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________________ ३७४ हरिवंशपुराणे पृष्टस्तथा तथा शौरिस्तेषां धर्म द्विधाभ्यधात् । यतिश्रावकभेदज्ञाः श्रामण्यं ते यथा ययुः ॥१३॥ प्रियङ्गसुन्दरीलाभलोभेन यदुनन्दनः । श्रावस्ती वस्तुविस्तारविश्रु तां तामशिश्रियत् ॥१४॥ बाह्योद्याने च तत्रासो कामदेवगृहऽग्रतः । त्रिपादं कृत्रिमं हेमं महामहिषमक्षत ॥१५॥ पप्रच्छ विप्रमेकं भो किमेष महिषस्त्रिपाद् । निर्मितो रत्ननिर्माणो भाव्यमत्र हि हेतुना ॥१३॥ स प्राहैवमिहैवामूत्पुर्यां भूपतिरार्यकः । इक्ष्वाकुर्जितशत्रुस्तत्पुत्रश्चापि मृगध्वजः ॥१७॥ श्रेष्ठी तु कामदत्तोऽत्र गोष्टं द्रष्टुं गतोऽन्यदा । पपात पादयोस्तस्य कृपणो महिषोऽल्पकः ॥१८॥ ततश्चाश्चर्यकृत् कार्य यथास्वं स्वामिनाऽमुना । पिण्डारी दण्डस्तित्र पृष्टः कारणमब्रवीत् ॥१९॥ उत्पन्नदिन एवास्योपरि करुणा मेऽभवत् । वने दृष्ट्वा मुनि नत्वा पृष्टवान् तमहं पुनः ॥२०॥ अस्योपरि किमर्थ मे करुणा महती मुने । स बमाग मुनिझमी शृणु गोपाळ ! निश्चितम् ॥२१॥ एकस्यामेव चामुष्यां महिष्यामेष जातवान् । पञ्च कृत्वो वराकस्तु जातो जातो हतस्त्वया ॥२२॥ वारे षष्टे तु तनिष्टकनिष्ठस्य तवैषकः । सहसोथार संत्रस्तः पादयोः पतितः शिशुः ॥२३॥ कृपया स मयाऽत्रायं पुत्रवत्परिपालितः । जीवितार्थी तवेदानीं पतितः पादयोरिह ॥२४॥ श्रुत्वैवं कृपया तेन समानीतः पुरीमसौ। अमयं राजलोकेभ्यो लब्ध्वावर्द्धिष्ट मद्रकः ॥२५॥ तत्त्व नहीं जानते। इसलिए आप हम लोगोंको धर्मका उपदेश दोजिए। आपके मधुर वचनोंसे पता चलता है कि आपने धर्मका तत्त्व अच्छी तरह देखा है ।।१२।। इस प्रकार उन सबके पूछनेपर वसुदेवने उन्हें श्रावक और मुनिके भेदसे दोनों प्रकारका धर्म बतलाया जिससे वे मुनि और श्रावकके भेदको अच्छी तरह जानकर यथार्थ साधु अवस्थाको प्राप्त हुए ॥१३॥ तदनन्तर प्रियंगुसुन्दरीके लाभके लोभसे प्रेरित हो कुमार वसुदेवने वस्तुओंके विस्तारसे प्रसिद्ध उस श्रावस्ती नगरीमें प्रवेश किया ॥१४॥ वहाँ उन्होंने बाह्य उद्यानमें कामदेवके मन्दिरके आगे निर्मित तीन पाँवका एक बड़ा भारी सुवर्णमय भैंसा देखा ||१५|| उसे देखकर उन्होंने एक ब्राह्मणसे पूछा कि हे महानुभाव ! यहाँ यह रत्नमयो तीन पाँवोंका भैंसा किसलिए बनाया गया है ? इसका कुछ कारण अवश्य होना चाहिए ।।१६।। ब्राह्मणने कहा कि इस नगरमें पहले शत्रुओंको जीतनेवाला एक इश्वाकुवंशीय जितशत्रु नामका उत्तम राजा था और उसका मृगध्वज नामक पूत्र था ।।१७|| इसी नगर में एक कामदत्त नामका सेठ रहता था। वह एक समय गोशाला देखनेके गया तो वहाँ एक दीन-हीन छोटा-सा भैंसा उसके चरणोंपर आ गिरा ॥१८॥ उसका यह आश्चर्यजनक कार्य देख सेठने गोशालाके अधिकारी पिण्डार नामक गोपालसे इसका कारण पूछा ॥१९॥ गोपालने कहा जिस दिन यह उत्पन्न हुआ था उसी दिनसे इसपर मुझे बहुत दया उत्पन्न हुई थी इसलिए मैंने वनमें विराजमान मुनिराजके दर्शनकर नमस्कार पूर्वक उनसे इसके विषयमें पूछा था ॥२०॥ कि हे मुनिनाथ ! इसके ऊपर मेरे हृदयमें बहुत भारी दया क्यों उत्पन्न हुई है ? इसके उत्तरमें ज्ञानी मुनिराजने कहा था कि हे गोपाल ! सुन, मैं इसका कारण कहता हूँ॥२१।। यह बेचारा इसी एक भैसके पाँच बार उत्पन्न हुआ और उत्पन्न होते ही तू ने इसे मार डाला ।।२२।। अब छठवीं बार भी उसी भैसके उत्पन्न हुआ है, अबकी बार इसे जाति स्मरण हुआ है इसलिए भयभीत हो सहसा उठकर तेरे पैरोंपर आ गिरा था। छोटे बच्चोंका संरक्षण भी तो तेरे हो आधीन था ।।२३।। मुनिराजके उक्त वचन सुनकर मैंने यहां पुत्रवत् इसका पालन किया है। अब जीवित रहने की इच्छासे यह यहाँ आपके चरणों में भी गिरा है ॥२४॥ गोपालके वचन सुनकर वह सेठ उस भैसके बच्चेको अपने साथ नगर ले गया और राज-कर्मचारियोंसे उसे अभय १. पेण्डारो म.। २. वनं म,। ३. ममषक: म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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