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________________ अष्टादशः सर्गः सप्तभिः पञ्चभिः पूंज्या वर्षैर्द्वादशमिश्च ते । अन्ते सिद्धशिलारूढाः सिद्धा राजगृहे पुरे ॥ ११९॥ अन्तर्वनी प्रसूता सा पूर्वनन्दयशाः सुतम् । धनमित्रं यथा योग्यं संस्थज्य तपसि स्थिता ॥ १२०॥ पुत्रान् सिद्ध शिलारूढान् प्रायोपगमनस्थितान् । वन्दित्वा पुत्रमातृत्वमावृणोत् स्नेहमोहिता ॥ १२१ ॥ स्नेह गहरमोहिन्यौ भगिन्यौ च तदैच्छताम् । सोदरत्वं मवेऽन्यत्र किं वा स्नेहस्य दुष्करम् ॥१२२॥ माता सुताः समाराध्य देवा भूत्वाच्युतेऽखिलाः । द्वाविंशतिसमुद्रान्तं कालं भुक्त्वा परं सुखम् ॥ १२३ ॥ अवतीर्य ततो भूमिं देवीदुहितृदेहजाः । तबैवं भूप ! चित्रा हि परिणामवशाद् गतिः ॥ १२४॥ बमाण भगवानन्ते वसुदेव मवान्तरम् । प्रणिधानपरोस्केर्ण नरदेवसमान्तरे ॥ ३२५॥ कश्चिद्भवाब्धिदुःखोर्मिनिमग्नोन्मग्नताकुलः । प्राणी प्राप युगच्छिद्रं कीलवत् नृभवान्तरम् ॥ १२६ ॥ मागधाभिधदेशेऽसौ शालिग्रामेऽग्रजन्मनोः । अभूदुर्विधैयोस्तोकं 'स्तोकं नोपनयत् सुखम् ॥१२७॥ गर्भस्थेऽपि पिता तस्मिन्नर्भकेऽमृत मातृका । दुर्भगस्याष्टवर्षस्य 'निर्मा मातृष्वसा शुचा ॥ १२८ ॥ २७१ बनारस आये और वहाँ केवलज्ञान उत्पन्न कर पृथिवीपर विहार करने लगे ।। ११८ || पूजनीय धनदत्त, सुमन्दर गुरु और मेघरथ मुनि क्रमसे सात वर्ष, पाँच वर्ष और बारह वर्ष तक पृथिवीपर विहार कर अन्तमें राजगृह नगरसे सिद्धशिलापर आरूढ़ हुए - मोक्ष पधारे ॥ ११९ ॥ उस समय सेठ धनदत्तकी स्त्री नन्दयशा गर्भवतो थी इसलिए दीक्षा नहीं ले सकी थी परन्तु जब उसके धनमित्र नामका पुत्र हो गया और वह योग्य बन गया तब वह भी उसे छोड़ तप करने लगो ॥१२०॥ एक दिन सेठ धनदत्तके पुत्र धनपाल आदि नौके- नौ मुनिराज प्रायोपगमन संन्यास लेकर सिद्धशिलावर विराजमान थे। मुनियोंकी माता आर्यिका नन्दयशाने उन्हें देख वन्दना की और स्नेहसे मोहित हो निदान किया कि मैं अग्रिम भवमें भी इनकी माता बनूं ॥ १२१ ॥ मुनियोंकी बहन सुदर्शना और सुज्येष्ठा नामक आर्यिकाओंने भी स्नेहरूपी गर्त में मोहित हो निदान किया कि ये अग्रिम भव में भी हमारे भाई हों । सो ठोक ही है क्योंकि स्नेहके लिए क्या कठिन है ? ॥१२२॥ अन्तमें 'समाधि धारण कर माता, पुत्र और पुत्रियाँ - सबके सब अच्युत स्वर्ग में देव हुए। तदनन्तर बाईस सागर तक उत्कृष्ट सुख भोगकर वहाँसे चले और पृथिवीपर आकर हे राजन् ! तुम्हारी स्त्री, त्रियाँ तथा पुत्र हुए हैं सो ठीक ही है क्योंकि परिणामोंके अनुसार नाना प्रकारकी गति होती ही है । भावार्थ - नन्दयशाका जीव तो तुम्हारी रानी सुभद्रा हुआ है, सुदर्शना और सुज्येष्ठाके जीव क्रमसे कुन्ती ओर माद्री हुए हैं तथा धनपाल आदिके जीव वसुदेवके सिवाय नो पुत्र हुए हैं ॥१२३-१२४।। तदनन्तर भगवान् सुप्रतिष्ठ केवली, ध्यानमें तत्पर एवं कान खड़े कर बैठे हुए मनुष्य और देवोंकी उस सभा में वसुदेवके भवान्तर कहने लगे - ||१२५ || जिस प्रकार समुद्रको लहरोंमें तैरती हुई कील एके छिद्रको बड़ी कठिनाईसे प्राप्त कर सकती है उसी प्रकार संसार-सागरको दुःखरूपी लहरोंमें डूबता और उबरता हुआ यह प्राणी मनुष्य भवको बड़ी कठिनाईसे प्राप्त कर पाता है ॥ १२६ ॥ | इसी पद्धतिसे वसुदेवका जीव मागध देशके शालिग्राम नामक नगर में रहनेवाले अत्यन्त ब्राह्मण और ब्राह्मणीके यहाँ ऐसा पुत्र हुआ जिसे थोड़ा भी सुख प्राप्त नहीं था || १२७|| जब वह गर्भ में था तब पिता मर गया । और उत्पन्न होते ही माता मर गयी इसलिए मौसीने इसका पालन-पोषण किया परन्तु वह लगभग आठ वर्षका ही हो पाया था कि उसकी मौसी भी शोकके १. पूजा म. । २. परोत्कर्म म. । ३. दरिद्रयोः । ४. पुत्रः । तोकः क. । ५. इतः आरभ्य १३१ श्लोकपर्यन्ताः श्लोकाः 'ख' पुस्तके न सन्ति । 'क' पुस्तकेऽपि पश्चात् केनापि पादटिप्पण्यां योजिताः । ६. शोकेन मातृष्व सापि निर्भा दीप्तिरहिता जाता मृतेत्यर्थः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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