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________________ हरिवंशपुराणे सर्वथा सर्वकल्याणभाजनात्मजजन्मना । प्रिये ! स्वमचिरेणैव जगदानन्दयिष्यसि ॥ ९५ ॥ इति सुस्वप्नफलं श्रुत्वा सद्यः संभूतमात्मनि । मुमुदेऽतितरां देवी दीसिं कान्ति च बिभ्रती ॥९६॥ तृतीयकालशेषेऽसावशीतिश्वतुरुत्तरा । पूर्वलक्षास्त्रिवर्षाष्टमा सपक्षयुतास्तदा ॥ ९७ ॥ स्वर्गावतरणं जैनमाषाढबहुलस्य तु । द्वितीयामुत्तराषाढनक्षत्रेऽत्र जगन्नतम् ॥ ९८ ॥ वर्धमाने क्रमाद् गर्मे वर्धते वपुषो वपुः । तस्यास्त्रिवलिशोभाया भङ्गभीत्येव नोदरम् ॥९९॥ गौरवातिशयाधानी दधाना त्रिजगद्गुरुम् । लाघवातिशयं देहे दधे चित्रमिदं परम् ॥१००॥ संतापहेतुरन्तःस्थो मातुर्माभूत् सुनिश्चलः । ज्ञानवान् स जिनो मानुर्यथाऽप्सु प्रतिबिम्बितः ॥ १०१ ॥ ज्ञाननेत्रैस्त्रिभिः पश्यन् विश्वं मासानसौ सुखम् | नव गर्भगृहेऽतिष्ठदिक् कुमारीविशोधिते ॥१०२॥ पूर्णेषु तेषु मासेषु निपतद्वसुवृष्टिषु । जिनं सा सुपुवे देवी सोत्तराषाढसंनिधौ ॥ १०३ ॥ प्राच्या इव विशुद्धाया विशुद्ध स्फटिकोपमात् । घनोदराद्विनिःक्रान्तो जिनः सूर्य इवाबभौ ॥ १०४॥ जातकर्मणि कर्त्तव्ये व्यापृता लघु देवताः । अन्तरङ्गा हि कर्त्तव्ये व्याप्रियन्ते जगत्यरम् ॥१०५॥ विजया बैजयन्ती च जयन्ती चापराजिता । नन्दा नन्दोत्तरा नन्दी नन्दीवर्द्धनया सह ॥१०६ ॥ आलोलकुण्डलालोकविलसद्गण्डमण्डलाः । एतास्ता दिक्कुमार्योऽष्टौ तस्थुर्भुङ्गरपाणयः ॥१०७॥ सुस्थिता प्रणिधान्या सुप्रबुद्धा च यशोधरा । लक्ष्मीमती तथैवान्या कीर्तिमत्युपवर्णिता ॥ १०८ ॥ १५४ हम दोनों को जिनेन्द्रदेव के जिस जन्मको सूचना मिली थी वह आज सफल हुई || ९४ || हे प्रिये ! निश्चय ही समस्त कल्याणोंके पात्ररूप पुत्रको उत्पन्न कर तुम शीघ्र ही संसारको आनन्दित करोगी || ९५|| इन उत्तम स्वप्नोंका फल अपने-आपमें शीघ्र हो संघटित हो चुका है, यह सुन दीप्ति और कान्तिको धारण करती हुई मरुदेवी बहुत ही प्रसन्न हुई ||१६|| तीसरे कालमें जब चौरासी लाख पूर्वं तीन वर्षं साढ़े आठ माह बाकी रहे थे तब आषाढ़ कृष्ण द्वितीयाके दिन उत्तराषाढ़ा नक्षत्रमें समस्त जगत् के द्वारा नमस्कृत श्री जिनेन्द्रदेवका स्वर्गावतरण हुआ था ॥ २७-२८।। क्रम-क्रम से गर्भंमें वृद्धि होनेपर माताका शरीर भी बढ़ गया परन्तु त्रिवलिकी शोभा कहीं नष्ट न हो जाये इस भयसे मानो उसके उदरमें वृद्धि नहीं हुई ||१९|| माता मरुदेवी स्वयं अत्यधिक गौरवसे सुशोभित थी और उसपर तीनों जगत् के गुरु - भारी ( पक्षमें श्रेष्ठ ) जिनेन्द्र देवको धारण कर रही थी, फिर भी वह शरीर में अत्यधिक लघुताका अनुभव करती थी यह बड़े आश्चर्यकी बात थी ||१०० || मैं गर्भ में स्थिर रहकर माताके सन्तापका कारण न बनूँ यह जानकर ही मानो जिन बालक गर्भ में अत्यन्त निश्चल रहते थे । माता के गर्भ में उनका निवास वैसा ही था जैसा कि जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य का होता है ॥ १०१ ॥ मति, श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञानरूपी नेत्रोंके द्वारा जगत्को देखते हुए जिन बालक, दिक्कुमारियोंके द्वारा शुद्ध किये हुए गर्भमें नौ माह तक सुखसे स्थित रहे ||१०२ || तदनन्तर नौ माह पूर्ण होनेपर जब लगातार रत्नोंकी वर्षा हो रही थी तब उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के समय माताने जिन बालकको उत्पन्न किया || १०३ || जिस प्रकार निर्मल पूर्व दिशा में विशुद्ध स्फटिकके तुल्य मेघमण्डलके मध्यसे निकला हुआ सूर्यं सुशोभित होता है उसी प्रकार माता मरुदेवीके स्फटिकके समान स्वच्छ गर्भसे निकले हुए जिन बालक सुशोभित हो रहे थे || १०४ ॥ उस समय वहाँ जो देवियाँ थीं वे शीघ्र ही करने योग्य जातकर्म में लग गयीं सो ठीक ही है क्योंकि जो अन्तरंग व्यक्ति होते हैं वे संसार में शीघ्र ही अपने करने योग्य काममें लग जाते हैं || १०५ ॥ चंचल कुण्डलोंके प्रकाशसे जिनके कपोल सुशोभित हो रहे थे ऐसी १ विजया, २ वैजयन्ती, ३ जयन्ती, ४ अपराजिता, ५ नन्दा, ६ नन्दोत्तरा, ७ नन्दी और ८ नन्दीवर्धना ये आठ दिक्कुमारी देवियाँ हाथों में झारियाँ लिये हुए खड़ी थीं ॥ १०६ - १०७ ॥ नाना प्रकारके आभरणोंसे सुशोभित १ सुस्थिता, २ प्रणिधान्या, ३ सुप्रबुद्धा, ४ यशोधरा, ५ लक्ष्मीमती, ६ कीर्तिमती, ७ वसुन्धेरा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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