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________________ दशमः सर्गः १८९ नियतिश्च स्वभावश्च कालो दैवं च पौरुषम् । पदार्थ नव जीवाद्या स्वपरौ नित्यतापरौ ॥४९॥ पञ्चमिनियतिपृष्टश्चतुर्मिः स्वपरादिमिः । एकैकस्यात्र जीवादेोगेऽशीत्युत्तरं शतम् ॥५०॥ नियत्यास्ति स्वतो जीवः परतो नित्यतोऽन्यतः । स्वभावाकालतो दैवात् पौरुषाच्च तथेतरे ॥५१॥ सप्तजीवादितत्त्वानि स्वतश्च परतोऽपि च । प्रत्येक पौरुषान्तेभ्यो न सन्तीति हि सप्ततिः ॥५२॥ नियते कालतः स्वन्तन तानीति चतुर्दश । सप्तत्या सत्यमायोगेऽशीतिश्चतुरधिष्ठिताः ॥५३॥ पदार्थान्नव को वेत्ति सदाद्यः सप्तभङ्गकैः । इत्याज्ञानिकसंदृष्ट्या त्रिषष्टिरुपचीयते ॥५४॥ सजीवभाववित्को वा को वाऽसजीवभाववित् । सदसज्जीवभावज्ञः कश्चावक्तव्यजीववित् ॥१५॥ सदवक्तव्यजीवज्ञोऽसदवक्तव्यविच्च कः । सदसत्तमवक्तव्यं को वा वेत्तीति यो जनः ॥५६॥ सद्भावोत्पत्तिविद् वा कोऽसद्भावोत्पत्तिविच्च कः । उभयोत्पत्तिवित्कश्चाऽवक्तव्योत्पत्ति विच्च कः ।।५।। क्रियावादी एक सौ अस्सी, अक्रियावादी चौरासी, अज्ञानवादी अड़सठ और विनयवादी बत्तीस है ।।४८।। नियति, स्वभाव, काल, देव और पौरुष इन पाँचका स्वतः, परतः, नित्य और अनित्य इन चारके साथ गणा करनेपर बीस भेद होते हैं और इन बीस भेदोंका जीवादि नौ पदार्थों के साथ योग करनेपर क्रियावादियोंके एक सौ अस्सी भेद होते हैं। जैसे कोई मानता है कि जीव नियतिसे स्वतः है, कोई मानता है कि परतः है, कोई मानता है कि नित्य है, कोई मानता है कि अनित्य है । कोई मानता है कि जीव स्वभावसे स्वतः है, कोई मानता है कि परतः है, कोई मानता है कि नित्य है, कोई मानता है कि अनित्य है। कोई मानता है कि जीव कालसे स्वतः है, कोई मानता है कि परतः है, कोई मानता है कि नित्य है, कोई मानता है कि अनित्य है और कोई मानता है कि जीव देवसे स्वतः है। कोई मानता है कि परतः है। कोई मानता है कि नित्य है और कोई मानता है कि अनित्य है। और कोई मानता है कि जीव पौरुषसे स्वतः है, कोई मानता है कि परतः है। कोई मानता है कि नित्य है और कोई मानता है कि अनित्य है। जिस प्रकार नियति आदिके कारण जीव पदार्थके बीस-बीस भंग हैं उसी प्रकार अजीवादि पदार्थों के भी बीस भंग हैं। इस तरह क्रियावादियोंके सब मिलाकर एक सौ अस्सी भेद होते हैं ॥४९-५१॥ जीवादि सात तत्त्व, नियति, स्वभाव, काल, दैव और पौरुषकी अपेक्षा न स्वतः हैं और न परतः हैं। इस तरह जीवादि सात तत्त्वोंमें नियति आदि पाँचका गुणा करनेपर पैंतीस और पैंतीसमें स्वतः, परतः इन दोका गुणा करनेपर सत्तर भेद हुए। पुनः जीवादि सात तत्त्व ति और कालकी अपेक्षा नहीं हैं इसलिए सातमें दोका गुणा करनेपर चौदह भेद हए। पूर्वोक्त सत्तर भेदोंके साथ इन चौदह भेदोंको मिला देनेपर अक्रियावादियोंके चौरासी भेद होते हैं ॥५२-५३|| जीवादि नौ पथार्थोंको १ सत्, २ असत्, ३ उभय, ४ अवक्तव्य, ५ सद् अवक्तव्य, ६ असत् अवक्तव्य, और उभय अवक्तव्य इन नौ भंगोंसे कौन जानता है ? इस प्रकार नौ पदार्थोंमें सात भंगोंका गुणा करनेपर आज्ञानिक मिथ्यादृष्टियोंके वेसठ भेद होते हैं ॥५४|| जैसे १ कोई कहता है कि जीव सत् रूप है यह कौन जानता है ? २ कोई कहता है कि जीव असद् रूप है यह कौन जानता है ? ३ कोई कहता है कि जीव सत्-असत्-उभय रूप है यह कौन जानता है ? ४ कोई कहता है कि जीव अवक्तव्य रूप है यह कौन जानता है ? ५ कोई कहता है कि जीव सद् अवक्तव्य रूप है यह कौन जानता है ? ६ कोई कहता है कि जीव असद् अवक्तव्य रूप है यह कौन जानता है ? और कोई कहता है कि जीव सत्-असत् अवक्तव्य रूप है यह कौन जानता है ? इसी प्रकार अजीवादि पदार्थोंके साथ सात-सात भंगोंकी योजना करनेपर वेसठ भेद होते हैं। इन त्रेसठ भेदोंमें १. तथोत्तरे म., घ.। २. वसन्तीति हि सप्ततिः ख. । ३. इत्याद्यनेक-म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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