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________________ एकादशः सर्गः अथ करवात्मजोरपत्ती भरतः सुमहोत्सवम् । कृतचक्रमहोऽयासीत् षट्खण्डविजिगीषया ॥१॥ चतुरङ्गमहासेनो नृपचक्रेण संगतः । अग्रप्रस्थितचक्रण युक्तो दिक्चक्रिणां नृणाम् ॥२॥ गङ्गानुकूलमागत्य गङ्गासागरसंगतः । गङ्गाद्वारेऽष्टम सद्वागङ्गायकृत भक्तकम् ॥३॥ द्वारेणोद्धारितेनासौ प्रविश्याश्वयुगाश्रितम् । अजितजितनामानं रथमारुह्य वेगिनम् ॥४॥ अवगाह्य महाबाहुर्जानुदनं महोदधिम् । वज्रकाण्डधनुःपाणिवैशाखस्थानमास्थितः ॥५॥ सदृष्टिमुष्टिसंधानविधानेषु विशारदः । स्वनामाङ्कममोघाख्यं मुमो चाशुंगमाशुगम् ॥६॥ शरः पपात वज्राभो गरवा द्वादशयोजनीम् । प्रासादे मागधस्याशु प्रविशन्मुखराम्बरः।।७॥ हृदयेन समं तस्मिन् प्रासादे चलिते सुरः। संभ्रान्तः स तमालोक्य चक्रिनामाङ्कितं शरम् ॥८॥ चक्रवर्तिनमुत्पन्नं ज्ञात्वा स्वं पुण्यमल्पशः । निन्दित्वा भग्नमानोऽसौ रत्नपाणिरुपागतः ॥२॥ हारं स पृथिवीसारं मुकुटं रत्नकुण्डले । उपनीय सुरलानि वस्त्रतीर्थोदकानि तु ॥१०॥ शाधि किं करवाणीश देह्यादेशं बुधोऽवदत् । मुक्तस्तेन गतः स्थान निर्ययौ भरतोऽप्यतः ॥११॥ भूतव्यन्तरसंघातान् दाक्षिणात्यान् महाबलान् । साधयन् सागरद्वारं वैजयन्तमवाप सः ॥१२॥ __ अथानन्तर समवसरणसे आकर भरतने पुत्र-जन्मका उत्सव किया, चक्ररत्नकी पूजा की और उसके बाद छह खण्डोंको जीतने की इच्छासे प्रस्थान किया ॥१।। उस समय चतुरंग सेना उसके साथ थी, वे राजाओंके समूहसे युक्त थे और नाना दिशाओंसे आये हुए अपार जनसमूहके आगे-आगे चलनेवाले चक्ररत्नसे सहित थे ।।२।। वे गंगा नदोके किनारे-किनारे चलकर गंगासागरपर पहुंचे। वहां गंगाद्वारपर उन्होंने मन, वचन, कायकी क्रियाको प्रशस्त कर तीन दिनका उपवास किया ॥३॥ जिसमें दो घोड़े जुते हुए थे ऐसे वेगशाली रथपर सवार होकर उन्होंने द्वार खोला और समुद्रमें घुटने पर्यन्त प्रवेश किया। उस समय लम्बी भुजाओंके धारक भरत अपने हाथमें वज्ञकाण्ड नामक धनुष लिय सुष लिये हुए थे, तथा वैशाख आसनसे खड़े थे। वे दृष्टिके स्थिर करने, कड़ी मुट्ठी बांधने और डोरोपर बाण स्थापित करनेमें अत्यन्त निपुण थे। उसो समय उन्होंने अपने नामसे चिह्नित अमोघ नामका शीघ्रगामो बाण छोड़ा ॥४-६।। वज्रके समान चमकता हुआ बाण शीघ्र ही बारह योजन जाकर मागध देवके भवन में गिरा और उसने भवनमें प्रवेश करते ही समस्त आकाशको शब्दायमान कर दिया ॥७॥ बाणके गिरते ही मागधदेवका भवन और हृदय दोनों ही एक साथ हिल उठे। वह बहुत ही क्षोभको प्राप्त हुआ। परन्तु जब उसने चक्रवर्तीके नामसे चिह्नित बाणको देखा और चक्रवर्ती उत्पन्न हो चुका है यह जाना तब वह अपने पुण्यको अल्प जान अपनी निन्दा करने लगा। तदनन्तर जिसका मान खण्डित हो गया था ऐसा मागधदेव हाथोंमें रत्न लेकर भरतके पास आया ॥८-९॥ आकर उस बुद्धिमान् देवने पृथिवीका सारभूत हार, मुकुट, रत्ननिर्मित दो कुण्डल, अच्छे-अच्छे रत्न, वस्त्र तथा तीर्थोदककी भेंट दी और कहा कि हे स्वामिन् ! बताइए मैं क्या करूं? मुझे आज्ञा दीजिए। तदनन्तर भरतसे विदा हो वह अपने स्थानपर गया और भरत भी वहाँसे चलकर दक्षिण १. उपवासत्रयम् 'तेला' कृत्वा । २. वाक् च अङ्गानि च इति वागङ्गं तदादी यस्य तत् वागङ्गादि सत् शोभनं वागङ्गादि यस्मिन् तत् । ३. कृतवान् । ४. शीघ्रगामिनम्। ५. बाणम् । ६. कथय । ७. विजयं तम-म.. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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