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________________ नवमः सर्गः १७९ लोकस्य प्रतिबोधार्थमुदितस्य दिने दिने । जिनार्कस्थ न खेदाय जगभ्रमणमप्यभूत् ॥१५५।। तथा यथागर्म नाथः षण्मासानविषण्णधोः । प्रजाभिः पूज्यमानः सन् विजहार महों क्रमात् ॥१५६॥ संप्राप्तोऽथ सदादानैरिभैरिमपुरं विभुः । दानप्रवृत्तिरति सूचयद्भिरिवाचितम् ।।१५७।। तस्मिन् सोमप्रभः श्रेयानपि भूपौ सहोदरौ । तस्यामेव विभावर्या स्वप्नानेतानपश्यताम् ॥१५॥ चन्द्रमिन्द्रध्वज मेरुं सतडित्कल्पपादपम् । रत्नद्वीपं विमानं च नाभेयं पुरुषोत्तमम् ।।३५२॥ प्रभाते तो 'कुरुप्रेष्ठावास्थानस्थौ च विस्मितौ । चक्राते बुधचक्रेण सुस्वप्नफलसंकथाम् ।।१६।। बन्धुः कौमुदखण्डानामिव कौमुदमावही । अद्यवेष्यति बन्धुनः कोऽपि नूनमनूनभाः ॥१६१।। उच्चैर्यशोध्वजो लोके सर्वकल्याणपर्वतः । जगत्कल्पद्रुमो विद्युत्क्षणदर्शितविग्रहः ॥१२॥ धर्मरत्नमहाद्वीपो वैमानिकजगच्च्युतः । स्वप्नवम्किनु नाभेयः स्वयमेवाद्य दृश्यते ।।१६३॥ पुरस्य राजगेहस्य लक्ष्मीरचैव लक्ष्यते । भद्रं निवेदयत्याशु ककुभां च प्रसन्नता ॥१६॥ स्वप्नार्थमिति बुद्ध्वा तौ नियुज्यान्तर्बहिर्नरान् । कथया जिननाथस्य शक्ती यावदवस्थितौ ॥१६५।। तावदामातमाध्याह्वशङ्खनादः समुच्छ्रितः । वर्धयन्निव दिष्टया तो जिनागमनिवेदनात् ।।१६६॥ जानते थे इसलिए किसीको आहार देनेका विकल्प नहीं उठा ॥१५४॥ जिस प्रकार लोगोंको जागृत करनेके लिए उगे हुए सूर्यका जगत्में भ्रमण करना उसके खेदका कारण नहीं है उसी प्रकार लोगोंको प्रतिबुद्ध करने के लिए तत्पर जिनेन्द्र भगवान्का जगत्में जहाँ-तहाँ भ्रमण करना उसके खेदका कारण नहीं था ॥१५५।। इस प्रकार जिनकी बुद्धि में रंचमात्र भी विषाद नहीं था ऐसे भगवान् प्रजाके द्वारा पूजित होते हुए लगातार छह माह तक आगमके अनुसार क्रमसे पृथिवीपर विहार करते गये ॥१५६।।तदनन्तर विहार करते-करते भगवान् हस्तिनागपुर नगर पहुँचे । वह नगर जिनसे सदा दान (मद) चूता रहता था और जो मानो इस बातकी सूचना ही दे रहे थे कि यहां दान (त्याग) की प्रवृत्ति होगी ऐसे हाथियोंसे सहित था ॥१५७॥ उस नगरके राजा सोमप्रभ और श्रेयान्स थे। उन दोनों भाइयोंने उसी रातमें चन्द्रमा, इन्द्रकी ध्वजा, मेरु पर्वत, बिजली, कल्पवृक्ष, रत्नद्वीप, विमान और पुरुषोत्तम भगवान् ऋषभदेव ये आठ स्वप्न देखे ॥१५८-१५९|| प्रातःकाल दोनों भाई सभामें बैठे और आश्चर्यसे चकित हो विद्वत्समूहके साथ इन्हीं उत्तम स्वप्नोंके फलकी चर्चा करने लगे ॥१६०॥ विद्वानोंने उक्त स्वप्नोंका फल इस प्रकार बताया कि कुमुदबन्धु-चन्द्रमाके समान पृथिवीपर आनन्दको बढ़ानेवाला तथा उत्कृष्ट कान्तिको धारण करनेवाला हमारा कोई बन्धु आज ही यहां आवेगा । वह उत्तम यशरूपी ध्वजाका धारक होगा, संसार में समस्त कल्याणोंका पर्वत होगा, जगत्के मनोरथोंको पूर्ण करनेके लिए कल्पवृक्षरूप होगा, बिजलीके समान क्षण-भर ही अपना शरीर दिखलानेवाला होगा, धर्मरूपी रत्नोंका महाद्वीप होगा और वैमानिक जगत-स्वर्ग लोकसे च्युत हुआ होगा। भगवान ऋषभदेवने जिस प्रकार स्वप्नमें दर्शन दिया है क्या आज वे स्वयं ही दर्शन देंगे-स्वयं यहाँ पधारेंगे। नगर तथा राजभवनकी जो शोभा है वह आज ही दिखाई दे रही है ऐसी शोभा पहले कभी नहीं दिखी। तथा दिशाओंकी निर्मलता भी शीघ्र हो कल्याणकी सूचना दे रही है ॥१६१-१६४।। इस प्रकार स्वप्नोंका फल जानकर तथा भीतर और बाहर अनेक मनुष्योंको नियुक्त कर जिनेन्द्र भावान्की चर्चा करते हुए दोनों समर्थ भाई जबतक बैठे तबतक मध्याह्न कालके फूंके हुए शंखका जोरदार शब्द हुआ। वह शंखका शब्द ऐसा जान पड़ता था मानो जिनेन्द्र भगवान्का आगमन होनेवाला है-इस शुभ समाचारसे उन दोनोंको बढ़ा ही रहा हो ॥१६५-१६६।। १. हस्तिनागपुरम् । २. -रिवोचितम् म. । ३. श्रीमानपि म. । ४. भूमौ म. । ५. कुरुवंशश्रेष्ठौ। ६. किंतु म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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