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________________ विशतितमः सर्गः आनीताः शशीलास्ताः संवेगिन्यः प्रववजुः । तेऽपि संवेगिनोऽष्टौ च खे वराः तपसि स्थिताः ॥१३॥ चक्रवर्ती च तद्धेतोः पद्मं लक्ष्मीमतीसुतम् । ज्येष्ठं राज्ये निधायान्त्यदेहोऽदीक्षिष्ट विष्णुना ॥१७॥ तपो विष्णुकुमारोऽसौ रत्नत्रयधरस्तपन् । निधिर्बभूव लब्धीनां नदीनां वा नदीपतिः ॥१५॥ नवराज्यस्थमागस्य पधं वलिपुरोगमाः । मन्त्रिणोऽशिश्रियन् देशकालावस्थाविदस्तथा ॥१६॥ स्थितं सिंहबलं दुर्गे पद्म वल्धुपदेशतः । गृहीत्वाह गृहाणेष्टं वरीत्वेन बलिं तदा ॥१७॥ तं प्रणम्य विदग्धोऽसौ हस्तन्यासं न्यधाद् वरम् । ततः संतोषिणां तेषां काले याति कदाचन ॥१८॥ आगत्याकम्पनाचार्यस्तदा नागपुरं शनैः । मुनीनामयहीद योगं चातुर्मास्यावधिं बहिः ॥१५॥ ततस्ते मन्त्रिणो भीताः शङ्काविषमुपागताः । तदपाकरणोपायं चिन्तयन्ति स्म सस्मयाः ॥२०॥ अब्रवीद् वलिराश्रित्य पद्मं राजन् ! वरस्वया । दत्तः स दीयतां मेऽद्य राज्यं सप्तदिनावधि ॥२॥ दत्तं गृहाण ते राज्य मित्युक्त्वाऽदृश्यवस्थितः । राज्यस्थोऽपि वलिस्तेषामुपद्रवमकारयत् ॥२२॥ यतीनभ्यन्तरो कृस्य परितोऽहनिशं कृतम् । पत्रधूमादिकोच्छिष्टशरावोसर्जनादिकम् ॥२३॥ उपसर्गसहास्तेऽपि कायोत्सर्गेण योगिनः । तस्थुः सालम्बमादाय प्रत्याख्यानं ससूरयः ॥२४॥ तस्मिन् काले गुरुर्विष्णोमिथिलायामवस्थितः । दिव्यज्ञानी जगौ ध्यात्वा स संयुक्तोऽनुकम्पया ॥२५॥ और आठ विद्याधर उन्हें हरकर ले गये थे। शुद्ध शोलको धारण करनेवालो वे कन्याएँ जब वापस लायी गयीं तो उन्होंने संसारसे विरक्त हो दोक्षा धारण कर ली। उधर संसारसे विरक्त हो वे आठ विद्याधर भी तप करने लगे ॥१२-१३।। इस घटनासे चरमशरोरी महापद्म चक्रवर्ती भी संसारसे विरक्त हो गया जिससे उसने लक्ष्मीमती रानीसे उत्पन्न पद्म नामक बड़े पुत्रको राज्य देकर छोटे पुत्र विष्णु कुमारके साथ दीक्षा धारण कर ली ।।१४।। जिस प्रकार सागर नदियोंका भाण्डार होता है उसी प्रकार रत्नत्रयके धारी एवं तप तपनेवाले विष्णुकुमार मुनि अनेक ऋद्धियोंके भाण्डार हो गये ॥१५।। देशकालको अवस्थाको जाननेवाले वलि आदि मन्त्री नये राज्य पर आरूढ़ राजा पद्मको सेवा करने लगे ॥१६।। उस समय राजा पद्म, वलि मन्त्रीके उपदेशसे किले में स्थित सिंहबल राजाको पकड़ने में सफल हो गया इसलिए उसने वलिसे कहा कि वर मांगकर इष्ट वस्तुको ग्रहण करो ॥१७॥ वलि बड़ा चतुर था इसलिए उसने प्रणाम कर उक्त वरको राजा पद्मके हाथमें धरोहर रख दिया अर्थात् 'अभी आवश्यकता नहीं है जब आवश्यकता होगी तब मांग लूंगा' यह कहकर अपना वर धरोहर रूप रख दिया। तदनन्तर वलि आदि चार मन्त्रियोंका सन्तोषपूर्वक समय व्यतीत होने लगा ॥१८॥ अथानन्तर किसी समय धीरे-धीरे विहार करते हुए अकम्पनाचार्य, अनेक मुनियोंके साथ हस्तिनापुर आये और चार माहके लिए वर्षायोग धारण कर नगरके बाहर विराजमान हो गये ॥१९|| तदनन्तर शंकारूपो विषको प्राप्त हुए बलि आदि मन्त्री भयभीत हो गये और अहंकार के साथ उन्हें दूर करनेका उपाय सोचने लगे ॥२०॥ वलिने राजा पद्मके पास आकर कहा कि राजन् ! आपने मुझे जो वर दिया था उसके फलस्वरूप सात दिनका राज्य मुझे दिया जाये ।।२१।। 'सँभाल, तेरे लिए सात दिनका राज्य दिया' यह कहकर राजा पद्म अदृश्यके समान रहने लगा। और वलिने राज्य सिंहासनपर आरूढ़ होकर उन अकम्पनाचार्य आदि मुनियोंपर उपद्रव करवाया ॥२२।। उसने चारों ओरसे मुनियोंको घेरकर उनके समीप पत्तोंका धुआँ कराया तथा जूठन व कुल्हड़ आदि फिकवाये ।।२३।। अकम्पनाचार्य सहित सब मुनि 'यदि उपसर्ग दूर होगा तो आहार-विहार करेंगे अन्यथा नहीं' इस प्रकार सावधिक संन्यास धारण कर उपसर्ग सहते हुए कायोत्सर्गसे खड़े हो गये॥२४|उस समय विष्णुकुमार मुनिके अवधिज्ञानी गुरु मिथिला नगरोमें थे। १. वलस्तदा म. । २. कृतः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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