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________________ अष्टमः सर्गः १५९ क्षीरापूर्णाः सुरैः क्षिप्ता राजताः करतः करम् । सौवर्णाश्च बभुः कुम्माश्चन्द्रार्का इव मेरुगाः ॥१६॥ कुम्भनिरन्तरारावैबहुदेवसहस्रकैः । क्षीराम्मोभिजिनेन्द्रस्य चक्रे जन्माभिषेचनम् ॥१६५।। ऐन्द्राः कुम्ममहाम्भोदा दुग्धाम्मोऽन्तरवर्षिणः । शिशोजिनगिरेरासन्न तदाऽऽयासहेतवः ।।१६६।। जिनोच्छ्वासमुहुः क्षिप्तक्षीरवारिप्लवेरिताः । प्लवन्ते स्म क्षणं देवाः क्षीरौधे मक्षिकौघवत् ॥१६॥ दृष्टः सुरगणेयः प्राग मन्दरो रत्नपिञ्जरः । स एव क्षीरपूरौधैर्धवलीकृतविग्रहः ॥१६॥ तदाऽत्यस्तपरोक्षोऽपि प्रत्यक्षः क्षीरवारिधिः । कृतः खेचरसंघातैजिनजन्माभिषेवने ॥१६९।। स्नानासनमभूम्मेरुः स्नानवारिपयोम्बुधेः । स्नानसंपादका देवाः स्नानमीदग जिनस्य तत् ।।१७०॥ इन्द्रसामानिकानेकलोकपालादयोऽमराः । क्रमेण चक्रुरम्मोमिरभिषेकं पयोम्बुधेः ।।१७१।। अस्यन्तसुकुमारस्य जिनस्य सुरयोषितः । शच्याद्याः पल्लवस्पर्शसुकुमारकरास्ततः ॥१७२। दिव्यामोदसमाकृष्टषट्पदौघानुलेपनैः । उद्वर्तयन्त्यस्ताः प्रापुः शिशुस्पर्शसुखं नवम् ॥१७३॥ ततो गन्धोदकैः कुम्मेरभ्यषिञ्चन् जगत्प्रभुम् । पयोधरमरानम्रास्ता वर्षा इव भूभृतम् ॥१४॥ समं च चतुरस्रं च संस्थानं दधतः परम् । सुवज्रषमनाराचसंघातसुधनात्मनः ॥१७५॥ कर्णावक्षतकायस्य कथंचिद् वज्रपाणिना। विद्धौ वज्रघनौ तस्य वज्रसूचीमुखेन तौ ।।१७६॥ कृताभ्यो कर्णयोरोशः कुण्डलाभ्यामभात्ततः। जम्बूद्वीपः सुभानुभ्यां सेवकाभ्यामिवान्वितः ॥१७७॥ हाथोंमें अष्ट मंगल द्रव्य धारण कर रही थी, तब महावेगशाली देवोंके समूह घट लेकर विशाल मेघोंके समान समस्त दिशाओंमें फैल गये और उन्होंने क्षीरसागरको क्षोभित कर दिया ॥१६१-१६३॥ क्षीरसे भरे चांदी और सोनेके कलश देवों द्वारा एक हाथसे दूसरे हाथमें दिये जाकर सुमेरु पर्वतपर पहुंच रहे थे और वे चन्द्र तथा सूर्यके समान सुशोभित हो रहे थे ॥१६४॥ निरन्तर शब्द करनेवाले सागरके जलसे भरे हए कलशोंके द्वारा हजारों देवोंने जिनेन्द्र भगवानका अभिषेक किया ॥१६५।। उस समय इन्द्रोंके कलशरूपी महामेघ जिनबालकरूपी पर्वतके ऊपर क्षीरोदककी वर्षा कर रहे थे परन्तु वे उन्हें रंचमात्र भी खेदके कारण नहीं हुए थे ।।१६६।। भगवान्के श्वासोच्छ्वाससे बार-बार उछाले हुए क्षीरोदकके प्रवाहसे प्रेरित देव, उस क्षीरोदकके समूहमें क्षण-भरके लिए मक्खियोंके समूहके समान तैरने लगते थे ॥१६७॥ देवोंके समूहने पहले जिस मेरुको रत्नोंसे पीला देखा वही उस समय क्षीरोदकके पूरसे सफेद दिखने लगा था ॥१६८॥ यद्यपि क्षीरसागर अत्यन्त परोक्ष है तथापि जिनेन्द्र के जन्माभिषेकके समय देवोंके समूहने उसे प्रत्यक्ष कर दिखाया था ॥१६९।। जिसमें मेरु पर्वत स्नानका आसन था, क्षीर समद्रका क्षीर स्नान जल था, और देव स्नान करानेवाले थे ऐसा वह भगवान्का स्नान था ॥१७०।। इन्द्र सामानिक तथा लोकपाल आदि अनेक देवोंने क्षीरसागरके जलसे भगवानका क्रमपूर्वक अभिषेक किया था ॥१७१।। तदनन्तर जिनके हाथ पल्लवोंके समान अत्यन्त सुकुमार थे, ऐसी इन्द्राणी आदि देवियोंने अतिशय सुकुमार जिन-बालकको अपनी दिव्य सुगन्धिसे भ्रमर-समूहको आकृष्ट करनेवाले अनुलेपनसे उबटन किया और इस तरह उन्होंने जिन-बालकके स्पर्शसे समुत्पन्न नूतन सुख प्राप्त किया ॥१७२-१७३॥ तदनन्तर पयोधरभार-मेघोंके भारसे नम्रीभूत वर्षा ऋतु जिस प्रकार पर्वतका अभिषेक करती है उसी प्रकार पयोधरभार-स्तनोंके भारसे नम्रीभूत देवियोंने सुगन्धित जलसे भरे कलशों द्वारा भगवान्का अभिषेक किया ॥१७४|| जो परम सुन्दर समचतुरस्र संस्थानको धारण कर रहे थे तथा वज्रर्षभ नाराच संहननसे जिनका शरीर अत्यन्त सुदढ था, ऐसे अक्षतकाय जिन-बालकके वज्रके समान मजबूत कानोंको इन्द्र वज्रमयी सूचीकी नोंकसे किसी तरह वेध सका था ॥१७५-१७६।। तदनन्तर कानोंमें पहनाये हुए दो कुण्डलोंसे भगवान् उस तरह सुशोभित हो रहे थे जिस तरह कि सदा सेवा करनेवाले दो सूर्योसे जम्बूद्वीप सुशोभित होता है ॥१७७॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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