्टदिग्वासांस्तत्र क., ग. घ.,ङ,। ३. रणाङ्गीकरणक्षमाः क., भङ्गाङ्गीकरणक्षमाः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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