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________________ अष्टमः सर्गः वसुंधरा तथा चित्रा चित्रामरणभास्वराः । दिक्कुमार्य इमाश्चाष्टौ तस्थुर्दर्पणपाणयः ।।१०९॥ इला सुरा पृथिव्याख्या पद्मावत्यपि काञ्चना । सीता नवमिकाऽन्या च दिक्कन्या भद्रकामिधा ॥११॥ अष्टौ तुष्टाः प्रकृष्टाङ्गप्रभामासितदिङमुखाः । धवलान्यातपत्राणि धारयन्ति स्म विस्मिताः ॥११॥ हीः श्रीः धृतिः परा सा च वारुणी पुण्डरीकिणी । अलम्बुसाम्बुजास्यश्रीर्मिश्रकेशीति विश्रुताः ॥११२।। 'कनस्कनकदण्डानि कनकनककुण्डलाः । चामराणि गृहीत्वाष्टौ दिक्कुमार्यः स्थिता इमाः ॥११३।। चित्रा कनकचित्रा च सूत्रामणिरिमा बभुः । त्रिशिराश्च कृतोद्योता विद्युत्कन्यास्तडित्प्रभा ॥११४॥ विजया वैजयन्ती च जयन्ती चापराजिता । इमा विद्युत्कुमारीणां चतस्रः प्रमुखाः स्थिताः ॥११५।। रुचका दिक्कुमारीणां प्रधाना रुचकोज्ज्वला । रुचकामाश्चतस्रस्ता रुचकप्रभया सह ।।११६॥ जातकर्म जिनस्यैताश्चक्ररष्टौ यथाविधि । जातकर्मणि निष्णाताः सर्वत्र जिनजन्मनि ॥११७॥ आचेलुश्चलमौलीनां काले तस्मिन् सुरेशिनाम् । त्रैलोक्येऽप्यासनान्याश जिनोभूतिप्रमावतः ॥११८॥ प्रणेमुरहमिन्द्रास्तं प्रयुक्तावधयो जिनम् । तत्रस्थाः सिंहपीठेभ्यो गत्वा सप्तपदान्यरम् ॥११९।। लोके भावनदेवानां शङ्खध्वनिरभूत्स्वयम् । व्यन्तराणां रवो भेर्या ज्योतिषां सिंहनिस्वनः ॥१२०॥ घण्टारत्नमहाघोषः कल्पलोकमतीतनत् । किंकर्तव्यत्वसंमुख्यं त्रैलोक्यममवरक्षणम् ॥१२१॥ आसनस्य प्रकम्पेन दध्यो विस्मितधोस्तदा । सौधर्मेन्द्रश्चलन्मौलिधूत्वा मूर्धानमुन्नतम् ॥ १२२॥ अतिबालेन मुग्धेन स्वतन्त्रेणाशुकारिणा । निर्भयेन विशङ्केन केनेदमप्यनुष्ठितम् ।।१२३।। और ८ चित्रा ये आठ दिक्कुमारी देवियाँ हाथों में दर्पण लिये हुए खड़ी थीं ॥१०८-१०९॥ अपने शरीरकी श्रेष्ठ प्रभासे दिशाओंको सुशोभित करनेवाली १ इला, २ सुरा, ३ पृथिवी, ४ पद्मावती, ५ कांचना, ६ सीता, ७ नवमिका और ८ भद्रका ये आठ दिक्कुमारी देवियाँ आश्चर्यचकित हो सफेद छत्र धारण कर रही थीं ॥११०-१११॥ देदीप्यमान स्वर्णके कुण्डलोंको धारण करनेवाली १ ह्री, २ श्री, ३ धृति, ४ वारुणी, ५ पुण्डरीकिणी, ६ अलम्बुसा, ७ अम्बुजास्यश्री और ८ मिश्रकेशी ये आठ दिक्कुमारी देवियाँ देदीप्यमान सुवर्णमय दण्डोंसे युक्त चामर लेकर खड़ी थीं ॥११२-११३।। बिजलीके समान प्रभावशाली १ चित्रा, २ कनकचित्रा, ३ सूत्रामणि और ४ त्रिशिरा इन चार विद्यत्कुमारी देवियोंने सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश कर दिया था ॥११४॥ १ विजया, २ वैजयन्ती, ३ जयन्ती और ४ अपराजिता ये चार देवियाँ विद्युत्कुमारियों में प्रमुख थीं ॥११५॥ १ रुचका, २ रुचकोज्ज्वला, ३ रुचकाभा और ४ रुचकप्रभा ये चार देवियाँ दिक्कुमारियोंमें प्रधान थीं ॥११६।। इन आठ देवियोंने विधिपूर्वक जिनेन्द्रदेवका जातकर्म किया था। ये देवियाँ जातकर्ममें अत्यन्त निपुण हैं और सब जगह जिनेन्द्र देवका जातकर्म ये ही देवियां करती हैं ।।११७।। उस समय तीनों लोकोंमें जो इन्द्र थे, जिनेन्द्रजन्मके प्रभावसे उन सबके मुकुट चंचल हो गये और सबके आसन कम्पायमान हो उठे ॥११८॥ अवधिज्ञानका प्रयोग करनेवाले अहमिन्द्र अपने-अपने निवासस्थानोंमें ही स्थिर रहे, मात्र उन्होंने सिंहासनोंसे सात डग चलकर जिनेन्द्र भगवान्को शीघ्र ही परोक्ष नमस्कार किया ॥११९।। भवनवासी देवोंके लोकमें अपने-आप शंखोंका शब्द, व्यन्तरोंके लोकमें भेरीका शब्द और ज्योतिषी देवोंके लोकमें सिंहोंके शब्द होने लगे ॥१२०।। श्रेष्ठ घण्टाओंके जोरदार शब्दने कल्पवासी देवोंके लोकको व्याप्त कर लिया। उस समय तीनों लोक 'क्या करना चाहिए' यह विचार करने में तत्पर हो गये ॥१२१।। उस समय आसनके कम्पायमान होनेसे जिसकी बुद्धि चकित हो गयी थी ऐसा सौधर्मेन्द्र मुकुट हिलाकर तथा ऊँचे मस्तकको कपाकर विचार करने लगा कि उत्पन्न बालक, मूर्ख, स्वच्छन्द, सहसा कार्य करनेवाले निर्भय एवं शंकारहित किस , १. क्वणत म. । २ क्वणत म. । ३. अरं शीघ्र सप्तपदानि गत्वा । सप्तपदान्परम म.। ४. निस्वनाः म.। . Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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