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________________ एकादशः सर्गः सुरं वरतनुं तत्र यथा मागधमाह्वयन् । चूडामणिमसौ दिव्यं अवेयकमुरश्छदम् ॥१३॥ वीराङ्गदे च कटके कटीवतं च सूत्रकम् । उपनीय प्रणम्येशं 'विमुक्तः किङ्करो ययौ ॥१४॥ पाश्चात्यं साधयन् विश्वं दधद्भपालमण्डलम् । अनुवेदिकमागच्छत् सिन्धुद्वारं स बन्धुरम् ॥१५॥ प्रमासममरं तत्र गङ्गाद्वारविधानतः । नमयित्वा वशं चक्रे चक्रेशः शक्रविक्रमः ॥१६॥ लेभे सान्तानकं तस्मान्माल्यदामकमुत्तमम् । मुक्काजालं च मौलिं च रत्नचित्रं च हेमकम् ॥१७॥ चक्ररत्नानुमार्ग स विजयार्द्धस्य वेदिकाम् । प्राप्तश्चक्रधरो दध्यौ सोपवासो गिरेः सुरम् ॥१८॥ बुद्ध्वा स्वावधिकात्प्राप्तः सोऽभिषिच्य महर्द्धिभिः । विजयाद्धकुमाराख्यो देवः प्रणतिपूर्वकम् ॥१९॥ भृङ्गारं कुम्मतोयं च सिंहासनमनुत्तमम् । छत्रचामरयुग्मानि दत्वा तेऽहमिति न्यगात् ॥२०॥ तत्र चक्रमहं कृत्वा स तमिस्रगुहामुखम् । प्रापत्तु कृतमालस्तं सुरः प्राप ससंभ्रमः ॥२१॥ तिलकाद्यानि दिव्यानि भूषणानि चतुदश। प्रदाय प्रणिपत्यासौ तवाहमिति यातवान् ॥२२॥ सेनापतिरयोध्यश्च राजराजस्य शासनात् । अश्वरत्नं शुकच्छायं कुमुदामेलकामिधम् ॥२३॥ आरुह्य दण्ड रत्नेन प्रचण्डेन पराङ्मुखः । गुहाद्वारकाटानि प्रताड्यानुपलायितः ॥२४॥ उद्घाटिते गुहाद्वारे षण्मासैः स निरूष्मणि । सेनयाविशदारुह्य गजं विजयपर्वतम् ॥२५॥ तत्रोन्मग्नजला नाम्ना संनिमग्नजलापगा । महानद्योस्तयोस्तोरे गुहामध्येऽमुचच्चमूः ॥२६॥ दिशामें रहनेवाले महाबलवान् भूत और व्यन्तर देवोंके समूहको वश करते हुए समुद्रके वैजयन्तद्वारपर जा पहुंचे ||१०-१२।। वहांपर उन्होंने मागधदेवके समान उस प्रदेशके स्वामी वरतनु देवको बुलाया और वरतनु देवने आकर चूड़ामणि, सुन्दर कपठहार, कवच, वीरोंके बाजूबन्द, कड़े और करधनी भेंट कर भरतको प्रणाम किया। तदनन्तर सेवकवृत्तिको स्वीकार करनेवाले वरतनु भरतसे विदा ले अपने स्थानपर चला गया ॥१३-१४॥ वहाँसे चलकर भरत पश्चिम दिशाके समस्त राजाओं को वश करते हुए वेदिकाके किनारे-किनारे चलकर सिन्धु नदीके मनोहर द्वारपर पहुंचे ॥१५।। वहां इन्द्रके समान पराक्रमको धारण करनेवाले चक्रवर्ती भरतने गंगाद्वारके समान वहाँके अधिपति प्रभास देवको नम्रोभूत कर अपने वश किया ॥१६|| तथा उससे सन्तानक वृक्षोंके पुष्पोंको उत्तम माला, मोतियोंकी जाली, मुकुट और रत्नोंसे चित्र-विचित्र कटिसूत्र प्राप्त किया ॥१७॥ तदनन्तर भरत, चक्ररत्नके पोछे-पीछे चलकर विजयाधं पर्वतकी वेदिकाके समीप आये । वहाँ उन्होंने उपवास कर पर्वतके अधिष्ठाता (विजयार्ध कुमार) देवका स्मरण किया ॥१८॥ वह देव ने अवधिज्ञानसे भरतको वहाँ आया जानकर आया। उसने भरतको प्रणाम कर बड़ी ऋद्धियोसे उनका अभिषेक किया तथा झारी, कलशजल, उत्तम सिंहासन, छत्र और दो चमर भेंट कर कहा कि मैं आपका हूँ-आपका सेवक हूँ। इस प्रकार निवेदन कर वह चला गया ॥१९-२०॥ राजा भरत वहाँ चक्ररत्नकी पूजा कर तमिस्र गुहाके द्वारपर आये । वहीं घबड़ाया हुआ कृतमाल नामका देव उनके पास आया ॥२१।। और तिलक आदि चौदह दिव्य आभूषण देकर तथा प्रणाम कर 'मैं आपका हूँ' यह कहता हुआ चला गया ॥२२॥ राजराजेश्वर भरतकी आज्ञासे उनके अयोध्य नामक सेनापतिने सुआके समान कान्तिवाले कुमुदामेलक नामक अश्वरत्नपर सवार हो तथा पीछेकी ओर अपना मुख कर दण्डरत्नसे गहा द्वारके किवाडोंको ताड़ित किया और ताडित कर वह एकदम पीछे भाग गया ॥२३-२४॥ खुला हुआ गुहाद्वार जब छह माहमें ऊष्मारहित हो गया तब चक्रवर्तीने विजयपर्वत नामक हाथीपर सवार हो सेनाके साथ उसमें प्रवेश किया ॥२५॥ गुहाके बीच में उन्मग्नजला और निमग्नजला नामको दो नदियां थीं, उनके तटपर भरतने सेनाओंको छोड़ १. वरतनस्तत्र म.। २. विमक्तं म.1 ३. कूततोयं च म.। ४. अयोध्यस्य म.। । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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