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________________ १७८ हरिवंशपुराणे षण्मासानशनस्यान्ते संहृतप्रतिमास्थितिः । प्रतस्थे पदविन्यासैः क्षिति पल्लवयन्निव ।। ३ ४२॥ आकेवळोदयाम्मौनी प्रलम्बितभुजः पथि । सावधानां गतिं बिभ्रन्नातिद्रुतविलम्बिताम् ॥१४॥ मध्याह्नेषु पुरग्रामगृहपङ्क्तिषु दर्शनम् । प्रशस्तासु प्रजाभ्योऽदाच्चान्द्रीचर्या चरन् क्षितौ ॥१४॥ भ्राम्यन्तं तं तथा नाथं सौम्यविग्रहमुन्मुखाः । पश्यन्त्यो न प्रजास्तृप्ता यथा चन्द्रं नवोदितम् ।।१४५॥ 'श्वेतमानुरयं किंतु स्वर्भानुग्रासशङ्कया। भूमिगोचरमायातस्त्यक्ततासर्कगोचरः ॥१४६।। पूषा किंवा मवेदेष भूभृत्प्रासादभूरुहाम् । छायातमस्तिरस्कतु द्वितीय क्षितिमागतः ।।१४७।। अहो कान्तः परं स्थानमहो दीप्तः परं पदम् । अहो सशीलशैलोऽयं गुणराशिरहो महान ॥१४॥ सौरूप्यस्य परा कोटिः सौलावण्यस्य भूः पराः । माधुर्यस्य पराऽवस्था धैर्यस्यायं परा स्थितिः ।।१४९।। एतैतेक्षणसार्फल्यमन्ते पश्यत पश्यत । जना दिग्वसनस्यापि परमां रमणीयताम् ॥१५०॥ इत्यन्योन्य कृतालापा घनसंघट्टसंकटाः । जिनं नराश्च नार्यश्च ददृशुर्विस्मयाकुलाः ॥[षड्भिः कुलकम्] केचिद् वस्त्राणि चित्राणि भूषणान्यपरे परे । दिव्यानि गन्धमाल्यानि प्रकुर्वन्ति पुरः प्रभोः ॥१५२।। तुरङ्गतुङ्गमातङ्गरथयानान्यथापरे । सद्यःसजानि तस्याग्रे स्थापयन्ति विमोहिनः ।।१५३।। अदृष्टश्रुतपूर्वस्वात् तत्प्रयोग्यमजानता । भिक्षादानविधिस्तस्मै न लोकेन विकल्पितः ॥५४॥ दूर करने में स्वयं समर्थ थे तो भी परोपकारके अर्थ उन्होंने गोचर-वृत्तिसे अन्न-ग्रहण करनेकी इच्छा की ।।१४१॥ तदनन्तर छह महीनेके अनशनके बाद जिन्होंने प्रतिमा योगका संकोच कर लिया था ऐसे भगवान् आदि जिनेन्द्र अपने चरणोंके निक्षेपसे पृथिवीको पल्लवित करते हुए आहारके लिए चले ॥१४२।। केवलज्ञान प्राप्त होने तक उन्होंने मौन व्रत ले रखा था, मार्गमें चलते समय उनकी भुजाएँ नीचेकी ओर लम्बी थीं, वे न अधिक शीघ्र और न अधिक धीमी चालसे सावधानीपूर्वक चल रहे थे ।।१४३॥ पृथिवोपर चान्द्री चर्यासे विचरण करते हुए वे मध्याह्नके समय उत्तम नगर तथा ग्रामोंकी गृह पंक्तियोंमें प्रजाके लिए दर्शन देते थे ।।१४४॥ जिस प्रकार नूतन उगे हुए चन्द्रमाको देखती हुई प्रजा सन्तुष्ट नहीं होती है उसी प्रकार उस तरह भ्रमण करते हुए सौम्य शरीरके धारक भगवान्को ऊपरकी ओर मुख उठा-उठाकर देखती हुई प्रजा सन्तुष्ट नहीं होती थी॥१४५॥ भगवान्को देख अनेक लोग ऐसा तर्क करते थे कि क्या यह राहुके द्वारा ग्रसे जानेके भयसे नक्षत्र और सूर्य मण्डलको छोड़कर चन्द्रमा ही पृथिवी तलपर आ गया है ? अथवा क्या पहाड़, महल और वृक्षोंकी छायारूपी अन्धकारको दूर करनेके लिए यह सूर्य ही पृथिवीपर अवतीर्ण हुआ है ? ।।१४६-१४७।। अहो ! ये भगवान् कान्तिके परम स्थान हैं, दीप्तिके अद्वितीय धाम हैं, अहो ! ये उत्तम शीलके मानो पर्वत हैं, अहो ! ये गुणोंके महासागर हैं। ये सुन्दर रूपकी परम सीमा हैं, वे लावण्यको उत्कृष्ट भूमि हैं, माधुर्यको परम अवस्था हैं और धैर्यको उत्कृष्ट रीति हैं।।१४८-१४९।। अरे भव्यजनो! आओ, आओ नेत्रोंको सफल करो। देखो, नग्न-दिगम्बर होनेपर भी इनकी कैसी परम सुन्दरता है ? ॥१५०। इस प्रकार आपस में वार्तालाप करते तथा बहुतबहुत बड़ी भीड़के साथ इकट्ठे हुए नर-नारी आश्चर्यसे व्याकुल हो भगवान्के दर्शन कर रहे थे ॥१५१॥ उस समय कोई चित्र-विचित्र वस्त्र, कोई तरह-तरहके आभूषण और कोई उत्तमोत्तम गन्ध तथा मालाएँ भगवान्के आगे समर्पित करते थे ॥१५२॥ कितने ही अज्ञानी लोग तत्काल सजाये हुए घोड़े, ऊंचे-ऊंचे हाथी, रथ तथा अन्य वाहन उनके आगे रखते थे ॥१५३॥ लोगोंने कभी किसीको आहार देते हुए न देखा था और न सुना था और न वे भगवान्के अभिप्रायको ही १. श्राम्यन्तं म. । २. पश्यन्तो क., ख., म.। ३. चन्द्रः। ४. साफल्यं एनं म.। ५. नग्नस्यापि । ६. कृतालापधनसंघसंघटा म.। ७. जिनस्याभिप्रायं क. टि.। ८. विकल्पिता। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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