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________________ २०० हरिवंशपुराणे निस्यान्धकारमुहास्य काकणीमणिरोचिषा । स्कन्धावारं स्थितं तत्र नक्कन्दिवमतन्द्रितम् ॥२०॥ कामदृष्टिगृहपती रत्नभद्रमुखो द्रुतम् । स्थपतिश्च स्थिरस्ताभ्यां संक्रमः सरितोः कृतः ॥२८॥ उत्तीर्य संक्रमाक्रान्स्या सद्यो नचोर्ययो चमूः। द्वारमुत्तरमुद्धाव्य प्रागिवोत्तरभारतम् ॥२९॥ म्लेष्छराजसहस्राणि वीक्ष्यापूर्ववरूथिनीम् । क्षुमितान्यभिगम्याशु योधयामासुरश्रमात् ॥३०॥ ततः क्रुद्धो युधि म्लेच्छैरयोध्यो दण्डनायकः । युद्ध्वा निधूय तानाशु दधे नामार्थसंगतम् ॥३॥ भगम्लेच्छास्ततो 'याताः शरणं कुलदेवताः । घोरान्मेघमुखान्नागान् दर्मशय्याधिशायिनः ॥३२॥ ततो मेघमुखा देवा खमापूर्य युधि स्थिताः। युद्ध्वा जयकुमारस्तैलेंभे मेघस्वरामिधाम् ॥३३॥ पुनमेंघमुखा घोरैमें धैरापूर्य पुष्करम् । ववृषुर्मुष्टिमात्राभिर्धाराभिः सैन्यमस्तके ॥३४॥ दृष्टा वृष्टिं ततश्चक्री सतडिदगर्जिताशनिम् । चर्मरस्नमधश्चक्रे छत्ररत्नं तथोपरि ॥३५॥ द्विषड्योजन विस्तीर्णा तरन्ती साप्सु वाहिनी । अण्डायते स्म सप्ताह कान्दिशीकस्वमागता ॥३६॥ ततो निधिपतिः ऋद्धी गणबद्धाभिधानकान् । देवानाज्ञापयत् तैस्तैयस्ता मेघमुखाः सुराः ॥३७॥ ततो मेघमुखैम्लेंच्छाः प्रोक्ताः संहृतवृष्टिमिः । चक्रिणं शरणं जग्मुरादाय वरकन्यकाः ॥३८॥ मोतानामभयं दत्त्वा स तेषां शासनैषिणाम् । आयादायासनिर्मुक्तः सिन्धुनद्यनुवेदिकम् ॥३९॥ सिन्धुदेव्यभिषिच्यैनं सिन्धुकूटाग्रवासिनी । ददौ भद्रासने भरे पादपीठोपशोमिते ॥४०॥ दिया-उन्हें विश्राम कराया ॥२६।। उस गुफामें निरन्तर अन्धकार रहता था जिसे भरतने काकणी मणिकी किरणोंसे दूर कर दिया था। भरतकी सेनाने वहां आलस्यरहित होकर एक दिन-रात निवास किया ॥२७॥ कामदृष्टि नामक गृहपतिरत्न और रत्नभद्रमुख नामक स्थपतिरत्न इन दोनोंने उत नदियोंपर मजबूत पुल बनाये ।।२८। सेना उन पुलोंके द्वारा शीघ्र ही नदियोंको पार कर आगे बढ़ गयी और पहलेकी तरह उत्तर द्वारको खोलकर उत्तर भारतमें जा पहुंची ।।२९।। उत्तर भारतके हजारों म्लेच्छ राजा चक्रवर्तीकी अपूर्व सेनाको देखकर क्षुभित हो गये और शीघ्र ही सामने आकर अनायास युद्ध करने लगे ॥१०॥ तदनन्तर क्रोधसे भरे अयोध्य सेनापतिने युद्ध में म्लेच्छ राजाओंके साथ युद्ध कर तथा उन्हें शोघ्र ही खदेड़कर अपना 'अयोध्य' नाम सार्थक किया ॥३१॥ सेनापतिसे भयभीत हुए म्लेच्छ, अपने कुलदेवता, दर्भशय्यापर शयन करनेवाले एवं भयंकर मेघमुख नागकुमारोंको शरण गये ॥३२॥ जिसमें मेघमुख देव आकाशको व्याप्तकर युद्ध के लिए आ डटे परन्तु जयकुमारने उनके साथ युद्ध कर उन्हें परास्त कर दिया और स्वयं 'मेषस्वर' यह नाम प्राप्त किया ॥३३॥ कुछ देर बाद मेघमुख देव भयंकर मेघोंसे आकाशको व्याप्त कर मट्री बराबर मोटी-मोटी धाराओसे सेनाके मस्तकपर जलवषो करने लगे ||३४|| तदनन्तर जिसमें बिजलीके साथ वज्रको भयंकर गर्जना हो रही थी ऐसी जलवृष्टि देखकर चक्रवर्तीने सेनाके नीचे चर्मरत्न और ऊपर छत्ररत्न फैला दिया ॥३५॥ बारह योजन पर्यन्त फैली एवं जलके भीतर तैरती हुई वह सेना अण्डाके समान जान पड़ती थी। वह सेना सात दिन तक इसी तरह भयभीत रही ॥३६॥ तदनन्तर निधियोंके स्वामी चक्रवर्तीने कुपित होकर गणबद्ध देवोंको आज्ञा दी और उन्होंने उन मेघमुख देवोंको परास्त कर खदेड़ दिया ॥३७॥ तत्पश्चात् जिन्होंने वृष्टिका संकोच कर लिया था ऐसे मेघमुख देवोंकी प्रेरणा पाकर वे म्लेच्छ राजा उत्तमोत्तम कन्याएँ लेकर चक्रवर्तीको शरणमें आये ॥३८॥ चक्रवर्तीने उन भयभीत तथा आज्ञा पानेकी इच्छा करनेवाले म्लेच्छ राजाओंको अभयदान दिया और उसके बाद श्रमसे रहित हो सिन्धु नदीकी वेदिकाके किनारे-किनारे गमन किया ॥३९॥ बीचमें सिन्धुकूटपर निवास करनेवाली सिन्धु देवीने १. जाताः म. । २. आकाशम् । ३. मेंघमात्राभि-मः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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