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________________ अष्टमः सर्गः १६१ प्रन्थितेन सुरस्त्रीभिर्माल्यकौशल चुचुमिः । मण्डितो मुण्डमालाग्रमण्डनेनाद्रिमण्डनः ॥१९॥ मद्रशालो जगत्युच्चैर्जगताममिनन्दनः । सोऽमात्सौमनसोऽखण्डयशसा पाण्डुकः स्वयम् ॥१९॥ विशेषको भुवामीशो विशेषकविभूषितः । विशेषतो बनौ देवविशेषकविभूषितः ॥१९३॥ शिशोर्निरञ्जनस्यास्ये स्वअनाञ्जितलोचने । परं जितार्कचन्द्राभिदीप्तिकान्ती बभूवतुः ॥१९॥ श्रीशचीकीर्तिलक्ष्मोमिः स्वहस्तैः कृतमण्डनः । स तथाऽऽखण्डलादीनां देवानामहरन्मनः ॥१९५॥ ततस्तमृषमं नाम्ना प्रधानपुरुषं सुराः । युगाद्यमभिधायत्थं शक्राद्याः स्तोतुमुद्यताः ॥१९६॥ मतिश्रुतावधिश्रष्ठचक्षुषा वृषम ! त्वया । जातेन भारते क्षेत्रे द्योतितं भुवनत्रयम् ॥१९७॥ नृभवाभिमुखेनैव भवताऽद्भुतकर्मणा । आवर्जितं जगद् येन किं जातस्यैतदद्भुतम् ॥१९८॥ पादाधःस्थापितोत्तङ्गमानङ्गमहागुरुः । महागुरुस्त्वमीशानां शैशवेऽप्यशिशुस्थितिः ॥१९॥ अस्पृशन्तो भुवं सा पादाः सुरपर्वताः । पादौ मुकुटकूटोच्चैःशिरोमिस्ते वहन्त्यमी ॥२०॥ मन्त्रशक्तिरियं किंतु प्रभुशक्तिस्तथाऽथवा । प्रोत्साहशक्तिराहोस्वित् किमप्यन्यन्महाद्भुतम् ॥२०॥ पौरुषाधिकमानीतं त्वया नाथ जगत्त्रयम् । कथमेकपदे विश्वं विधिनेव विधीयताम् ॥२०२॥ अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ।।१८९-१९१॥ वे भगवान् भद्रशाल, नन्दन, सौमनस और पाण्डुक इन चारों वन-स्वरूप सुशोभित थे । भद्रशाल इसलिए थे कि उनकी शाला अर्थात् प्रासाद भद्र अर्थात् उत्तम था। नन्दन इसलिए थे कि जगत्के सब जीवोंको अत्यधिक आनन्दित करनेवाले थे, सौमनस इसलिए थे कि उत्तम हृदयको धारण करनेवाले थे और पाण्डुक इसलिए थे कि वे स्वयं यशसे पाण्डुक-सफेद हो रहे थे ॥१९२।। जो तीनों लोकोंमें विशेषक अर्थात् तिलकके समान श्रेष्ठ थे, जो विशेषकों अर्थात् तिलकोंके द्वारा सुशोभित थे और जो देव-विशेषक अर्थात् विशिष्ट देवोंके द्वारा विभूषित किये गये थे ऐसे भगवान् उस समय विशेष रूपसे शोभायमान हो रहे थे ।।१९३॥ यद्यपि जिन-बालक स्वयं निरंजन-कज्जल ( पक्षमें पाप) से रहित थे तो भी उनके मुखपर जो नेत्र थे वे उत्तम अंजन-कज्जलसे अलंकृत थे और सूर्य तथा चन्द्रमाकी दीप्ति एवं कान्तिको जीतनेवाले थे ॥१९४॥ श्री, शची, कीर्ति तथा लक्ष्मी नामक देवियोंने अपने हाथोंसे उन्हें उस तरह अलंकृत किया था कि जिससे वे इन्द्रादिक देवोंका मन हरण करने लगे थे ॥१९५।। तदनन्तर युगके आदिमें हुए उन प्रधान पुरुषका ऋषभ नाम रखकर इन्द्र आदि देव उनको इस प्रकार स्तुति करनेके लिए तत्पर हुए ॥१९६|| . हे ऋषभदेव ! मति, श्रति और अवधिज्ञानरूपी श्रेष्ठ नेत्रोंको धारण करनेवाले आप यद्यपि भरतक्षेत्रमें उत्पन्न हुए हैं फिर भी आपने तीनों लोकोंको प्रकाशमान कर दिया है ।।१९७।। हे भगवान् ! जब आप मनुष्य-भवमें आने के लिए सम्मुख ही थे तभी रत्नवृष्टि आदि अद्भुत कार्य दिखाकर आपने जगत्को आधीन कर लिया था फिर अब तो आप मनुष्य-भवमें स्वयं उत्पन्न हुए, अब आश्चर्यकी बात ही क्या है ? ॥१९८॥ हे नाथ ! बहुत बड़े शिखर ( पक्षमें मानरूपी शिखर ) से युक्त सुमेरु पर्वतको भी आपने अपने पैरके नीचे दबा दिया इसलिए आप समस्त स्वामियों में महागुरु-अत्यन्त श्रेष्ठ हैं। और बालक अवस्थामें भी बालकों-जैसी आपकी चेष्टा नहीं है ।।१९९।। जो देवरूपी पर्वत अपने चरणोंके अग्रभागसे कभी समस्त पृथिवीका स्पर्श भी नहीं करते वे ही देवरूपी पर्वत अपने मुकुटरूपी ऊँचे शिखरोंसे आपके दोनों चरणोंको धारण कर रहे हैं। सो यह क्या आपकी मन्त्र शक्ति है ? या प्रभु शक्ति है ? या उत्साह शक्ति है ? अथवा कोई दूसरा ही महान् आश्चर्य है ? भावार्थ-जो देव, देवत्वके अभिमानमें चूर होकर पृथिवीको तुच्छ समझते हैं वे ही आपको अपने शिरपर धारण कर रहे हैं, इससे आपका सर्वोपरि प्रभाव सिद्ध है।।२००-२०१|| हे नाथ! १. 'तेन वित्तश्चुचुपचणपौ' इति चुचुप्प्रत्ययः । २१ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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