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________________ हरिवंशपुराणे पुरे राजगृहे सोऽथ मातुलस्य गृहेऽवसत् । भर्तुःस्वस्रीय इत्येष पितृष्वस्रानुपालितः ॥१२९॥ मलग्रस्तशरीरोऽसावुग्रगन्धोऽजपोतवत् । विकीर्णशीर्णकेशायः कुचेलः पिङ्गलेक्षणः ॥१३०॥ दुहितर्मातुलस्यासौ वान्छन् दमरकश्रुतेः । ताभिर्जुगुप्सुभिर्दुःखी स्वगृहाद्विनिघाटितः ॥१३१॥ दुर्भाग्याग्निशिखालीढः स्थाणुरेष 'मलीमसः । मर्तुमिच्छन् पतङ्गाभो वेभारे साधुभितः ॥१३२।। निन्दित्वात्मानमाकर्ण्य धर्माधर्मफलं ततः । प्रावाजीद् गुरुपादान्ते शान्त: संख्याख्ययोगिनः ॥ ३३॥ चचार गुरुवंदेशादाशापाशविनाशनः । तपोऽन्य इश्वरं चारुचारित्रज्ञानदर्शनः ॥१३॥ ननन्द नन्दिषेणाख्यस्तपसोत्पन्नलब्धिभिः । एकादशाङ्गभृत्साधुः सोढाशेषपरीषहः ॥१३५॥ उपवासविधिर्यो यः शासनेऽन्यातिदुष्करः । तस्य धैर्यवतः साधोः स सर्वः सुकरोऽभवत् ॥१३६॥ आचार्यग्लानशैक्ष्यादिदशभेदमुदीरितम् । वैयावृत्यतपश्चक्रे सविशेषमसावृषिः ॥१३७॥ महालब्धिमतस्तस्य वैयावृत्योपयोगि यत् । वस्तु तचिन्तितं हस्ते भेषजाद्याशु जायते ॥१३॥ तपो वर्षसहस्राणि बहूनि तपतोऽस्य च । वैयावृत्यं तपः शक्रः शशंस सुरसंसदि ॥१३॥ काले संप्रति साधूनां वैयावृत्यं करोति यः । नन्दिषेणः परो जातो जम्बूद्वीपस्य भारते ॥१४॥ यद्येन चिन्तितं पथ्यमनुलाधसुदृष्टिना । तत्तस्य क्षिप्रमक्षणं स संपादयति क्षमी ॥१४॥ कारण प्राणरहित हो गयो ॥१२८।। अब वह राजगृह नगरमें मामाके घर रहने लगा। वहाँ 'यह हमारे पतिका भानजा है' यह सोचकर बुआने उसका पालन-पोषण किया ।।१२९।। इसका शरीर मलसे ग्रस्त था. शरीरसे छागके बच्चेके समान तीव्र गन्ध आती थी, केश रूखे तथा बिखरे हए थे. वह मैले-कुचैले वस्त्र पहने रहता था और उसकी आँखें स्वभावसे ही पीली थीं ॥१३०|| इतनेपर भी वह अपने मामा दमरककी पुत्रियोंके साथ विवाह करना चाहता था। परन्तु विवाह करना तो दूर रहा घृणा करनेवाली उन पुत्रियोंने उसे घरसे निकाल दिया जिससे वह बहुत दुःखी हुआ ॥१३१।। अन्त में वह दुर्भाग्यरूपी अग्निकी शिखाओंसे झुलसकर दूंठके समान मलिन हो गया और पतंगकी तरह कूदकर मरनेकी इच्छासे वैभार गिरिपर गया परन्तु मुनियोंने उसे रोक लिया ॥१३२॥ तदनन्तर धर्म-अधर्मका फल सुनकर उमने अपने-आपकी बहुत निन्दा की और शान्त हो संख्य नामक मुनिराजके चरण मूलमें दीक्षा धारण कर ली ।।१३३।। गुरुके सम्यक् उपदेशसे आशारूपी पाशको नष्ट कर वह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्रका धारक हो गया और अन्य मनुष्योंके लिए दृश्चर तप तपने लगा ॥१३४|| उसका नन्दिषेण नाम था. वह तपके प्रभावसे उत्पन्न ऋद्धियोंसे युक्त हो गया, ग्यारह अंगका धारी एवं समस्त परीषहोंको सहनेवाला उत्तम साधु हो गया ।।१३५।। शास्त्रोंमें जो-जो उपवास दूसरोंके लिए अत्यन्त कठिन थे वे सब उस धैर्यशाली साधुके लिए सरल हो गये ||१३६।। आचार्य, ग्लान, शैक्ष्य आदिके भेदसे जिसके दश भेद बताये गये हैं उस वैयावृत्य तपको वह विशेष रूपसे करता था ॥१३७॥ वह मुनि बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंसे युक्त था इसलिए वैयावृत्यमें उपयोग आनेवाली जिस औषधि आदिका वह विचार करता था वह शीघ्र ही उसके हाथमें आ जाती थी॥१३॥ इस प्रकार मुनि नन्दिषेणको तप करते हुए जब कई हजार वर्ष बीत गये तब एक दिन इन्द्रने देवोंको सभामें उसके वेयावत्य तपकी प्रशंसा की ॥१३९।। इस समय जम्बू द्वीपके भरत क्षेत्रमें जो साधुओंकी वैयावृत्य करता है वह नन्दिषेण मुनि सबसे उत्कृष्ट है ।।१४०।। क्योंकि रोगसे पीड़ित मुनि जिस पथ्यकी इच्छा करता है उसे क्षमाको धारण करनेवाला नन्दिषेण मुनि शीघ्र ही पूर्ण कर देता है ॥१४१।। गृहस्थकी तो बात ही क्या १. मणीमयः म.। मलीमयः ग., ङ.। २. वृतः म.। ३. अस्मादग्रे 'तपोलब्धिप्रभावेन वैयावृत्यं करोति सः इति 'ख' पुस्तकेऽधिकः । ४. रोगयुक्तसुदृष्टिना 'उल्लाघो निर्गतो गदात' इति कोषः। न उल्लाघोऽनुल्लाघः स चासौ सुदृष्टिश्च तेन । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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