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________________ १९२ हरिवंशपुराणे पूर्व सत्यप्रवादाख्यं पदकोटीकषट्पदम् । भाषा द्वादशधा प्राह दशा सत्यभाषणम् ॥११॥ हिंसाद्यकर्तुः कर्तुर्वा कर्त्तव्यमिति माषणम् । अभ्याख्यानं प्रसिद्धी हि वागादिकलहः पुनः ॥१२॥ दोषाविष्करणं दुष्टैः पश्चात्यैशुन्यभाषणम् । भाषा बद्धप्रलापाख्या चतुर्वर्गविवजिता ॥१३॥ रत्यरत्यभिधे वोभे रत्यरत्युपपादिक । आसज्यते यथार्थषु श्रोता सोपाधिवाक पुनः ॥१४॥ वञ्चनाप्रवणं जीवं कर्ता निःकृतिवाक्यतः । न नमत्यधिकेष्वात्मा सा चाप्रणतिवागभूत् ॥१५॥ या प्रवर्तयति स्तेये मोघवाक सा समीरिता । सम्यग्मार्ग नियोक्त्री या सम्यग्दर्शनवागसौ ॥१६॥ मिथ्यादर्शनवाक सा या मिथ्यामागोपदेशिनी । वाचो द्वादशभेदाया वकारो द्वीन्द्रियादतः ॥९७।। दशधा सत्यसद्भावे नामसत्यमुदाहृतम् । इन्द्रादिव्यवहारार्थ यत् संज्ञाकरणं हि तत् ।।९८॥ यदर्थासंनिधानेऽपि रूपमात्रेण भाष्यते । तद्र पसत्यं चित्रादिपुरुषादावचेतने ॥१९॥ आकारेणाक्षपुस्तादौ सता वा यदि वासता । स्थापितं व्यवहारार्थ स्थापनासत्यमुच्यते ॥१०॥ प्रतीत्य वर्तते भावान यदीपशमकादिकान् । प्रतीत्यसत्यमित्युक्तं वचनं तद्यथागमम् ॥१०१॥ प्रकारके ज्ञानका वर्णन करता है ॥९०॥ जिसमें छह अधिक एक करोड़ पद हैं ऐसा छठवां सत्यप्रवाद नामका पूर्व बारह प्रकारको भाषा तथा दश प्रकारके सत्य वचनका कथन करता है ।।९१॥ बारह प्रकारकी भाषाओंके नाम और स्वरूप इस प्रकार हैं-हिंसादि पापोंके करनेवाले अथवा नहीं करनेवालेके लिए करना चाहिए' इस प्रकार कहना सो अभ्याख्यान भाषा है। कलह कारक वचन बोलना सो कलह भाषा है यह प्रसिद्ध ही है ॥९२॥ दुष्ट मनुष्योंके द्वारा पीठ पीछे दोषोंका प्रकट किया जाना सो पैशुन्य भाषा है। जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार वर्गोके वर्णनसे रहित है वह बद्धप्रलाप नामक भाषा है ।।९३॥ रति अर्थात् राग उत्पन्न करनेवाली भाषाको रति भाषा कहते हैं और अरति अर्थात् द्वेष उत्पन्न करनेवाली भाषाको अरति भाषा कहते हैं, जिसके द्वारा श्रोता अर्थार्जन आदि कार्योंमें लग जाता है वह उपाधि वाक् भाषा है। जो जीवको धोखादेहीमें निपुण करती है वह निकृति भाषा है। जो अपनेसे अधिक गुणवालोंको नमस्कार नहीं करती है वह अप्रणति भाषा है ।।९४-९५॥ जो जीवको चोरीमें प्रवृत्त करती है वह मोघ ( मोष ) भाषा है । जो समीचीन मार्गमें लगाती है वह सम्यग्दर्शन भाषा है और जो मिथ्या मार्गका उपदेश देती है वह मिथ्यादर्शन भाषा है। इन बारह प्रकारको भाषाओंके बोलनेवाले द्वीन्द्रियादिक जीव हैं ॥९६-९७।। सत्य वचन दश प्रकारके हैं उनमें पहला नाम सत्य कहा गया है, व्यवहार चलानेके लिए किसीका इन्द्र आदि नाम रख लेना नामसत्य है ॥९८॥ पदार्थके न होनेपर भी रूप-मात्रकी मुख्यतासे जो कथन होता है वह रूपसत्य है जैसे किसी मनुष्यके अचेतन चित्रको उस मनुष्यरूप कहना ॥९९॥ पांसा तथा खिलौना आदिमें आकारको समानता होने अथवा न होनेपर भी व्यवहारके लिए जो स्थापना की जाती है वह स्थापना सत्य है जैसे सतरंजकी गोटोंमें वैसा आकार न होनेपर भी बादशाह-वजीर आदिकी स्थापना करना और हाथी, घोड़ा आदिके खिलौनोंमें उन जैसा आकार होनेपर हाथी, घोड़ा आदिको स्थापना करना ॥१००॥ आगमके अनुसार प्रतीतिकर औपशमिकादि भावोंका कथन करना प्रतीत्य सत्य है। जैसे मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें आगममें औदयिक भाव बतलाया है। यद्यपि वहाँ ज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम भाव १. अभ्याख्यानकलहपैशुन्यासंबद्धप्रलापरत्यरत्युपधिनिकृत्यप्रणतिमोषसम्यग्दर्शनमिथ्यादर्शनात्मिका भावा द्वादशधा ।-राजवातिक प्रथमाध्याय सूत्र २० । २. नामरूपस्थापनाप्रतीत्यसंवृतिसंयोजनाजनपददेशभावसमयसत्यभेदेन दशविधः सत्यभावः । -राजवातिक प्र. अ. सू. २० । ३. जयार्थेषु म., जयार्थेषु स्रोतारो बधिता पुनः क. । ४. प्रतीत्या म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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