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________________ २७४ हरिवंशपुराणे वैयावृत्यप्रवृत्तो यः शासनातिमावितः । न स शक्यः सुरै रोर्बु किं पुनः क्षुद्रजन्तुमिः ॥५६॥ नन्दिपेणमुनिश्चैष तथाविध इति स्तुते । सौधर्मेन्द्रेण देवास्तं प्रशशंसुः प्रणामिनः ॥१५॥ मुनिधैर्यपरीक्षार्थं तत्रैको विबुधस्तदा । मुनिरूपधरः प्राह नन्दिषेणमिति श्रितः ॥१५८॥ वैयावृत्यमहानन्द नन्दिषेण मुने शृणु । व्याधिव्यथितदेहस्य देहि मे किंचिदौषधम् ॥१५९॥ इत्युक्तस्स तमाहैवमविकल्पानुकम्पया । ददामि वत ते साधो रुचिः कस्मिन्निहाशने ॥१६॥ पूर्वदेशजशालीनामोदनः सुरभिः शुभः । पञ्चालदेशमुद्गानां सूपः स्वादुरसान्वितः ॥१६॥ हैयङ्गवीनमुत्तप्तमपरान्तभुवां गवाम् । पयः कलिङ्गधेनूनां सुसृष्टं व्यञ्जनान्तरम् ॥१६२॥ लभ्येत यदि साधु स्यात् श्रद्धा ह्यत्र ममाधिका । इत्युक्तश्चानयामीति जगाम श्रद्धयान्वितः ॥१६३॥ विरुद्ध देशवस्तूनां प्रार्थनेऽप्यविषण्णधीः । गत्वा गोचरवेलायामानीय सहसा ददौ ॥१६४॥ उपभुक्तानपानोऽसौ शरीरान्तर्मलाविलः । धौतस्तेन स्वहस्ताभ्यां निशि निर्विचिकित्सया ॥१६५॥ अभग्नोत्साहमालोक्य नन्दिषेणमनिन्दितम् । वयावृत्यकृतं प्रोचे दिव्यरूपधरः सुरः ॥१६॥ यथा देवसभेऽस्तोषीद भवन्तं मघवानृषे । वैयावृत्योद्यतो लोके तथैव भगवान् भवान् ॥१६॥ अहो लब्धिरहो धैर्यमहो निर्विचिकित्सता । अहो शासनवात्सल्यमशल्यं तव सन्मुनेः ॥१६८॥ अन्येषामपि यद्येषा मनीषा स्यान्मनीषिणाम् । कालत्रये तपस्यत्र तेषां शासनभक्तता ।।१६९॥ करता है ।।१५५।। जो जिनशासनके अर्थको उत्कट भावना करता हुआ वैयावृत्य करने में प्रवृत्त रहता है उसे देव भी रोकनेके लिए समर्थ नहीं हैं फिर क्षुद्र जीवोंकी तो बात ही क्या है ॥१५६।। यह नन्दिषेण मुनि ऐसे ही उत्तम मुनि हैं इस प्रकार सौधर्मेन्द्र द्वारा स्तुति किये जानेपर सब देवोंने उनकी प्रशंसा की और परोक्ष नमस्कार किया ॥१५७। उन्हीं देवोंमें एक देव, मुनिके धैर्यकी परीक्षाके लिए मुनिका रूप रख नन्दिषेण मुनिराजके पास पहुंचा और इस प्रकार कहने लगा ।।१५८॥ हे वैयावृत्यमें महान् आनन्द धारण करनेवाले नन्दिषेण मुनि ! मेरा शरीर व्याधिसे पीड़ित हो रहा है इसलिए मुझे कुछ ओषधि दीजिए॥१५९॥ उसके इस प्रकार कहनेपर नन्दिषेण मुनिने अपनी अखण्ड अनुकम्पासे कहा कि हे साधो ! मैं ओषधि देता हूँ परन्तु यह बताओ कि तुम्हारी किस भोजनमें रुचि है ? ॥१६०।। मुनि रूपधारी देवने कहा-पूर्वदेशके धानका शुभ एवं सुगन्धित भात, पंचाल देशको मूंगकी स्वादिष्ट दाल, पश्चिम देशकी गायोंका तपाया हुआ घी, कलिंग देशकी गायोंका मधुर दूध और नाना प्रकारके व्यंजन यदि मिल जावें तो अच्छा हो क्योंकि मेरी श्रद्धा इन्हीं चीजोंमें अधिक है । इस प्रकार कहनेपर 'मैं अभी लाता हूँ' यह कहकर नन्दिषेण मुनि बड़ी श्रद्धाके साथ उक्त आहार लेनेके लिए चल दिये ॥१६१-१६३॥ विरुद्ध देशकी वस्तुओंकी चाह होनेपर भी उनके मनमें कुछ भी खेद उत्पन्न नहीं हुआ और गोचरी वेलामें जा कर तथा उक्त सब आहार लाकर उन्होंने शीघ्र ही उस कृत्रिम मुनिको दे दिया ।।१६४।। कृत्रिम मुनिने उस आहार पानीको ग्रहण किया परन्तु रात्रि में शरीरके अन्तर्गत मलसे उसका समस्त शरीर मलिन हो गया और नन्दिषेण मुनिने बिना किसी ग्लानिके उसे अपने हाथोंसे धोया ॥१६५।। तदनन्तर जिनका उत्साह भग्न नहीं हुआ था, तथा जो बराबर वैयावृत्य कर रहे थे ऐसे प्रशंसनीय नन्दिषेण मुनिको देखकर दिव्य रूपको धारण करनेवाले देवने कहा कि हे ऋषे! देवोंकी सभामें इन्द्रने आपकी जिस प्रकार स्तुति की थी मैं देख रहा हूँ कि आप उसी तरह वैयावृत्य करने में उद्यत हैं ॥१६६-१६७॥ अहो ! आपकी ऋद्धि, आपका धैर्य, आपकी ग्लानि जीतनेको क्षमता और संशयरहित आपका शासन वात्सल्य सभी आश्चर्यकारी हैं, आप उत्तम मुनिराज हैं ॥१६८|| यदि तप करते समय अन्य बुद्धिमान् मनुष्योंकी भी इसी प्रकार त्रिकालमें वैयावृत्य करनेकी बुद्धि हो जावे तो उसे उनकी १. स्तुतेः म. । २. श्रौतस्तेन म. । ३. सन्मने म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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