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________________ दशमः सर्गः १८७ कोट्यश्चैवं चतुस्त्रिंशत् तच्छतान्यपि षोडश । ज्यशीतिश्च पुनर्लक्षाः शतान्यष्टौ च सप्ततिः ॥२४॥ अष्टाशीतिश्च वर्णाः स्युर्मध्यमे तु पदे स्थिताः । पूर्वाङ्गपदसंख्या स्यान्मध्यमेन पदेन सा ॥२५॥ एकैकाक्षरवृद्धया तु तस्समासमिदस्ततः । इत्थं पूर्वसमासान्तं द्वादशाङ्गं श्रुतं स्थितम् ॥२६॥ अष्टादशसहस्राणां पदानां संख्यया युतम् । तत्राचाराङ्गमाचारं साधूनां वर्गयत्यलम् ॥२७॥ यत्पत्रिंशत्सहस्रस्तु पदैः सूत्रकृतं युतम् । परस्वसमयार्थानां वर्णकं तद् विशेषतः ॥२८॥ चत्वारिंशत्सहस्रैश्च द्विसहस्रः पदैयुतम् । स्थानं स्थानान्तरं जन्तोर्वक्त्येकादिदशोत्तरम् ॥२९॥ चतुःषष्टिसहस्रयत्पदैश्च पदलक्षया । लक्षितं समवायाङ्गं वक्ति द्रव्यादितुल्यताम् ॥३०॥ धर्माधर्मकजीवानां लोकाकाशस्य वा यथा । प्रदेशाद्वब्यतस्तुल्याः समवायेन वर्णिताः ॥३॥ सिद्धिसीमन्तकाख्यं विमानं नरलोकजम् । प्रमाणं सममित्युक्तं तत्रैव क्षेत्रतस्तथा ॥३२॥ उत्सपिण्यवसर्पियोः कालतः समतोदिता । मावतोऽनन्तयोस्तत्र ज्ञानदर्शनयोरपि ॥३३॥ पदानां तु सहस्राणि यत्राष्टाविंशतिस्तथा । लक्षयोद्धयमाख्यातं व्याख्याप्रज्ञप्तिसंज्ञके ॥३४॥ तत्रोत्पथव्युदासेन विनयेन सविस्तरः । प्रश्न व्याख्यानभेदानां क्रमः समुपवर्यते ॥३५॥ तकका पद अर्थपद कहलाता है। आठ अक्षररूप प्रमाणपद होता है और मध्यमपदमें सोलह सो चौंतीस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठ सौ अठासी अक्षर होते हैं, और अंग तथा पूर्वोके को संख्या इसी मध्यम पदसे होती है॥२३-२५॥ एक-एक अक्षरकी वद्धि कर पदसमाससे लेकर पूर्व-समास पर्यन्त समस्त द्वादशांग श्रुत स्थित है ॥२६॥ उनमें पहला अंग आचारांग है जो मुनियोंके आचारका अच्छी तरह वर्णन करता है और अठारह हजार पदोंसे सहित है ॥२७॥ दूसरा अंग सूत्रकृतांग है जो स्वसमय और परसमयका विशेषरूपसे वर्णन करता है तथा छत्तीस हजार पदोंसे सहित है ।।२८॥ तीसरा अंग स्थानांग है जो जीवके एकसे लेकर दश तक स्थानोंका वर्णन करता है और बयालीस हजार पदोंसे सहित है। भावार्थ-स्थानांगमें-जीवके एक केवलज्ञान, एक मोक्ष, एक आकाश, एक धर्म द्रव्य, एक अधर्म द्रव्य आदि । दो दर्शन, दो ज्ञान, दो राग-द्वेष आदि । तीन सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रय, माया, मिथ्या, निदानतीन शल्य, जन्म-जरा-मरण-तीन दोष आदि। चार गति, चार कषाय, चार अनन्त चतुष्टर आदि । पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच अस्तिकाय, पाँच कषाय आदि । छह द्रव्य, छह लेश्या, छह काय, छह आवश्यक आदि। सात तत्त्व, सात भय, सात व्यसन, सात नरक आदि। आठ कर्म, आठ गुण, आठ ऋद्धियाँ आदि, नौ पदार्थ, नौ नय, नौ शील आदि। तथा दश धर्म, दश परिग्रह, दश दिशा आदि। इस तरह सदृश संख्यावाले पदार्थों का वर्णन है ।।२९|| चौथा अंग समवायांग है। यह एक लाख चौंसठ हजार पदोंसे सहित है तथा द्रव्य आदिको तुल्यताका वर्णन करता है ॥३०॥ जैसे धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, एक जीव द्रव्य और लोकाकाशके प्रदेश एक बराबर हैं-असंख्यातप्रदेशी हैं--यह द्रव्यको अपेक्षा तुल्यता समवाय अंग द्वारा वर्णित है ।।३१।। सिद्धशिला, प्रथम नरकका सीमन्तक नागका इन्द्रक विल, प्रथम स्वर्गका ऋतू-विमान और अढ़ाई द्वोप ये क्षेत्रसे समान हैं-पैंतालीस लाख योजन विस्तारवाले हैं-यह क्षेत्रको अपेक्षा समानता उसी समवायांगमें कही गयी है ॥३२॥ कालकी अपेक्षा उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीको समानता कही गयी है अर्थात् दोनों दश-दश कोडाकोड़ी सागर प्रमाण हैं और भावकी अपेक्षा केवलज्ञान तथा केवलदर्शनकी तुल्यता बतलायी गयी है अर्थात् जिस प्रकार केवलज्ञानके अविभाग प्रतिच्छेद हैं उसी प्रकार केवलदर्शनके भी अनन्त अविभाग प्रतिच्छेद हैं ॥३३॥ पांचवां अंग व्याख्याप्रज्ञप्ति अंग है उसमें पदोंको संख्या दो लाख अट्ठाईस हजार है। इस अंगमें कुमर्गित्यागी गणधरादि १. कख्यिं म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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