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________________ २१२ हरिवंशपुराणे नानचियतिभिर्युक्ताः सप्ततिर्गणधारिणः । अमी वृषमसेनाद्याः प्रकाशन्तेऽन्तिकं प्रमोः ॥३७॥ असौ बाहुबली कान्ते ! केवली जटिलो वृतः । स्वभ्रातृमनिभिर्भाति न्यग्रोध इव पादपैः ॥३८॥ एष सोमप्रमो देवि ! शोभते गुरुरावयोः । श्रेयसा सहितो योगी तप:श्रीपरिवारितः ॥३९॥ अयं पुत्रसहस्रेण तपस्थो जनकस्तव । अकम्पनमहाराजो राजते तपसः श्रिया ॥४॥ दुर्मर्षणादयस्तेऽमी स्वत्स्वयंवरयोधिनः । उपशान्त धियः कान्ते ! तपस्यन्ति महानृपाः ॥४१॥ ब्राह्मीयं सुन्दरीयं च समस्ता गणाग्रणीः । कुमारीभ्यां प्रिये ताभ्यां मारभङ्गः स्फुटीकृतः ॥४२॥ भरतोऽयं नृपैः सार्द्धमुपविष्टो जिनान्तिके । अन्तःपुरमिदं तस्य सुभद्रादिकमेकतः ॥४३॥ पश्य पश्य प्रिये चित्रं यदन्योन्यविरोधिनः । तिर्यञ्चोऽमी समासीनाः सममेकत्र मित्रवत् ॥४४॥ दर्शयन्निति कान्तायै समवस्थितिमहतः । सोऽवतीर्य मरुन्मार्गात् कृतजैनेन्द्र संस्तवः ॥४५॥ निविष्टश्चक्रिणः पाश्व विनयी नयविजयः। सुभद्रान्तिकमासाद्य समासीना सुलोचना ॥४६॥ धर्म तत्र जयः श्रुत्वा सप्रपञ्चकथामृतम् । बोधिलाभमसौ लेभे मोहनीयतनुस्वतः ॥४७॥ स्नेहपाशं दृढं छित्त्वा प्रबोध्य स सुलोचनाम् । पुत्रायानन्तवीर्याय दत्वा राज्यं निजं कृती ॥४८॥ चक्रिणा रुध्यमानोऽपि स स्नेहवशतिना। प्रवव्राज जिनस्थान्ते विजयेन जयः समम् ॥४९॥ शतान्यष्टौ जयेनामा प्रावजन् क्षितिपास्तदा । कलत्रपुत्रमित्राणि सराज्यान्यवहाय ते ॥५०॥ दुःसंसारस्वभावज्ञा सपत्नीभिः सिताम्बरा । ब्राह्मीं च सुन्दरों श्रिस्वा प्रववाज सुलोचना ॥५१॥ रही हैं ॥३६।। ये भगवान् ऋषभदेवके समीप नाना ऋद्धियोंके धारक मुनियोंसे युक्त वृषभसेन आदि सत्तर गणधर सुशोभित हो रहे हैं ॥३७॥ हे कान्ते ! यहाँ ये केवलज्ञानी जटाधारी बाहुबली भगवान् विराजमान हैं। ये मुनि अवस्थाको प्राप्त हुए अपने भाइयोंसे घिरे हुए हैं और अनेक वृक्षोंसे घिरे वटवृक्षके समान सुशोभित हो रहे हैं ॥३८॥ हे देवि ! इधर ये तपरूपी लक्ष्मीसे घिरे हुए हमारे पिता सोमप्रभ मुनिराज, अपने छोटे भाई श्रेयान्सके साथ सुशोभित हो रहे हैं ॥३९।। इधर ये तुम्हारे पिता अकम्पन महाराज एक हजार पुत्रोंके साथ तपमें लीन हैं तथा तपोलक्ष्मीसे अत्यधिक सुशोभित हो रहे हैं॥४०॥ हे कान्ते ! इधर ये तम्हारे स्वयंवरमें यद्ध करनेवाले दुर्मर्षण आदि बडे-बड़े राजा शान्त चित्त होकर तपस्या कर रहे हैं ॥४१॥ हे प्रिये ! यह समस्त आर्यिकाओंकी अग्रणी ब्राह्मी है और यह सुन्दरी है। इन दोनोंने कुमारी अवस्थामें ही कामदेवको पराजित कर दिया है।॥४२॥ इधर यह जिनेन्द्र भगवान्के समीप अनेक राजाओंके साथ भरत चक्रवर्ती बैठा है और उधर दूसरी ओर उसको सुभद्रा आदि रानियाँ अवस्थित हैं।।४३।। हे प्रिये ! देखो देखो, कैसा आश्चर्य है कि ये परस्परके विरोधी तिथंच यहाँ एक साथ मित्रकी तरह बैठे हैं ॥४४।। इस प्रकार प्राणवल्लभा-सुलोचनाके लिए अरहन्त भगवान्का समवसरण दिखाता हुआ नीतिका वेत्ता कुमार आकाशसे नीचे उतरा और जिनेन्द्र भगवान्की स्तुति करता हुआ विनय-पूर्वक चक्रवर्तीके पास बैठ गया तथा सुलोचना सुभद्राके पास जाकर बैठ गयी ।।४५-४६।। जयकुमारका मोह अत्यन्त सूक्ष्म रह गया था इसलिए वहाँ विस्तृत कथारूपी अमृतसे सहित धर्मका उपदेश सुनकर उसने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्ररूपी बोधिका लाभ प्राप्त किया ||४७|| तदनन्तर अतिशय बुद्धिमान् जयकुमारने स्नेहरूपी सुदृढ़ बन्धनको छेदकर सुलोचनाको समझाया, अनन्तवीयं नामक पुत्रके लिए अपना राज्य दिया और स्नेहके वशवर्ती चक्रवर्तीके मना करनेपर भी छोटे भाई विजयके साथ जिनेन्द्रदेवके समीप दीक्षा ले ली ||४८-४९।। उस समय जयकुमारके साथ एक सौ आठ राजाओंने स्त्री, पुत्र, मित्र तथा राज्यको छोड़कर दीक्षा धारण कर ली ॥५०॥ दुष्ट संसारके स्वभावको जाननेवाली सुलोचनाने अपनी सपत्नियों के साथ सफेद वस्त्र धारण कर लिये और ब्राह्मी तथा १. तपसा श्रिया म. । Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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