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________________ सप्तविंशः सर्गः अनन्तमतिसंज्ञस्य गुरोः कृत्वातिशिष्यताम् । स चन्द्राभविमानेन्द्रो ब्रह्मलोकेऽभवत्सुरः ||११७॥ व्याधपूर्वोऽपि सप्तम्या निःसृत्य भुजगोऽभवत् । रत्नप्रभां प्रविश्यैत्य भ्रान्स्वा तिर्यक्षु दुःखमाक् ॥ ११८ ॥ स भूतरमणाटव्यामैरावत्यास्तटेऽभवत् । तोकं' कनककेश्यां तु तापसस्य खमालिनः ।। ११९ ।। स पञ्चाग्नितपः कुर्वन् मृगशृङ्गो मृगोपमः । चन्द्राभं खेचरं दृष्ट्वा खेचर तं यदृच्छया ।। १२० ।। निदानी वज्रदंष्ट्रस्य विद्युदंष्ट्रोऽयमात्मजः । जातो विद्युत्प्रभागर्मे विद्याविद्योतितोद्यमः ॥१२१॥ वज्रायुधचरश्च्युत्वा जातः सर्वार्थसिद्धितः । संजयन्तः फणीन्द्रस्त्वं जयन्तो ब्रह्मलोकतः ||१२२|| एकजन्मापकारेण बहुजन्मसु वैरधीः || अवधीत् सिंहसेनं तं श्रीभूतिचरजीवकः ।। १२३ ।। नतोऽस्य घनवैरेण कोपनिघ्नस्य को गुणः । जातः प्रत्युत जातोऽयं सौख्यविघ्नकृदात्मनः ॥। १२४।। उपलभ्य मतं जैनं गजों जन्मनि पञ्चमे । निर्वैरो निर्वृतोऽहिस्त्वं संसरत्येष वैरभाक् ।। १२५ ।। वैरबन्धमिति ज्ञात्वा घोरसंसारवर्धनम् । धरणेन्द्र ! विमुञ्च स्वं तथा मिथ्यात्वमप्यरम् ।। १२६ ॥ इत्यादित्याभदेवेन धरणेन्द्रः प्रबोधितः । मुक्तवैरः स सम्यक्त्वं जग्राह भवतारणम् ॥ १२७ ॥ ततः खण्डितविद्यास्ते छिन्नपक्षाः खगा यथा । खिन्नोद्यमास्तदेत्युक्ता धरणेन्द्रण | खेचराः ॥ १२८ ॥ प्रतिमां व्योमगाः सर्वे संजयन्तस्य पावनीम् । शैले स्थापयतात्राशु पञ्चचापशतोच्छ्रय। म् ||१२९ ।। नरक से निकलकर इन्हीं दोनोंके श्रीदाम नामका पुत्र हुआ । यह श्रीदाम मुझे एक बार सुमेरु पर्वत पर मिला तो वहाँ भी मैंने उसे समझाया ।। ११५ - ११६ ।। जिससे अनन्तमति गुरुका शिष्य बनकर वह ब्रह्मलोक स्वर्ग में चन्द्राभ विमानका स्वामी देव हुआ है ।। ११७|| श्रीभूतिका जीव जो पहले भील था सातवीं पृथिवीसे निकलकर सर्पं हुआ । फिर रत्नप्रभा नामक पहली पृथिवीमें गया, वहाँसे निकलकर तिर्यंचोंमें भ्रमण कर दुःख भोगता रहा ||११८॥ तदनन्तर भूतरमण नामक अटवो में ऐरावती नदीके किनारे खमाली नामक तापसकी कनककेशो स्त्रीसे पुत्र उत्पन्न हुआ | | ११९ || वह मृगके समान था तथा मृगशृंग उसका नाम था । एक बार वह पंचाग्नि तप तप रहा था कि उसकी दृष्टि स्वेच्छा से आकाश में विचरण करते हुए चन्द्राभ नामक विद्याधरपर पड़ी। विद्याधरको देखकर उसने विद्याधर होनेका निदान किया और उसके फलस्वरूप वह राजा वज्रदंष्ट्र की विद्युत्प्रभा रानोके गर्भसे, जिसका उद्यम विद्याओंसे प्रकाशमान है ऐसा यह विद्युद्दंष्ट्र नामका पुत्र हुआ है || १२०-१२१ ॥ वज्रायुधका जीव सर्वार्थसिद्धिसे च्युत होकर संजयन्त हुआ है और ब्रह्मलोकसे चयकर जयन्तका जीव तू धरणेन्द्र हुआ है || १२२|| देखो वैरकी महिमा, राजा सिंहसेनने श्रीभूति पुरोहितका एक जन्म में अपकार किया था पर उसी अपकारसे वैर बाँधकर श्रीभूतिके जीवने अनेक जन्मों में सिंहसेनका वध किया || १२३ ॥ तीव्र वैरसे क्रोधके वशीभूत हो श्रीभूतिके जीवने सिंहसेनका अनेक बार घात किया अवश्य पर उससे उसे क्या लाभ हुआ ? प्रत्युत उसका यह कार्यं अपने ही सुखको नष्ट करनेवाला हुआ || १२४॥ सहसेनका जीव तो जब हाथी था तभी जैनधर्मं प्राप्तकर वैर रहित हो गया था और उसके फलस्वरूप पाँचवें भवमें संजयन्त पर्यायसे मोक्ष चला गया है पर तू नागेन्द्र होकर भी वैरको धारण कर संसार में परिभ्रमण कर रहा है ।। १२५ || हे धरणेन्द्र ! इस प्रकार वैर भावको घोर संसारका वर्धक जानकर तू छोड़ दे और सबका मूल जो मिथ्यादर्शन है उसका भी शीघ्र त्याग कर दे || १२६|| इस प्रकार आदित्याभ देवके द्वारा प्रबोधको प्राप्त हुए धरणेन्द्रने सब वैर-भाव छोड़कर संसारसागर से पार करानेवाला सम्यग्दर्शन धारण कर लिया ॥ १२७॥ तदनन्तर विद्याओंके खण्डित हो जानेसे जो पंख कटे पक्षियोंके समान खेदखिन्न हो रहे थे ऐसे उन विद्याधरोंसे धरणेन्द्र ने कहा कि हे समस्त विद्याधरो ! तुम सब शीघ्र ही इस पर्वतपर १. पुत्र: । 'पुत्रः सुनूरपत्यं च तुक्तोकं चात्मजः प्रज्ञा' इत्यमरः । २. भूतपूर्वो वज्रायुध इति वज्रायुधवरः । Jain Education International ३७१ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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