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________________ षोडशः सर्ग: २४७ पञ्चाशदात्मकसहस्रमिदास्तदार्या: शिक्षागुणवतधरा गृहिणोऽपि लक्षाः । सम्यक्त्वपूतमनसो वनितास्त्रिलक्षाः सभ्योडुभिः परिवृतश्च बभौ जिनेन्दुः ॥७३॥ त्रिंशद्गुणप्रथितवर्षसहस्रजीवी प्राक् पञ्चसप्ततिशताब्दकुमारकालः । राज्येऽपि पञ्चदशवर्षसहस्रमोगी सत्संयमेन विजहार स शेषकालम् ॥७४॥ अन्ते स सम्मदविधायिवनान्तकान्तं सम्मेदशैलमधिरुह्य निरस्तबन्धः । बन्धान्तकृन्मुनिसहस्रयुतो जगाम मोक्षं महामुनिपतिर्मुनिसुव्रतेशः ॥७५॥ माधत्रयोदशतिथौ सितपक्षभाजि मासोपसंहृतविहारविसृष्टदेहे ।। स्थित्वाऽपराह्नसमये वरपुष्ययोगे सिद्धे जिने ननु महं विदधुः सुरेन्द्राः ॥७६॥ षड्वर्षलक्षपरिमाणमिनस्य तस्य प्रावर्त्तत प्रविततं मुवि धर्मतीर्थम् । विद्यावबोधबुधितार्थमुनिप्रभाव देवागमाविरतिवद्धितलोकहर्षम् ॥७७॥ विंशस्य तस्य चरितस्य जिनस्य लोके कल्याणपञ्चकविभूति विभावयन् यः । भक्त्या शृणोति पठति स्मरतीदमस्मिन् मन्यो जनो भजति सिद्धि सुखं स शीघ्रम् ॥७८॥ एवं वसन्ततिलकप्रचुरप्रसूनमालामिमां समधिरोप्य विनूतवृत्तः । विघ्नान् विधूय विदधातु समाधिबोधी धीरो जिनो जितमवो मुनिसुव्रतो नः ॥७९॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती मुनिसुव्रतनाथपञ्चकल्याणवर्णनो नाम षोडशः सर्गः । सम्यग्दर्शनसे पवित्र हृदयको धारण करनेवाली तीन लाख श्राविकाएं थीं। इन सभासद रूपी नक्षत्रोंसे घिरे हुए भगवानरूपी चन्द्रमा अतिशय सुशोभित हो रहे थे ॥७१-७३।। भगवान्की पूर्ण आयु तीस हजार वर्षकी थी, उसमें साढ़े सात हजार वर्षका कुमारकाल था, पन्द्रह हजार वर्ष तक उन्होंने राज्यका भोग किया और शेष साढ़े सात हजार वर्ष तक संयमी होकर विहार किया ||७४।। महामुनियोंके अधिपति मुनिसुव्रत भगवान् आयुके अन्त समयमें हर्षको उत्पन्न करनेवाले वन-खण्डोंसे सुशोभित सम्मेदाचलपर आरूढ़ होकर कर्मोके बन्धसे रहित हुए और बन्धका नाश करनेवाले एक हजार मुनियोंके साथ वहींसे मोक्ष गये ॥७५॥ मोक्ष जानेके एक माह पूर्व भगवान्ने विहार आदि बन्द कर योगनिरोध कर लिया था तथा माघ शुक्ला त्रयोदशीके दिन अपराह्न कालमें पुष्य नक्षत्रका उत्तम योग रहते हुए पद्मासनसे मोक्ष प्राप्त किया था। मुक्त होनेपर इन्द्रने निर्वाणकल्याणककी पूजा की थी ॥७६॥ भगवान मनिसुव्रतनाथका धर्मतीर्थ पृथिवीपर छह लाख वर्ष तक अखण्ड रूपसे चलता रहा। उनके तीर्थमें विद्याओंका परिज्ञान होनेसे मुनियोंका पूर्ण प्रभाव था, और देवोंका निरन्तर आगमन होते रहनेसे लोगोंका हर्ष बढ़ता रहता था ॥७७।। गौतम स्वामी कहते हैं कि संसारमें जो भव्य प्राणी बीसवें तीर्थंकरके पंचकल्याणकविभूतिसे युक्त इस चरितका चिन्तवन करता है, भक्तिसे इसे सुनता है, पढ़ता है, और इसका स्मरण करता है वह शीघ्र ही मोक्षके सुखको प्राप्त होता है ।।७८। जिनसेनाचार्य कहते हैं कि इस तरह वसन्ततिलका छन्दसे निर्मित (पक्षमें वसन्तऋतुके श्रेष्ठ नाना पुष्पोंसे निर्मित) पुष्पोंकी माला समर्पित कर जिनके चरित्रको स्तुति की गयी है वे संसारको जीतनेवाले धीर-वीर मुनिसुव्रत जिनेन्द्र विघ्नोंको नष्ट कर हमारे लिए समाधि (चित्तकी स्थिरता ) और बोधि ( रत्नत्रयकी प्राप्ति ) करावें ॥७९।। इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें मुनिसुव्रतनाथ भगवान्के पंचकल्याणकोंका वर्णन करनेवाला सोलहवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥१६॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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