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________________ एकोनविंशः सर्गः निषादः षाडवश्चैव गान्धारोऽथर्षभस्तथा । तथैव षड्जकैशिक्याः षड जगान्धारमध्यमाः ॥२०९॥ तिसृणामपि जातीनां ग्रहा न्यासाश्च कीर्तिताः । गान्धार ऋषभश्चैष निषादः पञ्चमस्तथा ॥२१०॥ ग्रहायंशाश्च चत्वारस्तथैवान्त्याः प्रकीर्तिताः । षड् जश्चाप्युषमश्चैव मध्यमः पञ्चमस्तथा ॥२११॥ मध्यमायां ग्रहांशी तु गान्धारो धैवतस्तथा । निषादषड जगान्धारा मध्यमाः पञ्चमस्तथा ॥२१२॥ गान्धारो रक्तगान्धार्या गृहांशाः परिकीर्तिताः । अञ्चितर्षमयोगास्तु कैशिकांशा ग्रहास्तथा ॥२१॥ स्वराः सर्वे च विज्ञयाः ग्रहांशी षड जमध्यमौ । एवं त्रिषष्टिविज्ञेया प्रहाश्चांशाः स्वजातिषु ।।२१४॥ अंशवच्च ग्रहा ज्ञेयाः सर्वास्वपि हि जातिपु । सर्वासामेव जातीनां त्रिजात्यास्तु गुणाः स्मृताः ॥२१५।। षड गुणास्तेषु विज्ञेया वर्द्धमानाः स्वरास्तथा । एकस्वरो द्विस्वरश्च त्रिस्वरोऽथ चतुःस्वरः ।।२१६।। पञ्चस्वरस्तथा चे षट्स्वरः सप्तकस्तथा । पूर्वमुक्तमिदं त्वाप्तां ग्रहांशपरिकल्पनम् ।।२१७।। पञ्चैव तु भवेत् षड जे निषादर्षभहीनतः । उपन्यासा भवन्त्यत्र गान्धारः पञ्चमस्तथा ॥२१॥ न्यासश्नात्र भवेत् षष्ठो लोपो वै सप्तमर्षमौ । गान्धारस्य तु बाहुल्यं तत्र कार्य प्रयोक्तृमिः ॥२१॥ आर्षम्यास्तु तथा स्वंशी निषादो धैवतस्तथा । एतावन्तो [पन्यासा न्यासश्चाप्यार्षमस्तथा ॥२२०।। धैवत्या धैवतश्चैव न्यासश्चैवार्षभः स्मृतः । उपन्यासा भवन्त्यत्र धैवतर्षभपञ्चमाः ॥२२॥ षड जपञ्चमहीनं च पञ्चस्वयं विधीयते । पञ्चमं च विना चैव षाडवः परिकीर्तितः ॥२२॥ आरोहणीयौ तौ कायौं लडनीयौ तथैव च । निषादश्चर्ष मश्चैव गान्धारो बलवास्तथा ।।२२३।। दोच्यवामें षड़ज और मध्यम ये दो अंश तथा ग्रह हैं। आर्षभोमें धैवत, ऋषभ और निषाद ये तीन अंश और ग्रह हैं। नैषादिनीमें षाडव, मान्धार और ऋषभ ये तीन अंश और ग्रह हैं। इसी प्रकार षड्ज कैशिकी में षड्ज, गान्धार और मध्यम ये तीन अंश तथा ग्रह हैं ।।२०८-२०२|| तीनों जातियोंके ग्रह और न्यास कहे जा चुके हैं। गान्धार, ऋषभ, निपाद और पंचम ये चार ग्रहके आदि अंश हैं तथा षड्ज, ऋषभ, मध्यम और पंचम ये अन्त्य अंश कहे गये हैं ।।२१०-२११।। मध्यमा जातिमें गान्धार और धैवत ये दो ग्रह एवं अंश हैं। निषाद, षड्ज, गान्धार, मध्यम और पंचम ये रक्तगान्धारोके ग्रह और अंश हैं। कैशिकीमें ऋषभ योगके साथ समस्त ग्रहोंसे युक्त समस्त स्वर हैं । इसमें षड्ज और मध्यम ये दो ग्रह और अंश है । इस प्रकार अपनी-अपनी जातियों में त्रेसठ ग्रह तथा इतने ही अंश जानना चाहिए ॥२१२-२१४|| समस्त जातियों में अंशोंके ही मान ग्रह जानना चाहिए । समस्त जातियोंके गण विजातीय होते हैं ॥२१५।। इनमें एक से लेकर बहते. बढ़ते छहगुने स्वर हो जाते हैं और वे एक स्वर, दो स्वर, तीन दर, चार स्वर, पाँच स्वर, छह स्वर और सात स्तर-इस क्रमसे होते हैं। इन जातियोंमें ग्रह और अंश कल्पना पहले कही जा चुकी है ।।२१६-२१७॥ षड्ज में निपाद और ऋपभ को छोड़कर शेप पाँच स्वर होते हैं और वहाँ गान्धार तथा पंचम उपन्यास होते हैं। षष्ठ स्वर न्यास होता है एवं ऋषभ तथा सप्तम स्वरका लोप होता है। इसमें प्रयोक्ताओंको गान्धारकी बहुलता करनी चाहिए ।।२१८-२१९।। आपभीमें निषाद और धैवत ये दो अंश तथा ये ही दो उपन्यास होते हैं और आपभ न्यास होता है ॥२२०॥ धैवतीमें धैवत और आर्षभन्यास तथा धैवत, ऋषभ और पंचम ये उपन्यास होते हैं ।।२२१।। इसमें षड्ज और पंचमको छोड़कर पाँच स्वरोंका प्रयोग किया जाता है तथा पंचमको छोड़कर शेष षाडव कहा जाता है ॥२२२।। पूर्वोक्त पंचस्वर्य और पाडव आरोहणीय और लंघनीय दोनों प्रकारके हैं। इसी प्रकार निषाद, ऋषभ और बलवान् १. कैशिकी सग्रहास्तथा ख. । २. नेषादिन्या निषादस्तु गान्धारश्चार्षभस्तथा । अंशाश्च षड्जकैशिक्या: पड़ जगान्धारपञ्चमाः ॥७९॥-ना. शा. अ. २८ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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