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________________ १८२ हरिवंशपुराणे श्रेयसा पात्रनिक्षिप्तपुण्ड्रेक्षुरसधारया । स्पर्धयेव सुरैः स्पृष्टा वसुधारापतद्दिवः ॥१९५॥ अभ्यचिते तपोवृद्धये धर्मतीर्थकरे गते । दानतीर्थकर देवाः साभिषेकमपूजयन् ॥१९६॥ श्रुत्वा देवनिकायेभ्यः सदानफलघोषणम् । समेत्य पूजयन्ति स्म श्रेयांसं मरतादयः ॥१९७॥ इतिहासमनुस्मत्य दानधर्मविधि ततः । शुश्रवुः श्रद्धया युक्ताः प्रत्यक्षफलदशिनः ॥१९८॥ प्रतिग्रहोऽतिथेरुच्चैःस्थानस्थापनमन्यतः । पादप्रक्षालनं दात्रा पूजनं प्रणतिस्ततः ॥१९९॥ मनोवचनकायानामेषणायाश्च शुद्धयः । प्रकारा नव विज्ञेया दानपुण्यस्य संग्रहे ॥२०॥ पुण्यमित्थमुपातं यत् तदभ्युदय लक्षणम् । 'दत्वा दातुः फलं दत्ते प्राग निश्रेयसलक्षणम् ॥२०१॥ इतिश्रुत यथातत्त्वा श्रेयांसममिनन्द्य ते । दानधर्मोद्यतस्वान्ता नृपा याता यथागेतम् ॥२०२॥ सहस्रवर्ष वृषभो चतुर्ज्ञानचतुर्मुखः । चक्रे मोक्षार्थबोधार्थ तपो नानाविधं स्वयम् ॥२०३॥ सप्रलम्बजटाभारभ्राजिष्णुजिष्णुराबभौ । रूढप्रारोहशाखाग्रो यथा न्यग्रोधपादपः ॥२०॥ अन्यदा विहरन् प्राप्तः पूर्वतालपुरं पुरम् । राजा वृषमसेनाख्यो यत्रास्ते भरतानुजः ॥२०५॥ तत्रोद्यानं महोद्योगः शकटास्याभिधानकम् । ध्यानयोगमथासाद्य स न्यग्रोधतरोरधः ॥२०६॥ उपविष्टः शिलापट्टे पर्यङ्कासनबन्धनः । वशस्थकरणग्रामः शुक्लध्यानासिधारया ॥२०७॥ समय आकाशमें न समा सकनेके कारण ही मानो सुमन ( पुष्पों ) की वर्षा होने लगी थी और वह ऐसी जान पड़ती थी मानो राजा श्रेयान्सकी सुमनवृत्ति-पवित्र मनका व्यापार ही भीतर न समा सकनेके कारण शरीरसे बाहर निकल रहा हो ॥१९४॥ राजा श्रेयान्सने पात्रके लिए जो इक्षरसको धारा दो थी उसके साथ ईर्ष्या होने के कारण ही मानो आकाशसे देवकृत रत्नोंकी धारा नीचे पड़ने लगी ॥१९५॥ पूजा होनेके बाद जब धर्म तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव तपकी वृद्धिके लिए वनको चले गये तब देवोंने अभिषेकपूर्वक दान तीर्थकर-राजा श्रेयान्सकी पूजा की ॥१९६॥ देवोंसे समीचीन दान और उसके फलकी घोषणा सुन भरतादि राजाओंने भी आकर राजा श्रेयान्सकी पूजा की ॥१९७॥ इतिहास-पूर्व घटनाका स्मरण कर राजा श्रेयान्सने जो दानरूपी धमकी विधि चलायो थी उसे दानका प्रत्यक्ष फल देखनेवाले भरत आदि राजाओंने बड़ी श्रद्धाके साथ श्रवण किया ॥१९८॥ राजा श्रेयान्सने बताया कि दान सम्बन्धी पुण्यका संग्रह करनेके लिए १ अतिथिको पड़गाहना, २ उच्च स्थानपर बैठाना, ३ पाद-प्रक्षालन करना, ४ दाता द्वारा अतिथिको पूजा होना, ५ नमस्कार करना, ६ मनःशुद्धि, ७ वचन-शुद्धि, ८ काय-शुद्धि और ९ आहार-शुद्धि बोलना ये नौ प्रकार जानने के योग्य हैं ॥१९९-२००।। दानका फल बताते हुए राजा श्रेयान्सने कहा कि इस तरह दान देनेसे जो पुण्य संचित होता है वह दाताके लिए पहले स्वर्गादि रूप फल देकर अन्तमें मोक्षरूपी फल देता है ॥२०१।। इस तरह यथार्थ बातको सनकर जिनके चित्त दानरूपी धर्मके लिए उद्यत हो रहे थे ऐसे भरत आदि राजा जैसे आये थे वैसे चले गये ॥२०२॥ चार ज्ञानरूपो चार मुखोंको धारण करनेवाले भगवान् वृषभदेवने स्वयं मोक्ष तत्त्वका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करनेके लिए एक हजार वर्ष तक नाना प्रकारका तप किया ॥२०३।। लम्बी-लम्बी जटाओंके भारसे सुशोभित आदि जिनेन्द्र उस समय जिसकी शाखाओंसे पाये लटक रहे थे ऐसे वट-वृक्षके समान सुशोभित हो रहे थे।।२०४॥ अथानन्तर किसी समय विहार करते हुए भगवान्, पूर्वतालपुर नामक उस नगरमें पहुंचे जहाँ कि भरतका छोटा भाई राजा वृषभसेन रहता था ॥२०५॥ वहाँ वे शकटास्य नामक उद्यानमें बड़ी तत्परताके साथ ध्यान धारण कर वटवृक्षके नीचे एक शिलापर पर्यकासनसे विराजमान हो गये। उस समय उन्होंने शुक्ल ध्यानरूपी तलवारकी धारसे इन्द्रियोंके समूहको अपने वश १. दत्वा तु यत्फलं भुक्तं म. । २. यथाक्रमम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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