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________________ त्रयोविंशः सर्गः ३४१ इति श्रुत्वा महाक्रोधः स मृत्वा मधुपिङ्गलः । जातो वननिकायेपु' महाकोलोऽधमामरः ॥१२६॥ अहो कषायपानस्य वैषम्यं यद्विरोधिनः । सम्यक्त्वौषधिपानस्य जातमत्यन्तदूषणम् ॥१२७॥ सुलसापहृतिं ध्यावा सोपायो सगरेण सः । क्रोधाग्निना महाकालो जज्वाल हृदये भृशम् ॥१२८॥ स्त्रीवैरविषदग्धस्य हृदयस्य विदाहिनः । स दाहोपशमं कत्तुं न शशाक शमाम्बुना ॥१२९॥ अचिन्तयदसौ येन शत्रोदुःखपरम्परा । जायते दीर्घसंसारे तमुपायं करोम्यहम् ॥१३०॥ प्राणी प्रत्यपकाराय चेष्टते ह्यपकारिणः । तैरुपायैर्यकर्याति मूढधीः स्वयमप्यधः ॥१३१॥ आगतश्च महाकालः क्षत्रक्रोधेन दीपितः । नारदेन जितं जल्पे पश्यति स्म स पर्वतम् ॥ ३२॥ शाण्डिल्याकृतिरूपोऽद्य तस्य विश्व समाह सः । मागाः पर्वत ! निर्वेद जल्पेऽहं जित इत्यलम् ॥१३३॥ धौचनाम्नो गुरोः शिष्यः शाण्डिल्योऽहं पिता च ते । वैन्यश्चापि तथोदञ्चः प्रावृतश्चैव पञ्चमः ॥१३॥ सूनोः क्षीरकदम्बस्य भवतो यः पराभवः । स ममैव ततोऽस्याहं मार्जनाय समुद्यतः ॥१३५॥ सहायं मां परिप्राप्य कुरु क्षेत्रमकण्टकम् । मरुत्सखस्य रौद्रस्य शिखिनः किमु दुष्करम् ॥१३६॥ इति पर्वतमामाष्य पुरस्कृत्य स दुष्टधीः । सक्षन्नं भरतक्षेत्रं चक्रे व्याधिशताकुलम् ॥१३७॥ चक्रे व्याधिविनाशाय शान्तिकर्म च पर्वतः । विश्वासेन ततो लोकः शरणं प्रतिपद्यते ॥१३८॥ यह सुनकर मधुपिंगलको बहुत भारी क्रोध उत्पन्न हुआ और उसी समय मरकर वह व्यन्तर देवोंमें महाकाल नामका नीच देव हआ ॥१२६।। आचार्य कहते हैं कि अहो! कषैले शरबतकी बड़ी विषमता है क्योंकि वह सम्यग्दर्शनरूपी ओषधिके शरबतको अत्यन्त दूषित कर देता है। भावार्थ-जिस प्रकार कषैला रस पीनेसे उसके पूर्व पिया हुआ मोठा रस दूषित हो जाता है उसी प्रकार क्रोधादि कषायोंकी तीव्रतासे सम्यग्दर्शनरूप ओषधिका रस दूषित हो जाता है-सम्यग्दर्शन नष्ट हो जाता है, यह बड़े आश्चर्यकी बात है ।।१२७|| राजा सगरने उपाय भिड़ाकर सुलसाका अपहरण किया था इसका ध्यान आते ही महाकाल, हृदय में क्रोधरूपी अग्निसे अत्यन्त जलने लगा ॥१२८॥ उसका हृदय स्त्रीके वैररूपी विषसे जलकर तीव्र दाह उत्पन्न कर रहा था इसलिए वह शान्तिरूपी जलसे उसकी दाहको शान्त करनेके लिए समर्थ नहीं हो सका ॥१२९॥ वह विचार करने लगा कि जिससे शत्रको दोघं संसारमें दुःखोंकी परम्परा प्राप्त होती रहे मैं उसो उपायको करता हूँ ॥१३०|| आचार्य कहते हैं कि यह प्राणी अपने अपकारी मनुष्यका उन उपायोंसे अपकार करने की-बदला लेनेकी चेष्टा करता है कि जिनसे वह मूर्ख स्वयं नोचेकी ओर जाता है-अधोगतिको प्राप्त होता है ।।१३१॥ इस प्रकार राजा सगरके ऊपर क्रोधसे देदीप्यमान होता हुआ महाकाल पृथिवीपर आया और आते ही उसने शास्त्रार्थ में नारदके द्वारा जीते हुए पर्वतको देखा ॥१३२।। महाकालने शाण्डिल्यका रूप धारण कर पर्वतको विश्वास दिलाते हुए उससे कहा कि हे पर्वत ! तुम इस बातका खेद मत करो कि मैं शास्त्रार्थमें हार गया हूँ ॥१३३।। ध्रौव्य नामक गुरुके मैं शाण्डिल्य, तुम्हारे पिता क्षीरकदम्बक, वैन्य, उदंच और प्रावृत ये पांच शिष्य थे ।।१३४|| तुम क्षीरकदम्बकके पुत्र हो इसलिए जो तुम्हारा पराभव है वह मेरा पराभव है और इसीलिए मैं उसे दूर करनेके लिए उद्यत हूँ ॥१३५॥ तुम मेरी सहायता पाकर अपने क्षेत्रको निष्कण्टक करो, क्योंकि वायुसे प्रज्वलित भयंकर अग्निको क्या कार्य कठिन है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ॥१३६।। इस प्रकार दुर्बुद्धि के धारक महाकालने पर्वतसे कहकर तथा उसे आगे कर राजाओं सहित समस्त भरत क्षेत्रको सैकड़ों बीमारियोंसे व्याकुल कर दिया ॥१३७|| उन बीमारियोंको नष्ट करनेके लिए पर्वत शान्तिकर्म करता था जिससे लोग विश्वास कर उसकी १. व्यन्तरदेवेषु । अवनिकायेषु म. । २. महाकायो म.। ३. परम्परां म.। ४. वादे । Jain Education International For Private & Personal Use Only .. www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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