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________________ ३१५ एकविंशतितमः सर्ग: पिप्पलादस्थ शिष्योऽहं जडो ग्रन्थेन वाग्वलिः । तदर्शनं समर्थ्यागान्नरकं घोरवेदनम् ॥१४७॥ ततो निर्गत्य जातोऽस्मि पड़वारानजपोतकः । हुतश्च यज्ञविद्याज्ञैर्यज्ञ पर्वतदशिते ॥१४८।। सप्तमेऽपि च वारेऽहं देशे टङ्कणकेऽभवत् । अज एव निजैः पापैः प्रेरितः प्राणिघातजैः ॥१४९॥ चारुदत्तेन में जैनो धर्मोऽदर्शि निरञ्जन: । दत्तः पञ्चनमस्कारो मरणे करुणावता ॥१५०॥ जातोऽहं जिनधर्मेण सौधर्म विवुधोत्तमः । चारुदत्तो गुरुस्तेन प्रथमो नमितो मया ॥१५॥ इत्युक्त्या विरते तस्मिन्नितरोऽपि सुरोऽब्रवीत् । श्रयतां चारुदत्तो मे यथाभूद्धर्मदेशकः ॥१५२॥ रसको परिवाजा पातितः पतिताय मे । सद्धम वणिजेऽवोचच्चारुदत्तः कृपापरः ॥१५३॥ मृतो गृहीतधर्मोऽहं सौधर्मेऽभवमुत्तमः । सुरस्तेन गुरुः पूर्व चारुदत्तो नतो मया ।।१५४॥ पापकूपे निमग्नेभ्यो धर्महस्तावलम्बनम् । ददता कः समो लोके संसारोत्तारिणा नृणाम् ॥१५५॥ अक्षरस्यापि चैकस्य पदाधस्य पदस्य वा । दातारं विस्मरन् पापी किं पुनधर्मदेशिनम् ॥१५६॥ पूर्व कृतोपकारस्य पुंसः प्रत्युपकारतः । कृतित्वमुपकार्यस्य नान्यथेति विदो विदुः ॥१५७॥ तकतौ शक्तिवैकल्ये कुलीनः स कथं न यः । सद्भावं दर्शयेत्तस्मै स्वाधीनं विगतस्मयः ॥१५८॥ लिए उसने मातृ-पितृ सेवा नामका एक यज्ञ स्वयं चलाया और उसे कराकर दोनोंको मृत्युके अधीन कर दिया ।।१४६। मैं उसी पिप्पलादका वाग्वलि नामका शिष्य था। उससे शास्त्र पढ़कर मैं जड़-विवेकहीन हो गया था और उसीके मतका समर्थन कर घोर वेदनाओंसे भरे नरकमें उत्पन्न हुआ ॥१४७|| नरकसे निकलकर मैं छह बार बकराका बच्चा हुआ और छहों बार यज्ञ विद्याके जाननेवाले लोगोंने मुझे पर्वत द्वारा दिखाये हुए यज्ञमें होम दिया ।।१४८।। सातवीं बार भी मैं प्राणिघातसे उत्पन्न हुए अपने पापोंसे प्रेरित हो टंकणक देशमें बकरा ही हुआ ।।१४९|| उस समय दयालु चारुदत्तने मुझे पापरहित जैनधर्म दिखलाया तथा मरणकालमें पंच नमस्कार मन्त्र दिया ॥१५०।। जिनधर्मके प्रभावसे मैं सौधर्म स्वर्ग में उत्तम देव हुआ है। इस प्रकार चारुदत्त मेरा साक्षात् गुरु है और इसीलिए मैंने उसे पहले नमस्कार किया है ॥१५१।। यह कहकर जब वह देव चुप हो गया तब दूसरा देव बोला कि सुनिए चारुदत्त जिस तरह मेरा धर्मोपदेशक है वह मैं कहता हूँ ॥१५२।। मैं पहले वणिक् था। एक परिव्राजकने मुझे रसकूपमें गिरा दिया। पीछे चलकर उसी परिव्राजकने चारुदत्तको भी उसी रसकप में गिरा दिया। मेरी दशा मरणासन्न थी इसलिए यहाँ दयायुक्त होकर मुझे समीचीन धर्मका उपदेश दिया ॥१५३।। चारुदत्तके द्वारा बताये हुए उस समीचीन धर्मको ग्रहण कर मैं मरा और मरकर सौधर्म स्वर्गमें उत्तम देव हुआ। इस तरह चारुदत्त मेरा साक्षात् गुरु है और इसीलिए मैंने उसे पहले नमस्कार किया है ॥१५४|| जो पापरूपी कुएँमें डूबे हुए मनुष्यों के लिए धर्मरूपी हाथका सहारा देता है तथा संसार-सागरसे पार करनेवाला है उस मनुष्य के समान संसारमें मनुष्योंके बीच दूसरा कौन है ? ॥१५५।। एक अक्षर, आधे पद अथवा एक पदको भी देनेवाले गुरुको जो भूल जाता है वह भी जब पापी है तब धर्मोपदेशके दाताको भूल जानेवाले मनुष्यका तो कहना ही क्या है ? ॥१५६।। जिसका पहले उपकार किया गया है ऐसे उपकार्य मनुष्यकी कृतकृत्यता प्रत्युपकारसे ही होती है अन्य प्रकारसे नहीं, ऐसा विद्वान् लोग जानते हैं ।।१५७॥ प्रत्युपकारकी शक्तिका अभाव होनेपर जो अहंकाररहित होता हुआ अपने उपकारोके प्रति अपना शुभ अभिप्राय नहीं दिखलाता है वह कुलीन कैसे हो सकता है ? भावार्थ-प्रथम पक्ष तो यही है कि अपना उपकार करनेवाले मनुष्यका अवसर आनेपर प्रत्युपकार किया जावे। यदि कदाचित् प्रत्युपकार करनेकी सामर्थ्य न हो तो . १. निरते म.। २. -तारणं म. । ३. पदार्थस्य म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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