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________________ अष्टमः सर्गः १५७ शुकान् परभृतान् क्रौञ्चान् कुररान् शिखिकुक्कुटान् । परे पारावतान् हंसान् सकारण्डवसारसान् ॥१३८॥ चक्रवाकबलाकौघान् बकादीन समधिष्ठिताः । चतुर्देवनिकायास्ते सह जग्मुरितस्ततः ॥१३९।। श्वेतच्छत्रैर्वजश्चित्रेश्चामरैः फेनपाण्डुरैः । कुर्वाणाः सर्वमाकाशं समाकीण निरन्तरम् ॥१४॥ भेरीदुन्दुभिशङ्खादिरवापूरितविष्टपम् । नृत्यगीतैर्युतं रेजे देवागमनमद्भुतम् ॥१४१॥ सौधर्मेन्द्रस्तदारूढो गजानीकाधिपं गजम् । ऐरावतं विकुर्वाणमाकाशाकारवद्वपुः ।।१४२।। प्रोइंष्ट्रान्तरविस्फारिकरास्फारितपुष्करम् । प्रोद्वंशाङ्करमध्योद्यद्मोगीन्द्रमिव भूधरम् ॥१४३॥ कर्णचामरशङ्खाई कक्षानक्षत्रमालिनम् । बलाकाहंसविद्युद्भिरिव भ्रान्तं मरुत्पथम् ॥१४४।। आरूढवारणेन्द्राणामिन्द्रागां निवहैर्युतः । जन्मक्षेत्रं जिनस्यासौ पवित्रं प्राप्तवान् सुरैः ॥१४५॥ नमसोऽवतरन्ती वैसा सुरासुरसंततिः । कुबेरकृतमद्वाक्षीत् पुरं स्वर्गमिव क्षिती ॥१४६॥ वप्रप्राकारपरिखापरिवेषमनोहरम् । सोद्यानकाननारामसरोवापीविराजितम् ॥१४७॥ इन्द्रनीलमहानीलवज्रवैडूर्यभित्तयः । प्रासादाः पद्मरागादिप्रभाझ्या यत्र रेजिरे ॥१४८॥ सुराणामसुराणां च तत्पुरश्रीविलोकिनाम् । मनोऽभू दरितोत्कण्ठं स्वर्गपातालजश्रियः ॥१४९॥ यतः साकमितं यत्प्राक सुरासुरजगत्त्रयम् । पुरं तत्कीर्तिमत्तस्मात्साकेतमिति कीर्तितम् ॥१५॥ कितने ही सामान्य हरिणोंपर, कितने ही श्याम हरिणोंपर, कितने ही गरुड़ोंपर, कितने ही तोताओंपर, कितने ही कोकिलाओंपर, कितने ही क्रौंच पक्षियोंपर, कितने ही कूररोपर, कितने ही मयूरों और मुर्गोपर, कितने ही कबूतरों, हंसों, कारण्डव और सारसोंपर, कितने ही चकवा और बलाकाओंके समूहपर और कितने ही बगुला आदि जीवोंपर बैठे थे। इस प्रकार उस समय चारों निकायके देव इधर-उधर जा रहे थे ।।१३६-१३९।। सफेद छत्रों, नाना प्रकारकी ध्वजाओं, और फेनके समान सफेद चमरोंसे समस्त आकाशको व्याप्त करते हुए वे चारों निकायके देव जहाँ-तहाँ चल रहे थे ।।१४०।। भेरी, दुन्दुभि तथा शंख आदिके शब्दोंसे जिसने समस्त लोकको भर दिया था तथा जो नृत्य और गीतसे युक्त था, ऐसा वह देवोंका आश्चर्यकारी आगमन अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ।।१४१।। उस समय सौधर्मेन्द्र, हाथियोंको सेनाके अधिपति तथा आकाशके समान अपने शरीरको विक्रिया करनेवाले ऐरावत हाथीपर आरूढ़ था ।।१४२।। वह ऐरावत, दोनों खीसोंके बीच उठी हुई सूड़के अग्रभाग फैलाये हुए था, अतएव जिसके बाँसोंके अंकुशोंके बीच सर्पराज ऊपरकी ओर उठ रहा था, ऐसे पर्वतके समान जान पड़ता था ॥१४३॥ वह ऐरावत ठीक आकाशके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार आकाश, बलाका, हंस और बिजलियोंसे युक्त होता है, उसी प्रकार वह हाथी भी कर्ण, चामर, शंख तथा कक्षामें लटकती हुई नक्षत्रमालासे युक्त था ।।१४४।। अन्य-दूसरे गजराजोंपर बैठे हुए इन्द्रोंके समूहसे युक्त सौधर्मेन्द्र, समस्त देवोंके साथ-साथ जिनेन्द्र भगवान्के पवित्र जन्मक्षेत्रको प्राप्त हुआ ।।१४५।। आकाशसे उतरती हुई उस सुर और असुरोंकी पंक्तिने पृथिवीपर कुवेरके द्वारा निर्मित नगरको ऐसा देखा मानो स्वर्ग ही हो ॥१४६।। वह नगर धलिके बन्धान, कोट और परिखाके चक्रसे मनोहर था तथा उद्यान, वन, आराम, सरोवर और वापिकाओंसे अलंकृत था ।।१४७॥ इन्द्रनील, महानील, हीरा और वैडूर्यमणिको दीवालोंसे युवत तथा पद्मराग आदि मणियोंको प्रभासे परिपूर्ण वहाँके भवन अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥१४८।। उस नगरकी शोभा देखनेवाले सुर और असुरोंका मन स्वर्ग तथा पाताल सम्बन्धी शोभाके देखनेकी उत्कण्ठा दूर कर चुका था ।।१४९।। क्योंकि सुर, असुर आदि तीनों जगत्के जीव वहाँ पहले एक साथ पहुंचे थे इसलिए वह कीर्तिशाली नगर उस समयसे 'साकेत' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ था ।।१५०॥ १. तान्तं म. । २. महत्पथम् म. । ३. दुरितोत्कण्ठ- म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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