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________________ १६२ हरिवंशपुराणे क चेदं सौकुमार्य ते क्व च कार्कश्यमीदृशम् । नाथान्योन्यविरुद्धार्थसंभवस्त्वयि दृश्यते ॥२०३॥ अष्टोत्तरसहस्रोच्चैर्लक्षणं व्यञ्जनाञ्चितम् । रूपं तवैतदामाति भूसुरासुरदुर्लभम् ॥२०४॥ रूपातिशयतो लोके प्रथमश्चरमश्च ते । विधत्ते प्रणतं विश्वं विग्रहो विग्रहाद् विना ॥२०५॥ हिरण्यवृष्टिरिष्टाभूद् गर्भस्थेऽपि यतस्त्वयि । हिरण्यगर्भ इत्युच्चैर्गीर्वाणीयसे ततः ॥२०६॥ सह ज्ञानत्रयेणात्र तृतीयमवभाविना । स्वयंभूतो यतोऽतस्त्वं स्वयंभूरिति भाष्यसे ॥२०७॥ व्यवस्थानां विधाता त्वं भविता विविधात्मनाम् । भारते यत्ततोऽन्वर्थं विधातेत्यमिधीयसे ॥२०८॥ अपूर्वः सर्वतो रक्षां कुर्वन् जातः पतिः प्रमो। प्रजानां त्वं यतस्तस्मात् प्रजापतिरितीर्यसे ।।२०९॥ आकन्तीक्षरसं प्रीत्या बाहुल्येन स्वयि प्रभो । प्रजाः प्रभो यतस्तस्मादिक्ष्वाकुरिति कोयंसे ॥२०॥ पूर्वः सर्वपुराणानां त्वं महामहिमा महान् । इह दीव्यसि यत्त न पुरुदेव इतीष्यसे ॥२१॥ भरतासनमध्यास्य त्रैलोक्यैश्चर्यमर्जयत् । युज्यते तत्तवात्यल्पमनन्तैश्वर्ययोगिनः ॥२१२।। त्वं विधाता स्वयंबुद्धस्तपसां दुष्करात्मनाम् । सचेता चेतसामुच्चैर्यशसां वातिशायिनाम् ॥२१३॥ श्रेयसो दानधर्मस्य श्रेयोऽथ प्राणिनां मुनिः । भुवि दर्शयिता वीर: विशुद्ध पात्रता स्वयम् ॥२१४॥ स्वमनभुजङ्गस्य मन्त्रो द्वेषद्विपाङ्कशः । मोहाभ्रपटलभ्रान्तिभ्रंशहेतुः प्रभञ्जनः ॥२१५॥ पौरुषसे वशमें न होनेवाले तीनों जगतको आपने कैसे विधिके समान एक साथ अपने आधीन कर लिया ? भावार्थ-जिस प्रकार विधि-नियति तीनों जगत्को अपने आधीन किये हुए है उसी प्रकार आपने भी तीनों जगत्को अपने आधीन कर लिया है, परन्तु यह कार्य पुरुषार्थ साध्य नहीं है, यह तो केवल आपकी अचिन्त्य आत्मशक्तिका ही प्रभाव है ॥२०२॥ हे नाथ ! कहाँ तो यह सुकुमारता ? और कहाँ ऐसी कठोरता ? हे प्रभो ! विरुद्ध पदार्थोंका सम्भव आपमें ही दीख पड़ता है ।।२०३।। मनुष्य, देव और दानवोंके लिए दुर्लभ तथा एक हजार आठ व्यंजन और लक्षणोंसे युक्त आपका यह रूप अतिशय शोभायमान हो रहा है ।।२०४।। हे भगवान् ! आपका शरीर चरम-पर्याय धारण करनेकी अपेक्षा अन्तिम है तथा रूपके अतिशयसे प्रथम है-सर्वश्रेष्ठ है और युद्धके बिना ही समस्त विश्वको नम्रीभूत कर रहा है ।।२०५।। हे नाथ ! जब आप गर्भमें स्थित थे तभी सबको इष्ट हिरण्य -सुवर्णको वृष्टि हुई थी इसलिए देव आपको हिरण्यगर्भ (हिरण्यं गर्भे यस्य सः ) कहते हैं ॥२०६।। हे प्रभो ! इस भवसे पूर्व तीसरे भवमें जो तीन ज्ञान प्रकट हुए थे उन्हीं के साथ आप यहाँ स्वयं उत्पन्न हुए हैं इसलिए आप स्वयम्भू कहे जाते हैं ।।२०७|| क्योंकि आप भरत क्षेत्रमें नाना प्रकारको व्यवस्थाओंके करने वाले होंगे इसलिए आप विधाता इस सार्थक नामके धारी बहे जाते हैं ।।२०८॥ हे प्रभो ! आप सब ओरसे प्रजाकी रक्षा करते हुए अपूर्व ही प्रभु हुए हैं इसलिए आप प्रजापति कहलाते हैं ॥२०९॥ हे प्रभो! आपके रहते हुए प्रजा बहुत प्रीतिसे इक्षुरसका आस्वादन करेगी इसलिए आप इक्ष्वाकु कहे जाते हैं ॥२१०॥ आप समस्त पुराण पुरुषोंमें प्रथम हैं, महामहिमाके धारक हैं, स्वयं महान हैं और यहां अतिशय देदीप्यमान हैं इसलिए पुरुदेव कहलाते हैं ॥२११॥ हे भगवान् ! आपने भरतक्षेत्रके आसनपर आरूढ़ होकर तीन लोकका ऐश्वर्य उपाजित किया है सो अनन्त ऐश्वर्यको धारण करनेवाले आपके लिए यह अत्यन्त तुच्छ बात हैआश्चर्यकी बात नहीं है ॥२१२॥ हे प्रभो! आप स्वयं बुद्ध होकर अतिशय कठिन तपके करनेवाले हैं तथा उत्तम ज्ञान और बहुत भारी यशके संचेता हैं ।।२१३।। हे विभो ! पृथिवीपर आप धीरवीर मुनि बनकर प्राणियोंके लिए कल्याणकारी दान, धर्मकी श्रेष्ठता तथा स्वयं निर्दोष पात्रताको दिखलावेंगे। भावार्थ - आप मनि बनकर लोगोंमें दान-धर्मकी प्रवत्ति चलावेंगे तथा अपनी प्रवत्तिसे प्रकट करेंगे कि निर्दोष पात्र कैसे होते हैं ? ॥२१४॥ हे भगवान् ! आप कामरूपी भुजंगको नष्ट १. चरमस्य म. । २. शरीरं। ३. युद्धात् । ४. विधिनात्मनाम् म. । ५. आस्वादयन्ति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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