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________________ एकादशः सर्गः २०१ चक्रवर्ती चमूं मूले संस्थाप्य हिमवगिरेः । कृताष्टमोपवासोऽसौ दर्मशय्यामधिष्टितः ॥४१॥ कृततीर्थोदकस्नानः कृतकौतुकमण्डनः । आरूढाश्वरथो धन्वी चक्रायुधपुरःसरः ॥४२॥ क्षुल्लकं हिमवत्कृटं यत्र तत्र गतः शरी। वैशाखस्थानमास्थाय बभाण रणदक्षिणः ॥४३॥ भो भो नागसुपर्णाद्याः शासनं शृणुताशु मे । देशस्था इत्यतश्चापमाकृष्य शरमाक्षिपत् ॥४५॥ पपाताशनिनिर्घोषो योजने द्वादशे शरः । हिमवत्कूटवासी तं सुरो दृष्टा समागमत् ।।४।। दिव्यामोषधिमालां स दिव्यं च हरिचन्दनम् । दत्त्वा संपूज्य तं यातः शासनैषी विसर्जितः ॥४६॥ आगत्य चक्रवर्ती च ततो वृषभपर्वतम् । तत्रालिखनिजं नाम काकण्या स परिस्फुटम् ।।१७।। वृषभस्य सुतो मोऽहं चक्री भरत इत्यसौ। प्रवाच्य विजयार्द्धस्य वेदिकामगमत् प्रभुः॥४८॥ बुद्ध्वोपवासिनं तत्र श्रेणिद्वयनिवासिनौ । नमिश्च विनमिश्चोभौ गन्धाराद्यैः समागतौ ॥४९॥ स्त्रीरत्नं प्रतिगृह्याभ्यां सुभद्राख्यं खगैर्नतः । गङ्गानुवेदिकं गत्वा भक्तमष्टममास्थितः ।।५०॥ गङ्गादेवी विदित्वा तं गङ्गाकूट निवासिनी । हेमकुम्भसहस्रेण कृत्वा तदभिषेचनम् ॥५१॥ रसिंहासने तस्मै पादपीठयुते ददौ । विजयाईकुमारोऽपि तस्थौ चक्रेशशासने ॥५२॥ अष्टादशसहस्राणि म्लेच्छक्षितिभृतां ततः। वशीकृत्यात्तसदनः खण्डकापातमाप सः ॥५३॥ भरतका अभिषेक कर उन्हें पादपीठसे सुशोभित दो उत्तम आसन भेंट किये ॥४०॥ चक्रवर्ती सेनाको हिमवान् पर्वतकी तराईमें ठहराकर तथा स्वयं तीन दिनके उपवासका नियम लेकर दर्भशय्यापर आरूढ़ हुए ॥४१।। तदनन्तर जिन्होंने तीर्थजलसे स्नान किया था, उत्तम वेषभूषा धारण की थी, जो घोडोंके रथपर सवार थे, जिनके आगे-आगे चक्ररत्न चल रहा था और जो रणमें अत्यन्त कुशल थे ऐसे भरत, जहाँ हिमवान् पर्वतका हिमवत् नामक छोटा कूट था वहाँ आये और बाण हाथमें ले तथा वैशाख आसनसे खड़े होकर बोले कि 'हे इस देश में रहनेवाले नागकुमार, सुपर्णकुमार आदि देवो! तुम लोग शीघ्र ही मेरी आज्ञा सुनो।' यह कह उन्होंने धनुष खींचकर बाण छोड़ा ।।४२-४४|| वज्रके समान शब्द करता हुआ वह बाण बारह योजन दूर जाकर गिरा तथा हिमवत् कूटपर रहनेवाला देव उसे देखकर भरतके पास आया ॥४५।। उसने दिव्य ओषधिओंकी माला तथा दिव्य हरिचन्दन देकर भरतकी पूजा की। तदनन्तर आज्ञाकी इच्छा करता हुआ वह भरतसे विदा ले अपने स्थानपर चला गया ।।४६।। चक्रवर्ती वहांसे चलकर वृषभाचल पर्वतपर आये और वहाँ उन्होंने काकणी रत्नसे साफ-साफ अपना यह नाम लिखा कि 'मैं भगवान् वृषभदेवका पुत्र भरत चक्रवर्ती हूँ'। नाम लिखकर तथा बाँचकर वे विजयाध पर्वतको वेदिकाके समीप आये ॥४७-४८|| दहाँ जाकर उन्होंने उपवास धारण किया। दोनों श्रेणियों के निवासी नमि और विनमिको जब यह ज्ञात हुआ कि भरत यहाँ विद्यमान हैं तब वे गन्धार आदि विद्याधरोंके साथ वहाँ आये ॥४९|| समस्त विद्याधरान उन्हें नमस्कार किया और भरतने नमि, विनमिसे सुभद्रा नामक स्त्री-रत्न ग्रहण किया। तत्पश्चात् वे गंगा नदीकी वेदिकाके किनारे-किनारे चलकर गंगाकूटके समीप आये और तीन दिनके उपवासका नियम लेकर वहाँ ठहर गये । वहाँ गंगाकूटपर रहनेवाली गंगा देवीने उनके आनेका समाचार जानकर सुवर्णमय एक हजार कलशोंसे उनका अभिषेक किया ।।५०-५१|| अभिषेकके बाद उसने पादपोठसे युक्त दो रत्नोंके सिंहासन भेंट किये। यहां विजयार्ध पर्वतका स्वामी विजयाध कुमारदेव चक्रवर्तीकी आज्ञामें खडा रहा ॥५२।। तदनन्तर वहाँसे चलकर अठारह हजार म्लेच्छ राजाओंको वश करते और उनसे उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट स्वीकार करते हुए भरत विजयार्धकी दूसरी गुफा खण्डकाप्रपातके समीप १. मण्डल: म. । २. वैशाखं स्थान ग., घ, ङ., म.। २६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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