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________________ ३०० हरिवंशपुराणे आचार्याकम्पनादीनां ससप्तशतयोगिनाम् । वर्ततेऽवृत्तपूर्वोऽयमुपसर्गोऽद्य दारुणः ॥२६॥ क्षुल्लकः पुष्पदन्तस्तं क्व नाथेत्यतिसंभ्रमः । अप्राक्षोदित्यथ प्राह स हास्तिनपुरे स्फुटम् ॥२७॥ कुतोऽपवर्त्तते नाथ स इत्युक्ते जगौ गुरुः । प्राप्तवैक्रियसामर्थ्याद्विष्णोर्जिष्णोविष्यतः ॥२४॥ तस्मै स क्षुल्लको गत्वा तमुदन्तं न्यवेदयत् । विक्रियालब्धिसद्भावपरीक्षामकरोन्मुनिः ।।२९।। बाहुः प्रसारितस्तेन गिरिभित्तौ विमिद्यताम् । 'अरुद्धप्रसरो दूरं सहसाप्सु यथा तथा ॥३०॥ ज्ञात लब्धिपरिप्राप्तिर्जिनशासनवत्सलः । गत्वा पद्मं मुनिः प्राह प्रणतं प्रणतप्रियः ॥३१॥ पद्मराज ! किमारब्धं भवता राज्यवर्तिना । न वृत्तं कौरवेष्वत्र कदाचिदपि यद्धवि ॥३२॥ अनार्यजनसंवृत्तमुपसर्ग तपस्विनाम् । निवर्तयेन्नृपस्तस्य प्रवृत्तिस्तु कुतस्तत: ॥३३॥ निर्वाप्यते ज्वलन्नाग्निर्जलेन सुमहानपि । उत्तिष्ठेद् यद्यसौ तस्मात्तस्य शान्तिः कुतोऽन्यतः ॥३४॥ नेन्वाज्ञाफलमैश्वर्यमाज्ञादुर्वृत्तशासनम् । ईश्वरः स्थाणुरप्युक्तः क्रियाशून्यो यदीश्वरः ॥३५॥ तन्निवर्त्तय दुर्वृत्ताद्वलिमाशु पशूपमम् । प्रद्वेषः कोऽस्य मित्रारिसमभावेषु साधुषु ॥३६॥ साधोः शीतलशीलस्य तापनं न हि शान्तये । गाढतप्तो दहत्येव तोयात्मा विकृतिं गतः ॥३७॥ वे अवधिज्ञानसे विचार कर तथा दयासे युक्त हो कहने लगे कि हा! आज अकम्पनाचार्य आदि सात सौ मुनियोंपर अभूतपूर्व दारुण उपसर्ग हो रहा है ।।२५-२६।। उस समय उनके पास पुष्पदन्त नामका क्षुल्लक बैठा था। गुरुके मुखसे उक्त दयाद्रं वचन सुन उसने बड़े सम्भ्रमके साथ पूछा कि हे नाथ ! वह उपसर्ग कहाँ हो रहा है ? इसके उत्तरमें गुरुने स्पष्ट कहा कि हस्तिनापुरमें।।२७।। क्षुल्लकने पुनः कहा कि हे नाथ ! यह उपसर्ग किससे दूर हो सकता है ? इसके उत्तरमें गुरुने कहा कि जिसे विक्रिया ऋद्धिकी सामर्थ्य प्राप्त है तथा जो इन्द्रको भी धौंस दिखानेमें समर्थ है ऐसे विष्णुकुमार मनिसे यह उपसर्ग दर हो सकता है॥२८॥ क्षल्लक पुष्पदन्तने उसी समय जाकर विष्णकमार मुनिसे यह समाचार कहा और उन्होंने 'विक्रिया ऋद्धि प्राप्त हुई है या नहीं ?' इसकी परीक्षा की ॥२२॥ उन्होंने परीक्षाके लिए सामने खड़ी पर्वतकी दीवालके आगे अपनी भुजा फैलायी सो वह भुजा, पर्वतकी उस दीवालको भेदन कर बिना किसी रुकावटके दूर तक इस तरह आगे बढ़ती गयो जिस तरह मानो पानीमें ही बढ़ी जा रही हो ॥३०॥ तदनन्तर जिन्हें ऋद्धिको प्राप्तिका निश्चय हो गया था, जो जिनशासनके स्नेही थे और नम्र मनुष्योंके लिए अत्यन्त प्रिय थे ऐसे विष्णुकुमार मुनि उसी समय विनयावनत राजा पद्मके पास जाकर उससे बोले कि हे पद्मराज! राज्य पाते ही तुमने यह क्या कार्य प्रारम्भ कर रखा ? ऐसा कार्य तो रघुवंशियोंमें पृथिवीपर कभी हुआ ही नहीं ।।३१-३२।। यदि कोई दुष्टजन तपस्वीजनोंपर उपसर्ग करता है तो राजाको उसे दूर करना चाहिए। फिर राजासे ही इस उपसर्गकी प्रवृत्ति क्यों हो रही है ? ॥३३॥ हे राजन् ! जलतो हुई अग्नि कितनी ही महान् क्यों न हो अन्त में जलके द्वारा शान्त कर दी जाती है फिर यदि जलसे ही अग्नि उठने लगे तो अन्य किस पदार्थसे उसकी शान्ति हो सकती है ? ॥३४।। निश्चयसे ऐश्वर्य, आज्ञारूप फलसे सहित है अर्थात् ऐश्वर्यका फल आज्ञा है और आज्ञा दुराचारियोंका दमन करना है, यदि ईश्वर-राजा इस क्रियासे शून्य है-दुष्टोंका दमन करनेमे समर्थ नहीं है तो फिर ऐसे ईश्वरको स्थाणु-ठूठ भी कहा है अर्थात् वह नाममात्रका ईश्वर है ॥३५॥ इसलिए पशुतुल्य वलिको इस दुष्कार्यसे शीघ्र ही दूर करो। मित्र और शत्रुओंपर समान भाव रखनेवाले मुनियोंपर इसका यह द्वेष क्या है ? ॥३६।। शीतल स्वभावके धारक साधुको सन्ताप पहुँचाना शान्तिके लिए नहीं है क्योंकि जिस प्रकार अधिक तपाया हुआ पानी विकृत होकर जला ही देता है उसी प्रकार अधिक १. अरुद्ध: प्रसरः म. । २. न त्वाज्ञा म. । ३. उक्तक्रियाशन्यो म.। ४. शीतलशीतस्थ म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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