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________________ १५६ हरिवंशपुराणे देवदानवचक्रस्य स्वपराक्रमशालिनः । कथंचित्प्रतिकूलस्य यः समर्थः कदर्थने ॥१२॥ इन्द्रः पुरंदरः शक्रः कथं न गणितोऽधुना । सोऽहं कम्पयताऽनेन सिंहासनमकम्पनम् ॥१२५॥ संभावयामि नेदृक्षप्रभावं भुवनत्रये । प्रमं तीर्थंकरादन्यमिति मत्वा सृतोऽवधिम् ॥१२६।। अतो विस्फुरितेनायमवधिज्ञानचक्षुषा । तं तीर्थकरमुत्पन्नमाद्यमैक्षिष्ट भारते ॥१२७॥ आसनादवतीर्याशु क्रान्त्वा सप्तपदानि सः । जयतां जिन इत्युक्त्वा प्रणनाम कृताञ्जलि: ॥१२८॥ पुनश्वासनमारुह्य समाज्ञापयति स्म सः । ध्यानानन्तरमानम्य स्थितं सेनापतिं पुरः॥१२९।। अस्यामाद्योऽवसर्पिण्यां जातस्तीर्थकरोऽधुना । गन्तव्यं भारतं देवैर्बोध्यन्तां ते त्वया न्विति ॥१३०॥ स्वाम्यादेशे कृते तेन चेलुः सौधर्मवासिनः । देवैश्चाच्युतपर्यन्ताः स्वयंबुद्धाः सुरेश्वराः ।।१३१॥ यथास्वस्वं निमित्तेभ्यः प्रतिबुद्धाः प्रहर्षिणः । निश्चेलुर्निजलोकेभ्यो ज्योतिय॑न्तरभावनाः ॥१३२॥ गजाश्वरथसंघट्टपदातिवृषभैस्तदा । गन्धर्वनर्तकीमित्रैः सप्तानीकैश्वितं नमः ॥१३३।। महिषाद्यैश्च नावाद्यैः खड्गाद्यैर्गरुडादिमिः । शिविकाश्वोष्ट्रमकरद्विपहंसादिभिस्तथा ॥१३४।। दशानामसुरादीनां कुमाराणां यथाक्रमम् । सप्तानीकैन भी व्याप्तं बमासे नितरां तदा ॥१३५।। विमानानि समारूढा गोवृषान् गवयान् रथान् । अश्वान् शरमशालान् मकरान करभान सुराः॥१३६।। वराहमहिषान् सिंहान् पृषतान् द्वीपिनो द्विपान् । चमरान् हरिणांश्चारुरुरून् केचिद् गरुत्मतः ॥१३॥ व्यक्तिने यह कार्य किया है ? ॥१२२-१२३।। अपने पराक्रमसे सुशोभित देव-दानवोंका समूह भी यदि कदाचित् प्रतिकूल हो जावे तो उसे भी जो नष्ट करने में समर्थ है ऐसा मैं इन्द्र, शक्र या पुरन्दर हूँ फिर मेरे अकम्पित आसनको कम्पित करनेवाले इस मूर्खने इस समय मुझे कुछ क्यों नहीं समझा ? ॥१२४-१२५।। मैं तीनों लोकोंमें तीर्थंकरके सिवाय किसी दूसरे प्रभुको ऐसे प्रभावसे युक्त नहीं समझता हूँ, ऐसा विचारकर उसने अवधिज्ञानका आश्रय लिया ॥१२६।।। तदनन्तर सौधर्मेन्द्रने प्रकट हुए अवधिज्ञानरूपी नेत्रके द्वारा भरत क्षेत्रमें उत्पन्न हुए प्रथम तीर्थंकरको देख लिया ॥१२७।। उसने शीघ्र ही आसनसे उतरकर तथा सात डग आगे जाकर 'जिनेन्द्र भगवान्की जय हो' यह कहते हुए हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया ।।१२८॥ तदनन्तर सिंहासनपर आरूढ़ हो सौधर्मेन्द्रने विचार करते ही नमस्कार कर सामने खड़े हुए सेनापतिको आदेश दिया कि 'इस समय इस अवसर्पिणीके प्रथम तीर्थंकर उत्पन्न हो चुके हैं अतः समस्त देवोंको भरतक्षेत्र चलना है।' तुम यह सूचना सबके लिए देओ ॥१२९-१३०।। सेनापतिके द्वारा स्वामीका आदेश सुनाये जाते ही सौधर्म स्वर्ग में रहनेवाले समस्त देव चल पड़े। तथा अच्युत स्वर्ग तकके समस्त इन्द्र स्वयं ही इस समाचारको जान देवोंके साथ बाहर निकले ॥१३१।। अपनेअपने स्थानोंमें होनेवाले निमित्तोंसे जिन्हें जिनेन्द्रजन्मका समाचार ज्ञात हुआ था, ऐसे हर्षसे भरे हुए ज्योतिषी, व्यन्तर और भवनवासी देव अपने-अपने स्थानोंसे बाहर निकले ।।१३२।। उस समय १ हाथी, २ घोड़ा, ३ रथ, ४ पैदल सैनिक, ५ बैल, ६ गन्धर्व और ७ नतंकी इन सात प्रकारकी सेनाओंसे आकाश व्याप्त हो गया था ।।१३३|| असुर कुमार आदि दश प्रकारके भवनवासी देवोंकी भैंसा, नौका, गेंडा, हाथी, गरुड़, पालकी, घोड़ा, ऊँट, मगर, हाथी और हंसको आदि लेकर क्रमसे जो सात प्रकारकी सेनाएं थीं उन सबसे व्याप्त हुआ आकाश उस समय अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥१३४-१३५।। उन देवों में कितने ही देव विमानोंमें बैठे थे, कितने ही बैलोंपर, कितने ही रोझोंपर, कितने ही रथोंपर, कितने ही घोड़ोंपर, कितने ही अष्टापद और शार्दूलोंपर, कितने ही मगरोंपर, कितने ही ऊंटोंपर, कितने ही वराह और भैंसोंपर, कितने ही सिंहोंपर, कितने ही हरिणोंपर, कितने ही चीतोंपर, कितने ही हाथियोंपर, कितने ही सुरागायोंपर, १. बोध्यतामिति म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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