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________________ त्रयोदशः सर्गः अनुभूय चिरं लक्ष्मी भूपतिर्भरतेश्वरः । आदित्ययशसं पुत्रमभिषिच्य भुवो विभुः ॥१॥ दीक्षा जग्राह जैनेन्द्रीमुग्रामात्मपरिग्रहाम् । दुर्निग्रहेन्द्रियग्राममृगनिग्रहवागुराम् ॥२॥ पञ्चमुष्टिमिरुत्पाट्य त्रुट्यबन्धस्थितिः कचान् । लोचानन्तरमेवापद् राजन् श्रेणिक ! केवलम् ॥३॥ द्वात्रिंशत्रिदशेन्द्रैः स कृतकेवल पूजनः । दीपको मोक्षमार्गस्य विजहार चिरं महीम् ॥४॥ पूर्वलक्षाः कुमारत्वे तस्यागुः सप्तसप्ततिः । साम्राज्ये षट् प्रमोरेका श्रामण्ये विश्वदृश्वनः ॥५॥ शैलं वृषभसेनाद्यैः कैलासमधिरुह्य सः । शेषकर्मक्षयान्मोक्षमन्ते प्राप्तः सुरैः स्तुतः ॥६॥ आदित्ययशसः पुत्रो जातः स्मितयशःश्रतिः । श्रियं तस्मै वितीर्यासौ तपसा प्राप निवृतिम् ।।७।। बलस्तस्मादभूत्पुत्रः सुबलोऽतो महाबलः । ततोऽतिबलनामा च तस्यामृतबलः सुतः ॥८॥ सुभद्रः सागरो भद्रो रवितेजाः शशी ततः । प्रभूततेजास्तेजस्वी तमनोऽन्यः प्रतापवान् ॥९॥ अतिवीर्यः सुत्रीयोऽतस्तथोदितपराक्रमः । महेन्द्रविक्रमः सूर्य इन्द्रद्युम्नो महेन्द्रजित् ॥१०॥ प्रभविभरविध्वंसो वीतभीवृषभध्वजः । गरुडाको मृगाताख्य इत्याद्याः पृथिवीभृतः ॥११॥ आदित्यवंशसंभूताः क्रमेण पृथुकीर्तयः । सुते न्यस्तभराः प्रापुस्तपसा पेरिनितिम् ॥१२॥ अथानन्तर षट्खण्ड पृथिवीके स्वामी महाराज भरतने चिरकाल तक लक्ष्मीका उपभोग कर अर्ककीर्ति नामक पुत्रका अभिषेक किया और स्वयं अतिशय कठिन आत्मरूप परिग्रहसे युक्त, एवं कठिनाईसे निग्रह करने योग्य इन्द्रियरूपी मगसमहको पकडने के लिए जालके समान जिनदीक्षा धारण कर ली।।१-२।। गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन श्रेणिक! महाराज भरतने अपने समस्त पंचमुट्टियोंसे उखाड़कर फेंक दिये तथा उनके कर्मबन्धनको स्थिति इतनी जल्दी क्षीण हुई कि उन्होंने केशलोंचके बाद ही केवलज्ञान प्राप्त कर लिया ॥३॥ तदनन्तर बत्तीसों इन्द्रोंने आकर जिनके केवलज्ञानकी पूजा की थी और जो मोक्षमार्गको प्रकाशित करनेके लिए दीपकके समान थे ऐसे भगवान् भरतने चिरकाल तक पृथिवीपर विहार किया ॥४॥ सर्वदर्शी भगवान् भरतको आयु भी चौरासी लाख पूर्वको थी उसमें-से सतहत्तर लाख पूर्व तो कुमार कालमें बीते, छह लाख पूर्व साम्राज्य पदमें व्यतीत हुए और एक लाख पूर्व उन्होंने मुनि पदमें विहार किया ॥५॥ आयुके अन्त समय वे वृषभसेन आदि गणधरोंके साथ कैलास पर्वतपर आरूढ़ हो गये और शेष कर्मोका क्षय कर वहींसे उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया, देवोंने उनकी स्तुति-वन्दना को ॥६॥ राजा अर्ककोतिके स्मितयश नामका पुत्र हुआ। अककीर्ति उसे लक्ष्मी दे तपके द्वारा मोक्षको प्राप्त हुआ |७॥ स्मितयशके बल, बलके सुबल, सुबलके महाबल, महाबलके अतिबल, अतिबलके अमृतबल, अमृतबलके सुभद्र, सुभद्रके सागर, सागरके भद्र, भद्रके रवितेज, रवितेजके शशी, शशीके प्रभूततेज, प्रभूततेजके तेजस्वी, तेजस्वीके तपन, तपनके प्रतापवान्, प्रतापवान्के अतिवीर्य, अतिवीर्यक्रे सुवीर्य, सुवीर्यके उदितपराक्रम, उदितपराक्रमके महेन्द्रविक्रम, महेन्द्रविक्रमके सूर्य, सूर्यके इन्द्रद्युम्न, इन्द्रद्युम्नके महेन्द्रजित्, महेन्द्रजित्के प्रभु, प्रभुके विभु, विभुके अविध्वंस, अविध्वंसके वीतभी, वीतभीके वृषभध्वज, वृषभध्वजके गरुडांक और गरुडांकके मगांक आदि अनेक राजा क्रमसे सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए। ये सब राजा विशाल यशके धारक थे १. कल्पवासिनः १२, भवनवासिनः १०, व्यन्तराः ८, सूर्याचन्द्रमसौ इति = ३२ । २. मोक्षम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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