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________________ -~- ~~-~~ ~~-~~~-~ २४६ हरिवंशपुराणे साक्षाच्चकार युगपत्सकलं स मेयमेकेन केवलविशद्ध विलोचनेन । नाथस्तदा न हि निरावरणो विवस्वानभ्युद्गतः क्रमसहायपरः प्रकाश्ये ॥६५॥ नेमुः ससप्तपदमेत्य निजासनेभ्यः सर्वेऽहमिन्द्र निवहाः कृतमौलिहस्ताः । तं प्रापुरभ्युदिततोषविशेषचित्ताः शेषा महेन्द्रसरसन्ततयः समन्तात् ॥६६॥ भक्त्याऽर्चयन् त्रिभुवनेश्वरमानवेन्द्रास्तं देवमभ्युदितचम्पकचैत्यवृक्षम् । सत्प्रातिहार्यविभवातिविशेषरूपमार्हन्त्यमद्भुतमचिन्त्यमनन्तमेतम् ॥६७॥ स द्वादशस्वथ गणेपु निषण्णवत्सु स द्वादशाङ्गमनुयोगपथं जिनेन्द्रः । धर्म विशाखगणिना विनयेन पृष्टः संमाष्य तीर्थमवनौ प्रकटं प्रचक्रे ॥६८॥ कल्याणपूजन मिनस्य तुरीयमिन्द्राः कृत्वा यथायथमगुः प्रणिपातपूर्वम् । देशान् जिनोऽपि विजहार बहून् बहूनां धर्मामृतं तनुभृतां धनवत्प्रवर्षन् ॥१९॥ अष्टौ च विंशतिरिनस्य जिनेन्द्रचर्याः क्रोडीकृताखिलचतुर्दशपूर्वशास्त्राः । त्रिंशत्सहस्रगणना परिषद् यतीनां नानागुणैरजनि सप्तविधः स संघः ॥७॥ स्युस्तत्र पञ्चशतपूर्वधरा यतीशा एकादिविंशतिसहस्रमिदाश्च शिक्षाः। अष्टादशैव गदितानि शतानि तेपु प्रत्येकमस्य मुनयोऽवधिकेवलाप्ताः ॥७१॥ द्वाविंशतिर्यतिशतानि तु वैक्रियाख्यास्तान्येव पञ्चदश ते विपुलास्तु मत्या। स्यादशैव हि शतानि विवान्तवैराः सद्वादिनो मुनिपतेः प्रथिताः समायाम् ॥७२॥ काल बिताकर भगवान्ने ध्यानरूपी अग्निके द्वारा घातिया कमरूपी ईन्धनकी विपुल राशिको दग्ध कर केवलज्ञानकी प्राप्तिसे मगसिर मासकी शुक्ल पंचमी तिथिको पवित्र किया ॥६४।। अब केवलज्ञानरूपी एक ही विशुद्ध लोचनसे भगवान् समस्त पदार्थों को एक साथ प्रत्यक्ष देखने लगे सो ठीक ही है क्योंकि जब निरावरण सूर्यका उदय होता है तब वह प्रकाशित करने योग्य पदार्थोके विषय में न तो क्रमकी अपेक्षा करता है और न दूसरेकी सहायताकी ही अपेक्षा करता है ॥६५॥ उस समय समस्त अहमिन्द्रोंने अपने-अपने आसनोंसे सात-सात डग आगे चलकर तथा हाथ जोड़ मस्तकसे लगा जिनेन्द्र भगवान्को परोक्ष नमस्कार किया और जिनके चित्तमें विशेष हर्ष प्रकट हो रहा था ऐसे शेष समस्त इन्द्र तथा देव सब ओरसे वहाँ आये ||६६|| जिनके चम्पक नामक चैत्य वृक्ष प्रकट हुआ था, जो अष्ट प्रातिहार्यरूपी वैभवसे अतिशय सुन्दर थे, और जो आश्चर्यकारी अचिन्त्य एवं अन्तातीत आहंन्त्य पदको प्राप्त थे ऐसे देवाधिदेव मुनिसुव्रतनाथको, तीनों लोकोंके स्वामी तथा राजाओंने भक्तिपूर्वक पूजा को ॥६७॥ तदनन्तर जब बारह गण बारह सभाओं में यथास्थान बैठ गये तब विशाख नामक गणधरने विनयपूर्वक अनुयोग द्वारसे द्वादशांगका स्वरूप पूछा उसके उत्तरमें भगवान्ने धर्मका निरूपण कर पृथिवीपर तीर्थ प्रकट किया ॥६८॥ इन्द्रादि देव भगवान्के चतुर्थं कल्याणककी पूजा कर नमस्कार करते हुए यथास्थान चले गये और भगवान् भी अनेक प्राणियोंके लिए धर्मामृतकी वर्षा करते हुए अनेक देशों में विहार करने लगे ॥६९।। भगवान् मुनिसुव्रतनाथके सम्पूर्ण चौदह पूर्वोको जाननेवाले अट्ठाईस गणधर थे, और तीस हजार मुनि थे। भगवान्का यह संघ नाना गुणोंसे सात प्रकारका था ॥७०॥ उस संघमें पांच सौ मुनिराज पूर्वधारो थे, इक्कीस हजार शिक्षार्थी थे, अठारह सो अवधिज्ञानी थे, इतने ही केवलज्ञानी थे, बाईस सौ विक्रियाऋद्धिके धारक थे, पन्द्रह सौ विपुलमति मनःपर्यय ज्ञानके धारक थे, बैर को दूर करनेवाले बारह सौ प्रसिद्ध वादी थे, पचास हजार आर्यिकाएँ थीं, एक लाख अणुव्रत, गुणव्रत और शिक्षाव्रतोंको धारण करनेवाले श्रावक थे, और १. मेकं म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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