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________________ वशमः सर्गः १९३ सामग्रीकृतकायस्य वाचकत्वैकदेशतः । वचः संवृतिसत्यं स्यात् भेरीशब्दादिकं यथा ॥१.२॥ चेतनाचेतनवग्यसंनिवेशाविमागकृत् । वचः संयोजनासत्यं क्रौनब्यूहादिगोचरम् ॥१०॥ यदार्याऽनायनानास्वनानाजमपदेविह। चतुर्वर्गकरं वाक्यं सत्यं जनपदाश्रितम् ॥१०॥ यद्मामनगराचारराजधर्मोपदेशकृत् । गणाश्रमपदोनासि देशसत्यं तु तन्मतम् ।।१०५।। छमस्थे द्रव्ययाथात्म्यज्ञानवैकल्यवस्यपि । प्रासुकाप्रासुकत्वेऽपि मावसत्यं वचः स्थितम् ॥१०६॥ द्रव्यपर्यायभेदानां याथात्म्यप्रतिपादकम् । यत्तस्समयसत्यं स्यादागमार्थपरं वचः॥१०॥ कोन्यः षड्विंशतियंत्र पदानां परिवर्णिताः । आत्मप्रवादपूर्वेऽपि भूयोयुक्तिपरिग्रहे ॥१०॥ तत्र कर्तृत्वभोक्तृत्वनिस्यतानित्यतादयः । आत्मधर्मा निरूप्यन्ते तद्भेदाश्च सयुक्तिकाः ॥१०९॥ साशीतिपदलकपदकोटीप्रमाणकम् । पूर्व कर्मप्रवादाख्यं कर्मबन्धस्य वर्णकम् ॥११॥ लक्षाश्चतुरशीतिस्तु पदानां यत्र वणिताः । पूर्व नवममाख्यातं प्रत्याख्यानं तदाख्यया ॥११॥ प्रमिताप्रमितं तत्र द्रव्यमावसमाश्रयम् । प्रत्याख्यानं समाख्यातं यच्च श्रामण्यवर्धनम् ॥११२॥ कोटी च दशलक्षाश्च यत्पदानां प्रवत्तिता । तद्विद्यानुप्रवादाख्यं पूर्व दशममत्र च ॥११३।। लवोऽङ्गष्टप्रसेनाद्या विद्याः सप्तशतानि तु । रोहिण्याद्या महाविद्याः प्रोक्ताः पञ्चशतानि च ॥११॥ होनेसे क्षयोपशमिक तथा जीवत्व और भव्यत्व अथवा जीवत्व और अभव्यत्वकी अपेक्षा पारिणामिक भाव भी है परन्तु आगमके कहे अनुसार वहां दर्शनमोहकी अपेक्षा औदयिक भाव ही कहना ॥१०१॥ समुदायको एक देशको मुख्यतासे एक रूप कहना संवृति सत्य है, जैसे भेरी, तबला, बाँसुरो, वीणा आदि अनेक बाजोंका शब्द जहां एक समूहमें हो रहा है वहां भेरी आदिकी मुख्यतासे भेरी आदिका शब्द कहना ॥१०२॥ जो चेतन-अचेतन द्रव्योंके विभागको करनेवाला न हो उसे संयोजना सत्य कहते हैं। जैसे क्रौंचव्यूह आदि। भावार्थ-क्रौंचव्यूह, चक्रव्यूह आदि सेनाओंकी रचनाके प्रकार हैं और सेनाएँ चेतन-अचेतन पदार्थों के समूहसे बनती हैं पर जहाँ अचेतन पदार्थोंको विवक्षा न कर केवल क्रौंचाकार रची हुई सेनाको क्रौंचव्यूह और चेतन पदार्थों की विवक्षा न कर केवल चक्रके आकार रची हुई सेनाको चक्रव्यूह कह देते हैं वहाँ संयोजनासत्य होता है ।।१०३॥ जो वचन आर्य-अनार्य आदि अनेक देशोंमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका करनेवाला है उसे जनपदसत्य कहते हैं ।।१०४|| जो वचन गांवकी रीति, नगरकी रीति तथा राजाकी नीतिका उपदेश करनेवाला हो एवं गण और आश्रमोंका उपदेशक हो वह देशसत्य माना गया है॥१०५॥ यद्यपि छद्मस्थके द्रव्योंके यथार्थ ज्ञानकी विकलता है तथापि केवलीके वचनकी प्रमाणता कर वे प्रासुक और अप्रासुक द्रव्यका निर्णय करते हैं यह भावसत्य है ॥१०६।। और जो द्रव्य तथा पर्यायके भेदोंकी यथार्थताको बतलानेवाला तथा आगमके अर्थको पोषण करनेवाला वचन है वह समयसत्य है ।।१०७।। जिसमें छब्बीस करोड़ पद कहे गये हैं ऐसा सातवां आत्मप्रवाद नामका पूर्व है । इसमें अनेक युक्तियोंका संग्रह है तथा कर्तृत्व, भोक्तृत्व, नित्यत्व, अनित्यत्व आदि जीवके धर्मों और उनके भेदोंका सयुक्तिक निरूपण है ।।१०८-१०९॥ जिसमें एक करोड़ अस्सी लाख पद हैं ऐसा आठवाँ कर्मप्रवाद नामका पूर्व है। यह पूर्व ज्ञानावरणादि कर्मोंके बन्धका निरूपण करनेवाला है ।।११०|| जिसमें चौरासी लाख पद हैं ऐसा नौवां प्रत्याख्यान पूर्व कहा गया है॥११॥ इस पर्वमें परिमित द्रव्य-प्रत्याख्यान और अपरिमित भाव-प्रत्याख्यानका निरूपण है तथा यह पूर्व मुनिधर्म को बढ़ानेवाला है ॥११२॥ जिसमें एक करोड़ दश लाख पद हैं ऐसा दशवां विद्यानुवाद नामका पूर्व है ॥११३। इसमें अंगुष्ठ प्रसेन आदि सात सौ लघु विद्याएं और रोहिणी १. याथात्म्यज्ञानं वैकल्य म. । २. प्रावण्य म.। Jain Education InternatioRk For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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