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________________ अष्टादशः सर्ग: २७५ इति स्तुत्वा मुनि नस्वा सम्यक्त्वं प्रतिपद्य सः । स्वर्गी स्वर्गमगान्मार्ग जैनेन्द्रमतिवर्तयन् ॥१७॥ पञ्चत्रिंशरसहस्राणि वर्षाण्यतिगमय्य सः। प्रायोपगमनं भेजे षण्मासावधि धीरधीः ॥१७१॥ संन्यस्तवपुराहारः स्वपरास्तप्रतिक्रियः । श्रीसौभाग्यनिदानेन स्वं बबन्ध सुमोहतः ॥१७॥ निन्दितं नाकरिष्यच्चेन्निदानं स मुनिस्तदा । अबध्यत तदा शक्त्या तीर्थकृनाम तद्धवम् ॥१७३॥ स चाराध्य महाशुक्र शक्रतुल्यस्ततोऽभवत् । तत्र तस्थौ सुखं कालं सार्द्ध षोडशसागरम् ॥१७॥ स भुक्तसुरसौख्यस्ते ततः प्रच्युत्य पार्थिव । पार्थिवो वसुदेवोऽयं सुभद्रायामभूत्सुतः ॥१७५॥ इति श्रुत्वा भवान् पूर्वान् वृष्णिमासुताः स्वकान् । धर्मसंवेगसंपन्नाः संजाता नृसुरास्तथा ॥१७६॥ सुप्रतिष्ठं प्रणम्येयुस्त्रिदशा नृपतिः पुनः । समुद्रविजयं राज्ये साभिषेकमतिष्ठपन् ॥१७७॥ समय॒ वसुदेवं च समुद्रविजयाय सः । सुप्रतिष्ठस्य पादान्ते निष्क्रान्तस्तद्भवान्तकृत् ॥१७८॥ राज्ये भोजकवृष्णिश्च मथुरायां निधाय सः । उग्रसेनं समग्रेऽयं निर्ग्रन्थवतमग्रहीत् ॥१७॥ पृथिवीछन्दः समुद्रविजयः शिवां विहितपट्टबन्धी प्रियां बधूनिवहमुख्यतामधिगमय्य राज्यस्थितिम् । स्थिरां स परिपालयन् सहजबन्धुभव्याम्बुजः प्रतापममिवर्धयन्नुदयनैर्जिनाकों यथा ॥१८॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती समुद्रविजयराज्यलाभवर्णनो नामाष्टादशः सर्गः ॥१८॥ शासन भक्ति समझना चाहिए ॥१६९|| इस प्रकार वह देव, मुनिराजको स्तुति कर तथा सम्यग्दर्शन प्राप्त कर जिन-शासनकी प्रभावना करता हुआ स्वर्गको चला गया ॥१७०|| अत्यन्त धीर बुद्धिको धारण करनेवाले नन्दिषेण मुनिने तपश्चरण द्वारा पैंतीस हजार वर्ष बिताकर अन्तिम समय छह माहका प्रायोपगमन संन्यास ले लिया ॥१७१।। उन्होंने शरीर और आहारका त्याग कर दिया, वे अपने शरीरकी वैयावृत्ति न स्वयं करते थे न दूसरेसे कराते थे किन्तु इतना होनेपर भी मोहकी तीव्रतासे उन्होंने 'मैं अग्रिम भवमें लक्ष्मीमान् तथा सौभाग्यवान् होऊँ' इस निदानसे अपनी आत्माको बद्ध कर लिया ॥१७२।। यदि वे मुनि उस समय यह निन्दित निदान नहीं करते तो अपनी सामर्थ्यसे अवश्य ही तीर्थंकर प्रकृतिका बन्ध करते ॥१७३॥ तदनन्तर वह आराधनाओंकी आराधना कर महाशुक्र स्वर्गमें इन्द्र तुल्य देव हुआ और वहां साढ़े सोलह सागर तक सुखसे विद्यमान रहा ॥१७४।। हे राजन् ! वही पुत्र देवोंके सुख भोगकर अन्तमें वहाँसे च्युत हो तेरी सुभद्रा रानोसे यह पृथिवीका अधिपति वसुदेव नामका पुत्र हुआ है ॥१७५।। इस प्रकार अन्धकवृष्णि, उसकी सुभद्रारानी तथा समुद्रविजय आदि पुत्र सुप्रतिष्ठ केवलीसे अपने-अपने पूर्वभव सुनकर धर्म और संवेगको प्राप्त हुए। इनके सिवाय जो वहाँ मनुष्य तथा देव थे वे भी धर्म और संवेगको प्राप्त हुए। इनके सिवाय जो वहाँ मनुष्य तथा देव थे वे भी धर्म और संवेगको प्राप्त हए ॥१७६।। सुप्रतिष्ठ स्वामीको नमस्कार कर देवलोग अपने-अपने स्थानपर चले गये। तदनन्तर संसारका अन्त करनेवाले राजा अन्धकवृष्णिने समुद्रविजयका अभिषेक कर उसे राज्य-सिंहासनपर बैठाया और वसुदेवको समुद्रविजयके लिए सौंपकर सुप्रतिष्ठ केवलीके पादमूलमें दीक्षा धारण कर ली ॥१७७-१७८॥ उधर भोजकवष्णिने भी मथराके समग्र राज्यपर उग्रसेनको बैठाकर निग्रन्थ व्रत धारण कर लियामुनि दीक्षा ले ली ॥१७९॥ राजा समुद्रविजयने अपनी प्रियरानी शिवादेवीको पट्ट बाँधकर समस्त स्त्रियोंमें मुख्यता प्राप्त करा दी। तदनन्तर जिस प्रकार जिनेन्द्ररूपी सूर्य, अष्ट प्रातिहार्य रूप अभ्युदयसे प्रभावको बढ़ाते हुए भव्य जोवरूपी कमलोंको प्रसन्न करते हैं उसी प्रकार राज्य मर्यादाकी रक्षा करनेवाले राजा समुद्रविजय भी अपनी अनुपम विभूतिसे प्रतापको बढ़ाते हुए अपने बन्धुरूपी कमलोंको प्रसन्न करने लगे ॥१८०॥ इस प्रकार अरिष्टनेमि, पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें समुद्रविजयके लिए राज्य प्राप्तिका वर्णन करनेवाला अठारहवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥१८॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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