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________________ हरिवंशपुराणे इत्युक्त्वा महतीमृद्धिं मुनिखेचरसंनिधौ । संप्रदयं तदा देवी देवदेवीविमानकैः ॥१५॥ वस्त्रैरग्निविशोभ्यमा भूषामाल्यविलेपनैः । भूषयित्वा ससत्कारममाषेतां सुभूषणः ॥१६०॥ आदेशो दीयता स्वामिन् कर्तव्ये समुपस्थिते । चम्पां किं प्राप्य सेऽद्यैव सद्यो भूर्यर्थसंगतः ॥१६१॥ इत्युक्तेन मया प्रोक्तं वजतं निजमास्पदम् । स्मरणानन्तरं देवी पुनरागम्यतामिति ॥१६२॥ यथादेशमिति प्रोच्य प्राञ्जलि प्रणिपत्य तौ। मुनि मां च समापच्छय प्रयातो त्रिदिवं निजम् ॥१६३॥ अहं च मुनिमानम्य विमानेन विहायसा । खेचराभ्यां सहायातः प्राविशं शिवमन्दिरम् ॥१६॥ तत्र स्वर्ग इवातिष्ठन् सुखेन खचरार्चितः । जन्मान्यदिव च प्राप्तः शृण्वन् निजयशो जनात् ॥१६५॥ अन्यदा मातृपुत्रास्ते मयामा संप्रधारणम् । चक्रर्गान्धर्वसेनाख्यां कुमारी संप्रदर्य मे ॥१६६॥ चारुदत्त ! शृणु श्रीमानेकदावधिचक्षुषम् । राजेति पृष्टवान् भर्ता को में दुहितुरीक्ष्यते ॥१६७॥ सोऽवोचच्चारुदत्तस्य गृहे गान्धर्वपण्डितः। जेतास्या मविता तेऽसौ कन्याया यादवः पतिः ॥१६८॥ इत्याकयं तदा तेन राज्ञा प्रव्रजतापि च । स्थिरीकृतमिदं कार्य प्रमाणं स्वं ततोऽसि नः ॥१६९।। दिष्टयाभ्युपगतं तत्तु बन्धुकार्य मया ततः । धाव्यादिपरिवाराढ्या कन्येयं मे समर्पिता ॥१७०॥ कन्याया भ्रातरौ नानारत्नस्वर्णादिसंपदाम् । वृतौ खेचरवाहिन्या सज्जौ चम्पागमं प्रति ॥१७१॥ उपकर्ताके प्रति नम्रताका भाव अवश्य ही दिखलाना उचित है ॥१५८|| इस प्रकार कहकर उन दोनों देवोंने उस समय मुनिराज तथा विद्याधरोंके समीप देव-देवियों तथा विमान आदिके द्वारा अपनी बड़ी भारी ऋद्धि दिखलाकर अग्निमें शुद्ध किये हुए वस्त्र, आभूषण, माला, विलेपन आदिसे मेरा बहुत सत्कार किया तथा उत्तमोत्तम आभूषणोंसे विभूषित कर मुझसे कहा कि हे स्वामिन् ! जो भी कार्य करने योग्य हो उसके लिए आप आज्ञा दीजिए। क्या आज शीघ्र ही आपको बहुत भारी धन-सम्पदाके साथ चम्पापुरी भेज दिया जाये ? ॥१५९-१६१॥ इसके उत्तर में मैंने कहा कि इस समय आप अपने-अपने स्थानपर जाइए । जब मैं आपका स्मरण करूँ तब पुनः आइए ।।१६२।। । आज्ञा' यह कहकर मझे तथा मनिराजको हाथ जोडकर नमस्कार किया एवं मुझसे तथा मुनिराजसे पूछकर वे अपने स्वर्ग चले गये ॥१६३।। देवोंके चले जानेपर मैंने भी मुनिराज को नमस्कार किया और विद्याधरोंके साथ विमानपर बैठकर उनके शिवमन्दिर नगर में प्रवेश किया ॥१६४॥ शिवमन्दिर नगर स्वर्गके समान जान पड़ता था। मैं उसमें सुखसे रहने लगा। अनेक विद्याधर मेरी सेवा करते थे। वहां रहते हुए मुझे ऐसा जान पड़ता था मानो दूसरे ही जन्मको प्राप्त हुआ है। वहां प्रत्येक मनुष्यसे मेरा यश सूनाई पड़ता था ।।१६५।। एक दिन वे दोनों कुमार अपनी माताके साथ मेरे पास आये तथा मेरे लिए कुमारी गान्धर्वसेनाको दिखाकर मेरे साथ इस प्रकार सलाह करने लगे ।।१६६।। उन्होंने कहा कि हे चारुदत्त ! सुनो, एक समय लक्ष्मीसे सुशोभित राजा अमितगतिने अवधिज्ञानी मुनिराजसे पूछा था कि आपके दिव्यज्ञानमें हमारी पुत्री गान्धर्वसेनाका स्वामी कौन दिखाई देता है ? ||१६७।। मुनिराजने कहा था कि चारुदत्तके घर गान्धवं विद्याका पण्डित यदुवंशी राजा आवेगा वही इस कन्याको गन्धर्वविद्यामें जीतेगा तथा वही इसका पति होगा ॥१६८|| मुनिराजके वचन सुनकर राजाने उस समय इस कार्यका निश्चय कर लिया था। यद्यपि राजा अमितगति इस समय दीक्षा लेकर मुनि हो गये हैं तथापि उस समय उन्होंने इसका पूर्ण भार आपके ही ऊपर रखनेका निश्चय किया था इसलिए हम लोगोंको आप ही प्रमाणभूत हैं ॥१६९।। इसके उत्तरमें भाग्यवश प्राप्त हुए इस भाईके कार्यको मैंने स्वीकृत कर लिया। तदनन्तर धाय आदि परिवारके साथ यह कन्या मेरे लिए सौंप दी गयी ॥१७०।। नाना रत्न तथा सुवर्णादि सम्पदासे युक्त कन्याके दोनों भाई विद्या१. व्रजतो म.। २. के मे म.। ३ परिवाराद्या म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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