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________________ पञ्चविंशः सर्गः भ्राता मदनवेगायाः श्रित्वा दधिमुखोऽन्यदा । पितृबन्धविमोक्षार्थी संबन्धं शौरयेऽवदत् ॥१॥ शृणु देव ! नमेवंशे संख्यातीतेषु राजसु । अरिञ्जयपुराधीशो मेघनादोऽभवन्नृपः ॥२॥ पद्मश्रीस्तस्य कन्याभूत् सा च नैमित्तिकैः पुरा । स्त्रीरत्नं भवितेत्येवमादिष्टा चक्रवर्तिनः ॥३॥ नभस्तिलकनाथश्च प्रियपूर्वमनेकशः । वज्रपाणिरिति ख्यातस्तामयाचत रूपिणीम् ॥४॥ अलाभे च ततस्तस्या स रुष्टो दुष्टखेचरः । युद्धे जेतुमशक्तोऽगादकृतार्थो निजं पुरम् ॥५॥ मेघनादोऽपि तस्काले जातकेवललोचनम् । मुनिमभ्यय॑ पप्रच्छ नृसुरासुरसंसदि ॥६॥ प्रभो ! मे दुहितुर्भर्त्ता भविता मरतेऽत्र कः । इति पृष्टोऽवदत्सोऽपि वरमन्वयपूर्वकम् ॥७॥ कौरवान्वयसंभूतो भूतो गजपुरे नृपः । कार्तवार्य इति ख्यातिं बिभ्रद्वीर्यसमुद्धतः ॥८॥ सोऽवधीत् कामधेन्वर्थ जमदग्नि तपस्विनम् । क्रोधात्परशुरामस्तं जघान पितृधातिनम् ॥९॥ क्षत्रियेषु तथाऽन्येषु सकलत्रेषु शत्रुणा । क्रुद्धेन दत्तयुद्धेषु मार्यमाणेषु भूरिषु ॥१०॥ अन्तर्वस्नी तदा पत्नी कार्तवीर्यस्य कानरा । तारा रहसि निःसृत्य प्राविशत्कौशिकाश्रमम् ॥११॥ वसन्ती तत्र सा मीरुः प्रसूता तनयं शुभम् । क्षत्रियत्रासनिर्भेदमष्टमं चक्रवर्तिनम् ॥१२॥ अथानन्तर किसी दिन मदनवेगाका भाई दधिमुख अपने पिताको बन्धनसे छुड़ानेकी इच्छा करता हुआ कुमार वसुदेवके पास आकर निम्नांकित सन्दर्भ कहने लगा ॥१॥ उसने कहा कि हे देव ! सुनिए. नमिके वंशमें असंख्यात राजाओंके हो जानेसे अरिजयपुरका स्वामी राजा मेघनाद हुआ ||२|| उसके एक पद्मश्री नामकी कन्या थी। उस कन्याके विषयमें निमित्तज्ञानियोंने बताया था कि यह चक्रवर्तीकी स्त्री-रत्न होगी ॥३॥ उसीके समयमें नभस्तिलक नगरका राजा वज्रपाणि भी हुआ। उसने रूपवती पद्मश्री कन्याकी पहले अनेक बार याचना की परन्तु जब वह उसे नहीं प्राप्त कर सका तो उस दुष्ट विद्याधरने रुष्ट होकर युद्ध ठान दिया। मेघनाद प्रबल शक्तिका धारक था इसलिए वज्रपाणि उसे युद्ध में जीत नहीं सका फलस्वरूप वह कार्यमें असफल हो अपने नगरको वापस लौट गया ॥४-५|| उसी समय किन्हीं मुनिराजको केवलज्ञानरूपी लोचनकी प्राप्ति हुई सो उनकी पूजाके अर्थ अनेक मनुष्य, देव और धरणेन्द्रोंकी सभा जुटी। उस सभामें केवली भगवान्की पूजा कर मेघनादने उनसे पूछा कि हे प्रभो! इस भरत क्षेत्रमें मेरी पुत्रीका भर्ता कौन होगा? इस प्रकार पूछनेपर केवलज्ञानी मुनिराजने उसके योग्य वर और उसके कूलका निरूपण किया ॥६-७|| उन्होंने कहा कि हस्तिनापुर नगरमें कौरववंशमें उत्पन्न हुआ कार्तवीर्य नामका एक राजा था जो पराक्रमसे बहुत ही उद्दण्ड था |८|| उसने कामधेनुके लोभसे जमदग्नि नामक तपस्वीको मार डाला था। जमदग्निका लड़का परशुराम था वह भी बड़ा बलवान् था अतः उसने क्रोधवश पिताका घात करनेवाले कार्तवीर्यको मार डाला ॥९।। इतनेसे ही उसका क्रोध शान्त नहीं हआ अतः उसने क्रुद्ध होकर युद्ध में स्त्री-पुत्रों सहित और भी अनेक क्षत्रियोंको मार डाला। इस तरह जब वह अनेक क्षत्रियोंको मार रहा था तब राजा कार्तवीर्यको गर्भवती तारा नामकी पत्नी भयभीत हो गुप्त रूपसे निकलकर कौशिक ऋषिके आश्रममें जा पहुंची ॥१०-११॥ वहां भय सहित निवास करती हुई तारा रानीने एक पुत्र उत्पन्न किया जो क्षत्रियोंके त्रासको नष्ट करनेवाला १. पितृबन्धु म.। २. यमदग्नि क., ख., ग. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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