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## Ninth Canto 181. Having been awakened by the radiant light, he (Shreyans) realized the ten past lives of himself and the Lord. He fell unconscious at the Lord's feet. 182. Even while unconscious, Shreyans gently wiped the Lord's feet with the soft hair of his head. He washed them with a stream of warm, joyful tears, to relieve the fatigue of the journey. 183. Remembering the way the two sons of the Charan, Shrimati and Vajrajangha, had given charity in the past, he (Shreyans) was filled with devotion. 184. "O Lord! Stay, stay!" he exclaimed, leading the Lord inside the house. He placed the Lord on a high seat and washed the Lord's lotus feet. 185. Knowing the rules of charity and being the one who implements them himself, Shreyans performed the three-fold prostration, offering worship to the Lord's feet. 186. Filled with faith and other virtues, he lifted a pot filled with sugarcane juice, a vessel with all the auspicious signs, and said, "O Lord! This sugarcane juice is free from the sixteen origination defects, the sixteen production defects, the ten passions, and the four giver-related defects of smoke, embers, measure, and connection. It is fit for offering. Please accept it." 187. With a pure heart, the Lord Vrishabhadeva, standing with his feet straight, showed the method of taking the meal, accepting the offering with his hand, for the growth of his conduct. 188. Having received the Lord, the auspicious Jina, as the recipient of his charity, Shreyans experienced five wonders, arising from five types of purity. 189. "Oh, what a gift! Oh, what a gift! Oh, what a recipient! Oh, what a method of giving!" Such sounds arose from the heavens, uttered by the gods. 190. The divine drums in the sky, sounding like thunder, proclaimed to the three worlds, "The birth of the one who establishes the pilgrimage of charity has taken place!" 191. The wind, fragrant with the breath of the gods, blew, as if exhaled by the faces of the directions, filled with the glory of the great charity. 192. A rain of flowers, endless and emanating from the bodies of the gods, fell. And again, an endless rain of flowers of auspiciousness fell from the heavens.
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________________ नवमः सर्गः १८१ दीप्रेणाप्युपशान्तेन स तद्रपेण बोधितः । 'दशात्मेशभवान् बुद्ध्वा पादावाश्रित्य मूछितः ॥१८१॥ मूञ्छितेनापि तत्पादौ प्रमज्य मृदुमूर्धजैः । अधश्रमच्छिदा धौती सोष्णानन्दाश्रुधारया ॥१८२॥ श्रीमतीवज्रजङ्घाभ्यां दत्तं दानं पुरा यथा। चारणाभ्यां स्वपुत्राभ्यां संस्मत्य जिनदर्शनात् ॥१८३॥ भगवन् ! तिष्ठ तिष्ठेति चोक्त्वा नीतो गृहान्तरे । उच्चैः स चौसने स्थाप्य धौततत्पादपङ्कजः ॥१८४॥ 'तचरणपूजनं कृत्वा प्रणतिं च त्रिधा तथा । दानधर्मविधेर्बोद्धा विधाता स्वयमेव सः ॥१८५॥ श्रद्धादिगुणसंपूर्णः पात्रे संपूर्णलक्षणे । दित्सुरिक्षुरसापूर्ण कुम्भमुदत्य सोऽब्रवीत् ॥१६॥ षोडशोद्गमदोषैश्च षोडशोत्पादनिश्चितैः । दशाभिश्चैषणादोपैर्विशुद्धमपरैस्तथा ॥१८७॥ धूमाङ्गारप्रमाणाख्यैः संयोजनयुतैः प्रमो । मुक्तं दायकदोषैश्च गृहाण प्रासुकं रसम् ॥१८॥ वृत्तवृद्धय विशुद्धात्मा पाणिपात्रेण पारणम् । समपादस्थितश्चक्रे दर्शयन् क्रियया विधिम् ॥१८९॥ श्रेयसि श्रेयसा पात्र प्रतिलब्धे जिनेश्वरे । पञ्चाश्चर्य विशुद्धिभ्यः पञ्चाश्चर्याणि जज्ञिरे ॥१९॥ अहो दानमहो दानमहो पात्रमहो क्रमः । साधु साध्विति खे नादः प्रादुरासोदिवौकसाम् ॥१९१॥ नेदुरम्बदनि?षाः सुरदुन्दुभयोऽम्बरे । दानतीर्थकरोत्पत्ति घोषयन्तो जगत्त्रये ॥१९२॥ श्रेयोदानयशोराशिपूर्णदिग्वनिताननैः । प्रोद्गीर्ण इव निःश्वाससुरभिः पवनो ववौ ॥१९३॥ पपात सुमनोवृष्टिरमान्तीवाङ्गनिर्गता । श्रेयसः सुमनोवृत्तिरमान्तीय दिवः पुनः ॥१९४॥ मनमें यह विचार आया कि ऐसा रूप तो मैंने पहले कहीं देखा है ॥१८०॥ भगवान्के देदीप्यमान होनेपर भी उपशान्त रूपसे प्रतिबोधको प्राप्त हुआ यान्स अपने तथा भगवान् के दस पूर्व भवोंको जान गया और उनके चरणोंके समीप आकर मूच्छित हो गया ॥१८१।। मूच्छित होनेपर भी श्रेयान्सने अपने शिरके कोमल-बालोंसे भगवान के चरण पोंछे और मार्ग का श्रम दूर करनेके लिए आनन्दजन्य गरम-गरम आंसूओंकी धारासे धोये ॥१८२।। श्रीमती और वज्रजंघने पहले चारण ऋद्धिके धारक अपने दो पुत्रोंके लिए जिस विधिसे दान दिया था वह सब विधि भगवान्का दर्शन करते ही श्रेयान्सकी स्मतिमें आ गयी ॥१८॥ तदनन्तर दान-धर्मको विधिका ज्ञाता और उसकी स्वयं प्रवृत्ति करानेवाला राजा श्रेयान्स श्रद्धा आदि गुणोंसे युक्त हो 'हे भगवन् ! तिष्ठ-तिष्ठ-ठहरिए-ठहरिए' यह कहकर भगवान्को घरके भीतर ले गया, वहां उच्चासनपर विराजमान कर उसने उनके चरण-कमल धोये, उनके चरणोंको पूजा करके उन्हें मन, वचन, कायसे नमस्कार किया। फिर सम्पूर्ण लक्षणोंसे युक्त पात्रके लिए देनेकी इच्छासे उसने इक्षुरससे भरा हुआ कलश उठाकर कहा कि प्रभो! यह इक्षुरस सोलह उद्गम दोष, सोलह उत्पादन दोष, दश एषणा दोष तथा धूम-अंगार प्रमाण और संयोजना इन चार दाता सम्बन्धी दोषोंसे रहित एवं प्रासुक है, इसे ग्रहण कीजिए ॥१८४-१८८॥ तदनन्तर जिनकी आत्मा विशुद्ध थी और जो पैरोंको सीधा कर खड़े थे ऐसे भगवान् वृषभदेवने क्रियासे आहारकी विधि दिखाते हुए चारित्रकी वृद्धिके लिए पारणा की ।।१८९|| राजा श्रेयान्सने कल्याणकारी श्रीजिनेन्द्ररूपी पात्र प्राप्त किये इसलिए पाँच प्रकारकी आश्चर्यजनक विशुद्धियोंसे पंचाश्चर्य प्रकट हुए ।।१९०।। 'अहो दान, अहो दान, अहो पात्र, अहो दान देने की पद्धति, धन्य-धन्य', इस प्रकार आकाशमें देवोंके शब्द हुए ॥१९१॥ आकाशमें मेघोंके समान शब्द करनेवाले देव-दुन्दुभि बजने लगे। वे दुन्दुभि तीनों जगत्में मानो इस नामको घोषणा हो कर रहे थे कि दानरूपी तीर्थको चलानेवालेकी उत्पत्ति हो चुकी है ॥१९२॥ राजा श्रेयान्सके दानसे उत्पन्न यशकी राशिसे पूर्ण दिशारूपी स्त्रियोंके मुखसे प्रकट हुए श्वासोच्छ्वासके समान सुगन्धित वायु बहने लगी ॥१९३॥ उस १. आत्मनः ईशस्य च दश भवान् बुद्ध्वा। २. अध्वभ्रम म. । ३. सदासने म.। ४. सर्व पुस्तके वित्थमेव पाठः कित्वत्र पादे नवाक्षरत्वात् छन्दोभङ्गो भवति 'तत्पादपूजनं कृत्वा' इति पाठः सुष्ठु प्रतिभाति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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