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________________ एकविंशतितमः सर्गः मित्रकार्यमुक्त मित्रदेवौ मया स्मृतौ । स्मरणादेव संप्राप्तौ निधिहस्तौ ममान्तिकम् ॥ ३७२ ॥ चारविमानेन साकं गान्धर्वसेनया । आनीय मित्रदेवी मां भूत्या विस्मयनायया ॥१७३॥ सुव्यवस्थाप्य चम्पायामक्षयैर्निधिभिः सह । नत्वा देवौ गतौ स्वर्गं खेचरौ च निजास्पदम् ॥ १७४।। मातुलं मातरं पत्नी बन्धुवर्गं च सादरम् । दृष्ट्वा तुष्टमतिं प्राप्तं प्राप्तोऽहं सुखितां पैराम् ॥१७५॥ शुश्रूषाकरी व मदगुवत संगताम् । श्रुत्वा वसन्तसेनां च प्रीतः स्वीकृतवानहम् ||३७६ ।। दतं किमिच्छकं दानं दीनानाथाङ्गितर्पणम् । विश्वस्मै बन्धुलोकाय दीयते स्म यथेप्सितम् ||१७७।। एस यादव ! संबन्धः कथितस्ते मयाखिलः । खेचरेन्द्रकुमार्या मे विभवस्य च संभवः || १७८ || यदर्थं रक्षिता कन्या स त्वं प्राप्तोऽसि धन्यया । कृतकृत्यः कृतश्चाहं भवता यदुनन्दन ! || १७९ ।। प्रत्यासन्नापवर्गस्य मग स्वर्गस्वपरिवभिः । तपःस्थस्योदितश्चेतो यतिष्ये च तपस्यहम् || १८०|| इति गान्धर्वसेनायाः श्रुत्वा संबन्धमादितः । चारुदत्तस्य चोत्साहं तुष्टस्तुष्टाव यादवः || १८१॥ अहो चेष्टितमार्यस्य महौदार्यसमन्वितम् । अहो पुण्यबलं गण्यमनन्यपुरुषोचितम् ||१८|| न हि पौरुपमीदृक्षं विना दैवबलं तथा । ईदृक्षान् विभवान् शक्याः प्राप्तुं ससुरखेचराः ||१८३॥ श्रुत्वेति चारुदत्तीयमात्मीयं च विचेष्टितम् । तस्मै गान्धर्व सेनादिपर्यन्तं यादवोऽवदत् ॥१८४|| धरोंकी सेना साथ लेकर चम्पानगरीके प्रति आनेके लिए तैयार हो गये ॥ १७१ ॥ उसी समय मित्रका कार्य करने के लिए उद्यत दोनों मित्र देवोंका मैंने स्मरण किया और स्मरणके बाद ही वे दोनों देव निधियाँ हाथ में लिये हुए मेरे पास आ पहुँचे ॥ १७२ ॥ | वे देव, गान्धर्वसेना के साथ मुझे सुन्दर हंस विमान में बैठाकर आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली सम्पदा सहित चम्पानगरी ले आये । यहाँ आकर अक्षय निधियोंके द्वारा उन्होंने मेरी सब व्यवस्था की । तदनन्तर नमस्कार कर देव स्वर्ग चले गये और दोनों विद्याधर अपने स्थानपर गये ॥ १७३ - १७४।। में मामा, माता, पत्नी तथा अन्य बन्धुवर्गसे बड़े आदरसे मिला, सबको बड़ा सन्तोष हुआ और मैं भी बहुत सुखी हुआ || १७५ || 'वसन्तसेना वेश्या, अपनी माँके घरसे आकर सासकी सेवा करती रही है तथा अणुव्रतोंसे विभूषित हो गयी है' यह सुनकर मैंने बड़ो प्रसन्नतासे उसे स्वीकृत कर लिया-अपना बना लिया || १७६ ॥ मैंने दीन तथा अनाथ मनुष्यों को सन्तुष्ट करनेवाला किमिच्छक दान दिया और समस्त कुटुम्बी जनोंके लिए भो उनको इच्छानुसार वस्तुएँ दीं ।। १७७ || इस प्रकार हे यादव ! विद्याधर कुमारीका मेरे साथ जो सम्बन्ध है तथा इस विभवकी जो मुझे प्राप्ति हुई है वह सब मैंने आपसे कहा है ।। १७८ ॥ हे यदुनन्दन ! जिनके लिए यह कन्या रखी गयी थी इस भाग्यशालिनी कन्याने उन्हींतुमको प्राप्त किया है इसलिए कहना पड़ता है कि आपने मुझे कृतकृत्य किया है ॥ १७९ ॥ तपस्वियोंने बताया है कि मेरा मोक्ष निकट है और तप धारण करनेसे इस भवके बाद तुझे स्वर्गं प्राप्त होगा इसलिए अब मैं निश्चिन्त होकर तपके लिए ही यत्न करूँगा || १८० ॥ इस प्रकार वसुदेव, गान्धर्वसेनाका आदिसे लेकर अन्त तक सम्बन्ध तथा चारुदत्तका उत्साह सुनकर बहुत सन्तुष्ट हुए और चारुदत्त की इस तरह स्तुति करने लगे कि अहो ! आपकी चेष्टा अत्यधिक उदारतासे सहित है, अहो ! आपका असाधारण पुण्यबल भी प्रशंसनीय है। बिना भाग्यबलके ऐसा पौरुष होना कठिन है और बिना भाग्यबलके साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है देव तथा विद्याधर भी ऐसे विभवको प्राप्त नहीं हो सकते ।।१८१-१८३ ॥ इस प्रकार चारुदत्तका वृत्तान्त सुनकर वसुदेवने उसके लिए गान्धर्वसेना आदिकी प्राप्तिपर्यन्त अपना भी समस्त वृत्तान्त कह सुनाया ॥ १८४ ॥ १. परं म । ३१७ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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