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________________ हरिवंशपुराणें यस्माद्भूमिगृहे जातः सुभौमस्तेन भाषितः । कौशिकस्याश्रमे रम्ये प्रच्छन्नो वर्धतेऽधुना ॥१३॥ स हन्ता जामदग्न्यस्य षड्खण्डपतिरूर्जितः । दुहितुर्भविता भर्त्ता भवतोऽल्पैर्दिनैरिह || १४ || सप्तकृत्वः कृतान्ताभः स कृत्वा क्षत्रमारणम् । रामोऽपि निभृतं चेतो धत्ते द्विजहितेऽधुना ॥ १५ ॥ एवमेकातपत्रायां पृथिव्यां जमदग्निजः । प्रतापाग्निपरीताशः पूरिताशी विजृम्भते ॥१६॥ सुभौमे वर्धमाने तु तापसाश्रमवासिनि । उत्पाताः शतशो जाता जामदग्नयगृहेऽधुना ॥ ५७॥ आशङ्कितः स नैमित्तं पृच्छति स्म सविस्मयः । उत्पाताः कथयन्तीमे किमनिष्टमिति श्रुतम् ॥१८॥ स आह वर्धते बैरो भवतोऽन्तर्हितः क्वचित् । विज्ञेयः कथमित्युक्ते प्राह नैमित्तिकस्ततः ॥ १९॥ तक्षत्रियसङ्घानां दंष्ट्रा यस्य जिघत्सतः । पायसवेन वर्त्तन्ते स एवारिस्तवोद्धतः ॥ २० ॥ इति श्रुत्वा रु 'जिज्ञासुः शत्रुं क्षत्रियपुङ्गवम् । विशालां 'सत्रशालां तामाश्वेव समचीकरत् ॥२१॥ सत्रमध्ये व्यवस्थाप्य दंष्ट्रामस्तिभाजनम् । निरूपिततदध्यक्षो यत्नवानवतिष्ठते ॥२२॥ आकर्ण्य मेघनादस्तं कृत्वा केवलिवन्दनाम् । गत्वा गजपुरं शीघ्रं पश्यति स्म कुमारकम् ॥२३॥ शस्त्रशास्त्रार्णवस्यान्ते वर्त्तमानमधिश्रियम् । ज्वलत्प्रतापममितो मानुमन्तमिवोदितम् ॥२४॥ शनैः स प्रेरितस्तेन वृत्तान्तविनिवेदिना । अहितेन्धनदाहाय वायुनेव तनूनपात् ॥ २५ ॥ आजगाम च तेनैव सह शत्रुगृहं गृहात् । बुभुक्षुरुपविष्टश्व दर्भासनपरिग्रहः ॥२६॥ ३५२ आठवाँ चक्रवर्ती होगा ||१२|| क्योंकि वह पुत्र भूमिगृह - तलघर में उत्पन्न हुआ था इसलिए 'सुभीम' इस नामसे पुकारा जाने लगा । इस समय वह बालक कौशिक ऋषिके रमणीय आश्रम में गुप्त रूपसे बढ़ रहा है || १३ || वही कुछ ही दिनों में परशुरामको मारने वाला बलशाली चक्रवर्ती होगा और वही तुम्हारी कन्याका पति होगा || १४ || परशुराम यमराजके समान क्रूर है वह सात बार क्षत्रियोंका अन्त कर इस समय ब्राह्मणोंके हितमें अपना मन लगा रहा है || १५ || इस तरह जिसने प्रतापरूपी अग्निसे समस्त दिशाओंको व्याप्त कर दिया है तथा मनोवांछित दान देकर जिसने याचकोंकी आशाएँ पूर्ण कर दी हैं ऐसा परशुराम इस समय एकछत्र पृथिवीपर निरन्तर वृद्धिको प्राप्त हो रहा है ॥ १६ ॥ इधर तपस्वीके आश्रम में निवास करनेवाला सुभीम जैसे-जैसे बढ़ने लगा उधर परशुराम के घर वैसे-वैसे ही सैकड़ों उत्पात होने लगे ||१७|| उत्पातोंसे आशंकित एवं आश्चर्यचकित हो उसने निमित्तज्ञानी से पूछा कि ये उत्पात मेरे किस अनिष्टको कह रहे हैं ? || १८ || निमित्तज्ञानीने कहा कि आपका शत्रु कहीं छिपकर वृद्धिको प्राप्त हो रहा है । वह कैसे जाना जा सकता है ? इस प्रकार परशुराम के पूछने पर निमित्तज्ञानीने पुन: कहा कि ||१९|| तुम्हारे द्वारा मारे ! हुए क्षत्रियों की डाढ़ें जिसके भोजन करते समय खीर रूपमें परिणत हो जावें वही तुम्हारा उद्दण्ड शत्रु है ||२०|| यह सुनकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ शत्रुको जानने की इच्छा करते हुए परशुरामने शीघ्र ही एक विशाल दानशाला बनवायी ||२१|| और दानशालाके मध्य में डाढ़ोंसे भरा बरतन रखकर उसके अध्यक्षको सब वृत्तान्त समझा दिया जिससे वह यत्नपूर्वक वहाँ सदा अवस्थित रहता है ||२२|| यह सब समाचार सुन राजा मेघनाद केवलीकी वन्दना कर शीघ्र ही हस्तिनापुर गया और वहाँ उसने कुमार सुभीमको देखा || २३ | | उस समय सुभीम कुमार शस्त्र और शास्त्ररूपी सागरके अन्तिम तटपर विद्यमान था, अधिक शोभासे युक्त था, सब ओर उसका देदीप्यमान प्रताप फैल रहा था, और वह उदित होते हुए सूर्यके समान जान पड़ता था || २४|| जिस प्रकार ईन्धनको नष्ट करने के लिए वायु अग्निको प्रेरित कर देती है उसी प्रकार पूर्ववृत्तान्त सुनानेवाले राजा मेघनादने उसे शत्रुरूपी ईन्धनको जलानेके लिए धीरेसे प्रेरित कर दिया || २५ || वह उसी समय घरसे १. जिघांसुः म. । २. भोजनशालाम् । ३. शत्रुमध्ये क । ४. निरूपितं तदध्यक्ष क. । ५. अग्निः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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