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________________ २०२ हरिवंशपुराणे उपोषिताष्टमायास्मै नाव्यमालोऽत्र दत्तवान् । नानारूपं स नेपथ्यं विद्युदाभे च कुण्डले ॥५४॥ अयोध्योद्घाटितेनासौ गुहाद्वारेण पूर्ववत् । प्रविश्य निर्गतः सिन्धोरिव गाङ्गेन सेनया ॥५५॥ विजित्य मारतं वर्ष स षट्खण्डमखण्डितम् । षष्टिवर्षसहस्रेस्तु विनीतां प्रस्थितः कृती ॥५६॥ चक्रे सुदर्शनेऽयोध्यामविशत्यथ चक्रभृत् । बुद्धिसागरमप्राक्षीत् संदिहानः पुरोधसम् ॥५७॥ साधिते भारते वास्ये चक्ररत्नमिदं किमु । दिव्यं विशति नायोध्यां योध्याः सन्ति न के च नः ॥५॥ पुरोधाः सोऽभ्यधागातरो भवतो ननु । ये महाबलसंपन्नास्ते न शृण्वन्ति शासनम् ॥५९॥ तदाकर्ण्य वचस्तूर्ण तेषां प्रेषयति स्म सः । ससामोपप्रदानादिनीतिपूर्व वचोहरान् ॥६०॥ ततस्ते तनिमित्तेन मानिनो लब्धबोधयः । स्वराज्यान्यस्यजस्त्यागं मन्यमाना महोत्सवम् ॥६॥ प्रपद्य शरणं सर्वे नाभेयं भवभीरवः । मानशल्यविनिर्मुक्ताः प्रवज्या मोक्षिणो दधुः ॥६२॥ सकमारैः कमारैस्तैर्मव्यसिंहः सहैव हि । ज्ञेयानि त्यक्तदेशानां नामानीमानि पण्डितैः ॥१३॥ कुरुजाङ्गलपञ्चालसूरसेनपटच्चराः । तुलिङ्ग-काशि-कौशल्य-मद्र कारवृकार्थकाः ॥६४।। सोल्वावृष्टत्रिगर्ताश्च कुशाग्रो मत्स्यनामकः । कुणीयान् कोशलो मोको देशास्ते मध्यदेशकाः ॥६५।। बाहीकात्रेयकाम्बोजा यवनाभोरमद्रकाः । क्वाथतोयश्च शूरश्च वाटवानश्च कैकयः ॥६६॥ गान्धारः सिन्धुसौवीरमारद्वाजदशेरुकाः। प्रास्थालास्तीर्णकर्णाश्च देशा उत्तरतः स्थिताः ॥६॥ खड्गङ्गारकपौण्डाश्च मल्लप्रवकमस्तकाः । प्राद्योतिषश्च वङ्गश्च मगधो मानवर्तिकः ॥६॥ पहुँचे ॥५३।। वहां वे तीन दिनके उपवासका नियम लेकर ठहर गये। यहां नाट्यमाल नामक देवने उन्हें नाना प्रकारके आभूषण और बिजलीके समान चमकते हुए दो कुण्डल भेंट किये ॥५४॥ जिस प्रकार पहले अयोध्य सेनापतिने दण्डरत्नके द्वारा सिन्धु नदीको गुफाका द्वार खोला था उसी प्रकार यहां भी उसने दण्डरत्नसे गंगानदीकी गुफाका द्वार खोला और भरत उस द्वारसे प्रवेश कर सेनासहित बाहर निकल आये ॥५५॥ इस तरह अतिशय कुशल भरतने साठ हजार वर्षों में छह खण्डोंसे युक्त समस्त भरतक्षेत्रको जीतकर अयोध्या नगरीकी ओर प्रस्थान किया ॥५६|| ___ अथानन्तर-समीप आनेपर जब सुदर्शनचक्रने अयोध्या में प्रवेश नहीं किया तब भरतने सन्देहयक्त हो बद्धिसागर पूरोहितसे पूछा कि समस्त भरतक्षेत्रको वश कर लेनेपर भी यह दिव्य चक्ररत्न अयोध्यामें प्रवेश क्यों नहीं कर रहा है ? अब तो हमारे युद्धके योग्य कोई नहीं है ? ॥५७-५८। पुरोहितने कहा कि आपके जो महाबलवान् भाई हैं वे आपकी आज्ञा नहीं सुनते हैं ।।५९|| यह सुनकर भरतने शीघ्र ही उनके पास साम, दाम आदि नीतिके साथ दूत भेजे ॥६०।। तदनन्तर इस निमित्तसे जिन्हें बोधिकी प्राप्ति हुई थी ऐसे भरतके अभिमानो भाइयोंने त्यागको ही महोत्सव मान अपने-अपने राज्य छोड़ दिये ॥६१।। जो संसारसे भयभीत थे, जिनकी मानरूपी शल्य छूट चुकी थी, और जो अन्तरंगमें मोक्षकी इच्छा रखते थे ऐसे भरतके समस्त भाइयों ने भगवान् वृषभदेवके समीप जाकर दीक्षा धारण कर ली ॥६२॥ उन सुकुमार एवं भव्य-शिरोमणि कुमारोंने जो देश छोड़े थे विद्वानोंको उनके नाम इस प्रकार जानना चाहिए ॥६३॥ कुरुजांगल, पंचाल, सूरसेन, पटच्चर, तुलिंग, काशि, कौशल्य, मद्रकार, वृकार्थक, सोल्व, आवृष्ट, त्रिगत, कुशाग्र, मत्स्य, कुणीयान्, कोशल और मोक ये मध्यदेश थे॥६४-६५।। वाह्लीक, आत्रेय, काम्बोज, यवन, आभीर, मद्रक, क्वाथतोय, शूर, वाटवान, कैकय, गान्धार, सिन्धु, सौवीर, भारद्वाज, दशेरुक, प्रास्थाल और तोर्णकर्ण ये देश उत्तरको ओर स्थित थे ॥६६-६७॥ खड्ग, अंगारक, पोण्ड, मल्ल, प्रवक, मस्तक, प्राद्योतिष, वंग, मगध, मानवतिक, १. न तु म. । २. वचोहरात् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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