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________________ २४४ हरिवंशपुराणे इत्थं मतिश्रुतयुतावधिबोधनेत्रे 'जाते स्वयंभुवि तदा स्वयमेव बुद्धे । आकम्पितासनमभूदमरेन्द्र वृन्दं सर्वार्थसिद्धिसुरपर्यवसानमाशु ॥४९॥ लौकान्तिका ललितकुण्डलहारशोभाः सारस्वतप्रभृतयो निभृताः सिताभाः । आगत्य मौलिमिलिताञ्जलयः किरन्तः पुष्पाञ्जलीनिति जिनं नुनुवुनमन्तः ॥५०॥ वर्धस्व नन्द जय जीव जिनेन्द्रचन्द्र ! विज्ञानरश्मिहतमोहतमोवितान । 'निर्बन्धुबन्धुतम ! भव्यकुमुदतीनां तीर्थस्य विंशतितमस्य हितस्य कर्ता ॥५॥ त्वं वर्त्तय त्रिभुवनेश्वर ! धर्मतीर्थ यत्रायमुग्रभवदुःखैशिखिप्रतप्तः । स्नास्वा जनस्त्यजति मोहमलं समस्तमहाय याति च शिवं शिवलोकमग्रयम् ॥५२॥ चारित्रमोहपरमोपशमात्प्रबुद्धं लौकान्तिका इति जिनं प्रतिबोधयन्तः । नान्यज गुर्निजनियोगनिवेदनेषु युक्ता हि यान्ति न पुनः पुनरुक्तदोषम् ॥५३॥ सौधर्मपूर्वविबुधाश्च चतुर्णिकाया नानाविमाननिवहस्थगितान्तरिक्षाः । संप्राप्य नाथममिषिच्य सुगन्धितोयैस्तं मषितं विदधुरद्भुतमषणाद्यैः ॥५४॥ पुत्रं च सुनतमसौ मुनिसुव्रतेशः प्राभावतेयमभिराज्यपदेऽभ्यषिञ्चत् । श्वेतातपत्रसितचामरविष्टराणि सोऽलञ्चकार हरिवंशनमःशशाङ्कः ॥५५॥ भूपोद्धता नभसि देवगणैरुदूढामारूढवान् सुरुचिरां शिविका विचित्राम् । यातो वनं विदितकार्तिकशुक्लपक्षे षष्ठोपवासकृदुपाश्रितसप्तमीकः ॥५६॥ हूँ और सबसे पहले अपना उत्कृष्ट प्रयोजन सिद्ध कर पश्चात् परहितके लिए यथार्थ तीर्थकी प्रवृत्ति करूंगा ॥४८|| इस प्रकार मति, श्रुत और अवधिज्ञानरूपी नेत्रोंसे युक्त स्वयम्भू भगवान् जब स्वयं प्रतिबुद्ध हो गये तब सर्वार्थसिद्धि तकके समस्त इन्द्रोंके आसन शीघ्र ही कम्पायमान हो गये ।।४९।। उसी समय सुन्दर कुण्डल और हारोंसे सुशोभित, निश्चल मनोवृत्ति और श्वेत दीप्तिके धारक सारस्वत आदि लौकान्तिक देव आ गये और हाथ जोड़ मस्तकसे लगा पुष्पांजलियां बिखेरते हुए नमस्कार कर जिनेन्द्र भगवान्को इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥५०॥ हे जिनेन्द्र चन्द्र ! हे सम्यग्ज्ञानरूपी किरणोंसे मोहरूपी अन्धकारके समूहको नष्ट करनेवाले ! आप वृद्धिको प्राप्त हों, समृद्धिमान् हों, जयवन्त रहें, चिरकाल तक जीवित रहें, आप बन्ध रहित हैं, भव्य जीवरूपी कुमुदिनियोंके उत्तम बन्धु हैं और हितकारी बीसवें धर्मतीर्थके प्रवर्तक है ॥५१॥ हे त्रिलोकीनाथ! आप उस धर्मतीर्थको प्रवृत्ति करें जिसमें संसारके तीव्र दुःखरूपी अग्निसे सन्तप्त प्राणी स्नान कर समस्त मोहरूपो मलको छोड़ दें और शीघ्र हो आनन्ददायो उत्तम शिवालयको प्राप्त हो जावें ॥५२।। भगवान् , चारित्र मोहकर्मके परमोपशम (उत्कृष्ट क्षयोपशम) से स्वयं हो प्रतिबोधको प्राप्त हो गये थे इसलिए उन्हें उक्त प्रकारसे सम्बोधते हुए लौकान्तिक देवोंने अन्य कुछ नहीं कहा सो ठोक ही है क्योंकि योग्य मनुष्य अपने नियोगकी पूर्ति में कभी पुनरुक्त दोषको प्राप्त नहीं होते ॥५३।। उसी समय नाना विमानोंके समूहसे आकाशको आच्छादित करते हुए सौधर्मेद्र आदि चारों निकायके देव आ पहुँचे। आकर उन्होंने सुगन्धित जलसे भगवान्का अभिषेक किया और आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले, उत्तमोत्तम आभषण आदिसे उन्हें अलंकृत किया ।।५४|| भगवान् मुनिसुव्रतनाथने अपनी प्रभावती स्त्रोके पुत्र सुव्रतका राज्यपदपर अभिषेक किया और हरिवंशरूपी आकाशमें चन्द्रमाके समान सुशोभित सुव्रतने भी सफेद छत्र, सफेद चामर तथा सिंहासनको अलंकृत किया ॥५५।। तदनन्तर पहले जिसे भूमिपर राजाओंने उठाया था और उसके बाद जिसे देवलोग आकाशमें उठा ले गये थे ऐसी अतिशय सुन्दर विचित्र १. ज्ञाने । २. निर्बन्ध-क. । ३. दुःखाग्नि । ४. योग्याः । ५. प्रभावत्याः अपत्यं पुमान् प्राभावतेयः तम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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