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________________ षोडशः सर्गः २४५ भूभृत्सहस्रपरिवारभृदेष बभ्रे दीक्षां समक्षमखिलस्य जगत्त्रयस्य । तन्मूर्धजानधिनिधाय निजोत्तमाङ्गे शक्रश्चकार विधिना सुपयःपयोधौ ॥५७॥ कृत्वामराश्च जिननिष्क्रमणं तृतीयकल्याणपूजनममी जगुरीश्वरोऽपि । ज्ञानेश्चतुभिरनुगैश्च सहस्रसंख्येस्तैः पार्थिवैदिनमणिः किरणैरिवाभात् ॥५४॥ षष्ठोपवासिनि परेद्यरिनेऽवतीर्ण भिक्षाविधिप्रकटनाय कुशाग्रपुर्याम् ।। भिक्षां ददौ वृषभदत्त इति प्रसिद्धः 'सत्यायसं सविधिना मुनिसुव्रताय ॥५१॥ स्वाधीनमप्रतिहतं स्थितिभुक्तियुक्तं सत्पाणिपात्रमधिपेन विधानपूर्वम् । प्रावर्ति वर्तनसुवर्तनसाधुयोग्यं तीर्थे निजे स्थितिविदा जिलभास्करेण ॥६०॥ चित्रं तदा हि परमान्नमृषीन्द्रपाणी शुद्धयान्वितेन ददता परिनिष्टशेषम् । शेषैरशेषयतिभिश्च सहस्रसंख्यैर्वोभुज्यमानमपरैश्च ययौ न निष्टा ॥६१॥ नेदुस्ततस्त्रिदशदुन्दुभयो निनादाः साधुस्वनः सकलमम्बरमाततान । वायुर्ववौ सुरभिरद्भुतपुष्पवृष्टिर्योम्नः पपात महती वसुनश्च धारा ॥२॥ आश्चर्यपञ्चकमिदं चिरमम्बरस्था देवा विकृत्य परमं परदुर्लभं ते । संपूज्य दानपतिमर्जितपुण्यपुञ्ज जग्मुर्जिनोऽपि विजहार विहारयोग्यम् ॥६३॥ छद्मस्थकालमतिवाह्य समासवर्ष संमार्गशीर्षसुतिथिं सितपञ्चमी तु । ध्यानाग्निदग्धघनघातिसमित्समृद्धिः कैवल्यलामविभवेन चकार पूताम् ॥६॥ पालकीपर आरूढ़ होकर भगवान् वनमें गये तथा वहाँ कार्तिक शुक्ल सप्तमीके दिन वेलाका नियम लेकर दीक्षा लेने के लिए उद्यत हए॥५६॥ उस समय एक हजार राजाओंके साथ भगवान्ने समस्त जगत् त्रयके समक्ष दीक्षा धारण की। उन्होंने अपने शिरके केश उखाड़कर फेंक दिये और इन्द्र ने उन केशोंको पिटारेमें रखकर विधिपूर्वक क्षीरसमुद्र में क्षेप दिया ।।५७|| इस प्रकार देव, भगवान्का निष्क्रमणकल्याणक तथा उसकी पूजा कर यथास्थान चले गये और भगवान् भी चार ज्ञानों तथा एक हजार अनुगामी राजाओंसे उस तरह सुशोभित होने लगे जिस तरह कि एक हजार किरणोंसे सूर्य सुशोभित होता है ।।५८|| वेलाका उपवास धारण करनेवाले भगवान् जब आगामी दिन, आहारकी विधि प्रकट करनेके लिए कुशाग्रपुरोमें अवतीर्ण हुए तब वृषभदत्त नामसे प्रसिद्ध पुरुषने उन्हें विधिपूर्वक खोरका आहार दिया ||५९|| उस समय मर्यादाके जाननेवाले भगवान् मुनिसुव्रतरूपी सूर्यने अपने तीर्थमें निर्दोष चारित्रके धारक मुनियोंके योग्य आहारकी वह विधि प्रवृत्त की जो स्वाधीन थी, बाधासे रहित थी, खड़े होकर जिसमें भोजन करना पड़ता था, जिसमें पाणिपात्रमें भोजन होता था और दानपति जिसमें विधिपूर्वक भोजन प्रदान करता था ॥६०॥ आश्चर्यकी बात थी कि उस समय शुद्धिसे सहित वृषभदत्तने मुनिराजके हाथमें जो खीर दी थी उससे बाकी बची खोरको हजारोंको संख्यामें अन्य मुनियोंने खाया तथा घरके अन्य लोगोंने भी बार-बार ग्रहण किया फिर भी वह समाप्तिको प्राप्त नहीं हुई ॥६१।। तदनन्तर विशाल शब्द करते हुए देव दुन्दुभि बजने लगे. धन्य-धन्यके शब्दने समस्त आकाशको व्याप्त कर दिया. सगन्धित वाय, लगी, आश्चर्यकारी फूलों की वर्षा होने लगो और आकाशसे बड़ी मोटी रत्नोंकी धारा पड़ने लगी ॥६२।। दूसरोंके लिए अतिशय दुर्लभ इस पंचाश्चर्यको आकाशमें खड़े देवोंने चिरकाल तक किया। तदनन्तर पुण्यराशिका संचय करनेवाले दानपतिकी पूजा कर वे देव लोग यथास्थान चले गये और भगवान् भी विहारके योग्य स्थानमें विहार कर गये ॥६३।। तत्पश्चात् तेरह महीनेका छद्मस्थ १. सत्पात्रसं म.। २. शुद्धान्वितेन । ३. -रशेषपतिभिश्च । ४. समाप्तिम् । ५. त्रयोदशमासात्मकम् । ६. पूतम् म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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