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________________ २२० हरिवंशपुराणे वर्णसङ्करविक्षेपिधनुषेन्द्रधनुर्गुणैः । यस्याधिक्षिप्तमेक्षिप्तवर्णसङ्करदोषकम् ॥७॥ दर्शनीयतमाङ्गस्य संगतस्य युवश्रिया । अदृष्टविग्रहोऽनङ्गो रूपेणास्य समः कथम् ॥८॥ धर्मशास्त्रार्थकुशलः कलागुणविशेषवान् । निग्रहेऽनुग्रहे शक्तः प्रजानामनुपालकः ॥९॥ सोऽवरोधनराजीववनराजीमधुव्रतः । ऋतून्मानयति प्राप्तानकृतत्रिगुणक्षतिः ॥१०॥ अथ प्राप्तो वसन्तर्तुः सुमुखद्युतिरुद्यमी । पुष्पपल्लवरागश्रीवनमालामनोहरः ॥११॥ नवपल्लवरागाढ्याश्चूताश्चेतोहरा बभुः । वनमालानुरागस्य सूचकाः सुमुखस्य च ॥१२॥ जज्वलुचलनज्वालालीलाः किंशुकराशयः । वियुज्येवानुयुक्तानां विमुक्ता धिरहाग्नयः ॥१३॥ रणन्नू पुरचारुस्त्रीकोमलक्रमताडितः। नवाशोकयुवोद्भिन्नपल्लवाङ्गरुहो बभौ ॥१४॥ अखण्डमधुगण्डूषपानपूरितदौहृदः । बकुलोऽपूरयत्पुष्पैः प्रमदाजनदौहृदम् ॥१५॥ चक्रे कुरवको यूनां शिलीमुखरवैः सुखम् । सुखिनां यः स एवाभूदितरेषां यथाश्रुतिः ॥१६॥ रहा था, और जिस प्रकार सूर्य सुखी-उत्तम ख-आकाशसे सहित होता है उसी प्रकार वह राजा भी सुखी-सुखसे सहित था ॥६॥ राजा सुमुखके धनुषने अपने गुणोंसे इन्द्रधनुषको तिरस्कृत कर दिया था क्योंकि राजा सुमुखका धनुष वर्णसंकरविक्षेपि-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन वर्गों के संकर दोषको दूर करनेवाला था और इन्द्रधनुष अक्षिप्तवर्णसंकरदोषकं-लाल, पीले, नीले, हरे आदि वर्गों के संकर-संमिश्रणरूपी दोषको दूर नहीं कर सका था ॥७॥ तारुण्य-लक्ष्मीसे सहित होने के कारण राजा सुमुखका शरीर अत्यन्त सुन्दर था. अतः जिसका शरीर ही नहीं दिखाई देता ऐसा कामदेव सौन्दर्यमें उसके समान कैसे हो सकता था ॥८॥ वह राजा धर्मशास्त्रके अर्थ करने में कुशल था, कला और गुणोंसे विशिष्ट था, दुष्टोंके निग्रह और सज्जनोंके अनुग्रह करनेमें समर्थ था और प्रजाका सच्चा रक्षक था ॥९॥ वह राजा अन्तःपुररूपी कमलवनको पंक्तिका भ्रमर था और धर्म, अर्थ, काममें परस्पर बाधा नहीं पहुंचाता हुआ आगत ऋतुओंका सम्मान करता था अर्थात् ऋतुओंके अनुकूल भोग भोगता था ।।१०।। अथानन्तर किसी समय वसन्त ऋतुका आगमन हुआ। वह वसन्त ऋतु ठीक सुमुख राजाके ही समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार सुमुख राजा उद्यमी-उद्यमसे सम्पन्न था उसी प्रकार वसन्त ऋतु भी उद्यमी-अपना वैभव बतलानेमें उद्यमसम्पन्न थी, जिस प्रकार राजा सुमुख फूलों और पल्लवोंके रागसे युक्त वनमाला नामक स्त्रीके मनको हरण करनेवाला था उसी प्रकार वसन्त ऋतु भी फूलों और पल्लवोंकी लाल-लाल शोभासे युक्त वनपंक्तियोंसे मनोहर थी ॥११|| मनुष्योंके मनको हरण करनेवाले आमोंके वृक्ष उस समय नये-नये पल्लवोंकी लालिमासे युक्त हो गये थे जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो राजा सुमुखके लिए वनमाला-वनपंक्ति ( पक्षमें वनमाला नामक स्त्री ) के अनुरागको सूचना ही दे रहे हों ।।१२।। अग्निज्वालाओंकी शोभाको धारण करनेवाले टेसूके वृक्ष ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो विरहके अनन्तर मिले हुए स्त्री-पुरुषोंके द्वारा छोड़ी हुई विरहाग्नि ही हो ॥१३।। रुनझुन करनेवाले नूपुरोंसे सुन्दर स्त्रीके कोमल पदाघातसे ताड़ित होनेके कारण जिसमें पल्लवरूपी रोमांच निकल आये थे ऐसा अशोक वृक्षरूपी नवीन युवा उस समय अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ।।१४।। अखण्ड मद्यके कुल्लोंके पान करनेसे जिसका दोहला पूर्ण हो गया था ऐसे वकुल वृक्षने अपने फूलोंसे स्त्री जनोंकी अभिलाषाको पूर्ण कर दिया था ॥१५।। जो करवक वक्ष सुखी यवाओंके लिए भ्रमरोंके शब्दसे सुख उत्पन्न कर रहा था वही कुरवक दुखी ( विरही ) युवाओंके लिए सार्थक नामका धारक ( कु-खोटे रवक-शब्द कराने१. अक्षिप्तो वर्णसङ्करदोषो येन तत् । इन्द्रधनुषो विशेषणमिदम् । २. अदृष्टविग्रहानङ्गो म. । ३. यथाश्रुति म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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