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________________ हरिवंशपुराणे रचितः परिवर्गेण स्नातयोश्च तयोस्ततः । सुभोजन विधिस्तत्र दिव्याहारमनोहरः ॥१६७॥ मणिकुट्टिमभूमौ तावुपविष्टौ भुजि' प्रति । सिद्धार्थस्तूर्णमागत्य दिष्ट्या वर्धयतीत्य सौ ॥ ९६८ ॥ तितिक्षोः पृथिवीं यस्य मकरालयमेखलाम् । शिविकोद्वाहिनोऽभूवन् देवा वज्रधरादयः ॥ १६९॥ मग्ने कच्छमहाकच्छपूर्वपुङ्गवमण्डले । बिभर्ति दुर्वहामेको वृषभो यस्तपोधुराम् ॥ ३७० ॥ यत्कथामृततृप्तानां गोष्ठीषु विदुषां सदा । वर्तते युष्मदादीनां नाहारग्रहणे मतिः ॥ १७१ ॥ प्राघूर्णिकोऽद्य सोऽस्माकमकस्माज्जगतां पतिः । क्षान्ति मैत्रीत पोलक्ष्मीसहायः समुपागतः ॥ १७२ ॥ दिशा वैश्रवणस्यैव प्रविश्य नगरीं विभुः । युगान्तदृष्टिरास्थाय चान्द्रीं चर्यां यथोचिताम् ॥ १७३ ॥ संभ्रान्त्यान्वितलोकस्य पादयोरर्थ्यदायिनः । स्तुतिभिर्वन्दनाभिश्च समन्तादुपसेवितः ॥ १७४॥ "धाम धाम निजं धार्मं प्रकिरन्निव शोतगुः । अस्मदीयतया नाथो निशान्ताजिर माप्तवान् ॥१७५॥ इति सिद्धार्थवागर्थं ज्ञातोच्छ्रायससंभ्रमौ । अभिजग्मतुरीशस्य ललाटे न्यस्तहस्तकौ ॥ १७६ ॥ आगच्छ मर्तरादेशं प्रयच्छेति कृतध्वनी । चन्द्रार्काविव शैलेशमर्ध्वनीमं परीयतुः ॥ १७७॥ पतित्वा पादयोस्तस्य सुखपृच्छापुरःसरौ । आगते मनिनो हेतुं ध्यायन्तावग्रतः स्थितौ ॥१७८॥ सोमप्रभस्य देवीमिर्लक्ष्मीसत्यकरोत् प्रिया । शशिरेखेव ताराभिगिरीशं तं प्रदक्षिणम् ॥ १७९॥ स श्रेयानीक्षमाणस्तं निमेषरहितेक्षणः । रूपमीदृक्षमद्राक्षं क्वचित् प्रागित्यधान्मनः ॥ १८० ॥ ५ १८० 1 1 तदनन्तर दोनों भाई स्नान कर तैयार हुएं और परिजनोंने उनके लिए दिव्य आहारसे मनोहर उत्तम भोजन की विधि की भोजनसे थालियाँ सजायीं । मणिमय फशंके ऊपर दोनों भाई भोजन के लिए बैठे ही थे कि उसी समय सिद्धार्थ नामका द्वारपाल शीघ्रतासे आकर इस हर्षवर्धक समाचारसे उन्हें वृद्धिंगत करने लगा ।। १६७ - १६८ ।। कि समुद्रान्त पृथिवीका त्याग करते समय इन्द्रादिक देव जिनकी पालकीके उठानेवाले थे । कच्छ, महाकच्छ आदि पूर्वं पुरुषोंके भ्रष्ट हो * पर जो अकेले ही तपके दुर्धर भारको धारण कर रहे हैं, सभा-गोष्ठियोंमें आप-जैसे विद्वान् जिनकी कथारूपो अमृत से सन्तुष्ट होकर आहार ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं रखते और जो क्षमा, मैत्री तथा तपरूपी लक्ष्मीसे सहित हैं, वे त्रिलोकीनाथ भगवान् वृषभदेव आज अकस्मात् हमारे अतिथि बनकर आये हुए हैं ।। १६९ - १७२ ।। वे प्रभु उत्तर दिशासे ही नगर में प्रवेश कर पधार रहे हैं, यथायोग्य चान्द्रीचर्याका नियम लेकर जूडा प्रमाण दृष्टिसे विहार कर रहे हैं, हड़बड़ाहट से युक्त मनुष्य उनके चरणोंमें अर्घ दे रहे हैं तथा स्तुति और वन्दनाके द्वारा उनकी सब ओरसे सेवा कर रहे हैं, वे चन्द्रमाके समान प्रत्येक घरमें अपना तेज बिखेरते हुए अपना समझ अन्तःपुरके आँगन में आ पहुँचे हैं ।। १७३ - १७५ ।। इस प्रकार सिद्धार्थंके वचनोंका तात्पर्यं समझ हर्ष से भरे हुए दोनों भाई, हाथ जोड़ ललाटपर धारण कर भगवान् के सामने गये ||१७६ || हे स्वामिन् ! आइए आज्ञा दीजिए, यह कहते हुए दोनों भाइयोंने जिस प्रकार चन्द्रमा और सूर्य सुमेरुकी प्रदक्षिणा देते हैं उसी प्रकार मार्ग में भगवान् की प्रदक्षिणा दी || १७७॥ तदनन्तर चरणों में पड़कर (नमस्कार कर) सुख -समाचार पूछते हुए दोनों भाई आगे खड़े हो गये । उस समय वे मौनके धारक भगवान् के आगमनका कारण विचार रहे थे ||१७८ ॥ जिस प्रकार चन्द्रमाकी रेखा ताराओंके साथ सुमेरु पर्वतको प्रदक्षिणा देती है, उसी प्रकार राजा सोमप्रभकी रानी लक्ष्मीमतीने अन्य अनेक रानियोंके साथ भगवान्की प्रदक्षिणा ॥ १७९ ॥ उसी समय टिमकार रहित नेत्रोंसे भगवान् की ओर देखते हुए श्रेयान्सके १. भुजं म । २. व्यक्तुमिच्छो: । ३. वाहनो भूवन् म । ४. वैश्रवणस्येव म. । ५. गृहं गृहं प्रति । ६, तेजः । ७. भवनाङ्गणं । ८. अध्वनि मार्गे; इमं भगवन्तं । ९. आगतो म. । * जिस प्रकार चन्द्रमा छोटे-बड़े सभीके घरपर अपना प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार जिसमें अतिथि छोटेबड़े सभी के घर पर जाता है, उसे चान्द्रीचर्या कहते हैं । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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