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________________ ३४२ हरिवंशपुराणे सगरः क्षत्रलोकेन सहोपेत्य तमादरात् । होममन्त्रविधानश्च बभूव विगतज्वरः ॥१३९॥ हिंसानोदनयानार्षान् ऋरान् ऋरः स्वयंकृतान् । वेदानध्यापयन् विप्रान् क्षिप्रं देवोऽनयदशम् ॥१४॥ अश्वमेधोऽजगोमेधो यागो यागफलैषिणाम् । दर्शितः क्षत्रियादीनां साक्षात्प्रत्ययकारिणाम् ॥१४१॥ सूयन्ते यत्र राजानः शतशोऽपि सहस्रशः । राजसूयक्रतुस्तेन दर्शितो राजवैरिणा ॥१४२॥ प्राग्दिवाकरदेवाख्यः खे वरो नारदान्वितः । पापविघ्नकरस्तेन विघ्नितः सुरमायया ॥४३॥ अणिमादिगुणोत्कृष्टे विकुर्वाणे सुराधमे । विद्याबलसमृद्धोऽपि मानुषः किं करिष्यति ॥१४४॥ घातयित्वा बहून् जीवान् ब्राह्मणादिभिरुद्यतैः । यष्टेऽयष्टं स दुष्टस्तान् स्वपरानिष्टकृत्सुरः ॥१४५॥ इष्ट्वा च सगरं यागे सुलसां च कृपोज्झितः । हिंसानन्दं परिप्राप्तः प्रयातश्च निजं पदम् ॥१४६॥ प्रवर्तिताश्च ते वेदा महाकालेन कोपिना । विस्तारितास्तु सर्वस्यामवनौ पर्वतादिभिः ॥१४७॥ नारदस्य सुतायासौ खेचरोऽपि सुदृष्टये। सुतां परमकल्याणी ददौ विद्यासमन्विताम् ॥१४॥ अन्वये तनुजातेयं क्षत्रियायां सुकन्यका । सोमश्रीरिति विख्याता वसुदेवद्विजन्मनः ॥१४९।। करालब्रह्मदत्तेन मुनिना दिव्यचक्षुषा । वेदे जेतुः समादिष्टा महतः सहचारिणी ।।१५०॥ इति श्रुत्वा तदाधीत्य सर्वान् वेदान् यदूत्तमः । जित्वा सोमश्रियं श्रीमानुपयेमे विधानतः ॥१५॥ वरे प्रेम वरं जातं नववध्वा यथा दृढम् । वरस्यापि तथा तस्यां तत्र का सुखवर्णना ॥१५२।। शरणमें आने लगे ॥१३८॥ राजा सगर भी अनेक राजाओंके साथ आदरपूर्वक उसके पास आया और बताये हुए होम तथा मन्त्र-विधानसे नीरोग हो गया ।।१३९|| दुष्ट महाकाल देव हिंसाकी प्रेरणा देनेके लिए स्वयं बनाये हए अनार्ष वेद ब्राह्मणोंको पढाता था और उन्हें शीघ्न अपने वश कर लेता था ॥१४०॥ उसने यज्ञके फलकी इच्छा रखनेवाले एवं साक्षात् विश्वास करनेवाले क्षत्रिय आदि जनोंको अश्वमेध, अजमेध तथा गोमेध यज्ञ बतलाये ॥१४१।। जिसमें सैकड़ों-हजारों राजा होमे जाते थे ऐसा राजसूय यज्ञ भी उस राजाओंके वैरी महाकालने दिखलाया था ।।१४२॥ यद्यपि प्रागदिवाकर देव नामका विद्याधर नारदके साथ आकर महाकालके इस पाप कार्यमें विघ्न करनेके लिए उद्यत था तथापि देवकी मायाने उसके इस कार्यमें विघ्न डाल दिया ॥१४३।। सो ठोक ही है क्योंकि अणिमादि गुणोंसे उत्कृष्ट नीच देव जब अपनी विक्रिया दिखानेमें तत्पर है तब मनुष्य विद्याबलसे समृद्ध होनेपर भी क्या कर सकता है ? ||१४४|| इस प्रकार निज और परका अहित करनेवाले उस दुष्ट देवने आज्ञापालन करने में उद्यत ब्राह्मण आदिके द्वारा बहत जीवोंका घात कराकर उन्हें यज्ञमें होम दिया। यही नहीं उस निर्दयने राजा सगर और सुलसाको भी यज्ञमें होम दिया और इस प्रकार हिंसानन्द नामक रौद्र ध्यानको प्राप्त होता हुआ अपने स्थानपर चला गया ।।१४५-१४६।। क्रोधसे युक्त महाकाल देवने उन अनार्ष वेदोंको चलाया और पर्वत आदिने समस्त पृथिवीपर उनका विस्तार किया ।।१४७|| नारदका एक सम्यग्दृष्टि पुत्र था। उसे प्रागदिवाकर देव नामक विद्याधरने विद्याओंसे सहित अपनी परम कल्याणी पुत्री प्रदान की थी ॥१४८|| उसी वंशमें वसुदेव ब्राह्मणको क्षत्रिया स्त्रीसे यह सोमश्री नामकी उत्तम कन्या उत्पन्न हई है ॥१४९।। करालब्रह्मदत्त नामक अवधिज्ञानी मनिराजने कहा था कि जो इसे वेदोंमें जीतेगा उसी महापुरुषकी यह स्त्री होगी ।।१५०॥ यह सुनकर श्रीमान् कुमार वसुदेवने उस समय समस्त वेदोंका अध्ययन किया और सोमश्रीको जीतकर विधिपूर्वक उसके साथ विवाह किया ॥१५१।। जिस प्रकार नववधूका कुमार वसुदेवमें दृढ़ प्रेम था उसी प्रकार कुमार वसुदेवका भी नववधूमें दृढ़ प्रेम था। इसलिए उनके . १. सुरोत्कृष्ट म.। २. यष्टे यष्टा स दुष्टस्तां म.। ३. वसुदेवः । ४. परिणीतवान् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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