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________________ १८८ हरिवंशपुराणे षट्पञ्चाशत् सहस्राणि पञ्च लक्षाः पदानि तु । ज्ञातृधर्मकथाचष्टे जिनधर्मकथामृतम् ॥३६॥ यत्रैकादशलक्षाश्च सहस्राण्यपि सप्ततिः । पदान्युपासकास्तत्रोपासकाध्ययने सृताः ॥३७॥ त्रयोविंशतिलक्षाश्च सहस्राणि च विंशतिः । अष्टौ चैव सहस्राणि स्युः पदान्यन्तकृदशे ॥३८॥ दशोपसर्गजेतारः प्रतितीर्थ दशोदिताः । संसारान्तकृतस्तत्र मुनयो ह्यन्तकृद्दशे ॥३९॥ लक्षाद्वानवतिर्यत्र चत्वारिंशत्सहस्रकैः । चत्वारिंशत्सहस्राणि पदान्यभिहितानि तु ॥४०॥ तत्रौपपादिके देशे वर्ण्यन्तेऽनुत्तरादिके । दशोपसर्गजयिनो दशानुत्तरगामिनः ॥४१॥ स्त्रीपुंनपुंसकैस्तिर्यग्नृसुरैरष्ट ते कृताः । शरीराचेतनत्वाभ्यामुपसर्गा दशोदिताः ।।१२।। आक्षेपण्यादयो यत्र प्रश्नव्याकरणे कथाः । पदलशास्त्रिनवतिः सहस्राण्यत्र षोडश ॥४३॥ अङ्गं विपाकसूत्रं यद् विपाकं कर्मणोऽवदत् । कोटी चतुरशीतिश्च पदलक्षा इहोदिताः ॥४४॥ शतं कोटीभिरष्टामिः सहाष्टाः षष्टिलक्षकाः । षट्पञ्चाशत्सहस्राणि पदानां पञ्च यत्र हि ॥४५॥ दृष्टिवादप्रमाणं स्यादेतत्तत्र सविस्तरम् । शतानि त्रीणि वर्ण्यन्ते विषष्टयाधिकदृष्टयः ॥४६॥ क्रियातश्चाक्रियातोऽन्या अज्ञानाद्विनयात्पराः । वदन्त्यो दृष्टयः सिद्धिं ताश्चतुर्धा व्यवस्थिताः ॥४७॥ सक्रियाः शतधाऽशीत्या चतस्रोऽशीतिरक्रियाः । अज्ञानात्सप्तषष्टिस्ता द्वात्रिंशद्विनयश्रिताः ॥४८॥ शिष्योंके द्वारा विनय-पूर्वक केवलीसे किये गये अनेक प्रश्न तथा उनके उत्तरका विस्तारके साथ वर्णन है ॥३४-३५।। छठा अंग ज्ञातकथांग है यह जिनधर्मकी कथारूप अमतका व्य करता है तथा इसमें पांच लाख छप्पन हजार पद हैं ॥३६॥ सातवाँ अंग उपासकाध्ययनांग है। श्रावकगण इसी अंगके आश्रित हैं अर्थात् श्रावकाचारका वर्णन इसी अंगमें है, इस अंगमें ग्यारह लाख सत्तरह हजार पद हैं ॥३७॥ आठवाँ अंग अन्तकृद् दशांग है इसमें तेईस लाख अट्ठाईस हजार पद हैं ।।३८|| इसमें प्रत्येक तीर्थकरके तीर्थमें दश प्रकारके उपसर्गको जीतकर संसारका अन्त करनेवाले दश-दश मुनियोंका वर्णन है ॥३९॥ नौवाँ अंग अनुत्तरोपपादिक दशांग है इसमें बानबे लाख चवालीस हजार पद कहे गये हैं। इस अंगमें प्रत्येक तीर्थंकरके तीर्थमें दश प्रकारके उपसर्ग जीतकर अनुत्तरादि विमानोंमें उत्पन्न होनेवाले दश-दश मुनियोंका वर्णन है ।।४०-४१॥ स्त्री, पुरुष और नपुंसकके भेदसे तीन प्रकारके तिर्यंच, तीन प्रकारके मनुष्य एवं स्त्री और पुरुषके भेदसे दो प्रकारके देव इन आठ चेतनोंके द्वारा किये हुए आठ प्रकारके चेतनकृत, एक शारीरिक, कुष्ठादिककी वेदनाकृत और एक अचेतनकृत-दीवाल आदिके गिरनेसे उत्पन्न सब मिलाकर दश प्रकारके उपसर्ग कहे गये हैं ॥४२॥ दशवा अंग प्रश्नव्याकरणांग है इसमें *आक्षेपिणी आदि कथाओंका वर्णन है तथा इसमें तिरानबे लाख सोलह हजार पद हैं ॥४३|| ग्यारहवां अंग विपाकसूत्रांग है। यह अंग ज्ञानावरणादि आठ कर्मोके विपाक-फलका वर्णन करता है और इसमें एक करोड़ चौरासौ लाख पद हैं ॥४४॥ और बारहवां अंग दृष्टिप्रवाद अंग है इसमें पदों की संख्या एक सौ आठ करोड़ अड़सठ लाख छप्पन हजार पाँच है ।।४५।। इस अंगमें तीन सौ त्रेसठ दृष्टियोंका विस्तारके साथ वर्णन किया गया है ॥४६॥ मलमें १ क्रियादृष्टि, २ अक्रियादृष्टि, ३ अज्ञानदृष्टि और ४ विनयदृष्टिके भेदसे दृष्टियाँ चार प्रकारकी हैं । ये दृष्टियाँ क्रमसे क्रिया, अक्रिया, अज्ञान और विनयसे सिद्धिको प्राप्ति होती है, ऐसा निरूपण करती हैं ।।४७॥ इनमें १. के ते दशोपसर्गाः ? तियंचः स्त्रीपुंनपुंसकाः, नरः स्त्रीपुंनपुंसकाः, देवाः स्त्रीपुरुषाः इत्थं चेतनकृता अष्टौ शारीरिक कुष्ठव्याध्यादि, अचेतनं भित्तिपतनादिकम्-सर्वे दशविधा उपसर्गाः । * १ आक्षेपिणी, २ विक्षेपिणी, ३ संवैदिनी और ४ निर्वेदिनीके भेदसे कथाएँ चार प्रकारको हैं: जिसमें स्वमतका स्थापन होता है उसे आक्षेपिणी, जिसमें परमतका खण्डन है उसे विक्षेपिणी, जिसमें धर्मके कलका वर्णन है उसे संवेदिनी और जिसमें वैराग्यका वर्णन है उसे निर्वेदिनी कथा कहते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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