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________________ षष्ठः सर्गः १२७ सर्वश्रेणीविमानानामर्द्धमूर्ध्वमितोऽपरम् । अन्येषां स्वविमानाधं स्वयंभूरमणोदधेः ॥११॥ वेश्ममूल शिलापीठबाहुल्यं पूर्वकल्पयोः । योजनान्येकविंशत्या त्वेकादश शतानि च ॥१२॥ ऊर्ध्वं नवनवत्यास्तु युग्मे युग्मे' परिक्षयः । एकैकत्र त्रिके तुल्यश्चतर्दशसु चोपरि ॥१३॥ आये विंशं शतं व्यासः कल्पयुग्मे तु वेश्मनाम् । परे शतं दशोनोऽतश्चतुर्दशसु पर्थ्य तु ॥९॥ उच्छ्रायः पट् शतान्याये पञ्च कल्पयुगे परे । शतानोनमूनोऽस्मात्पञ्चविंशतिमात्रकाः ॥१५॥ पष्टिराग्रेऽवगाहोऽपि पञ्चाशयुगले परे । पञ्चोनोऽस्मात्परेपु द्वे चतुर्दशसु सार्धके ॥१६॥ कृष्णा नीलाश्च रकाश्च पीताः श्वेताश्च वर्णिताः । प्रासादाः पञ्चवर्णास्ते सौधर्मेशानकल्पयोः ॥९७॥ नीलाद्याः परयोश्चोवं रकाद्यास्तु चतुर्वपि । सहस्रारावसानेषु पीताः श्वेताश्च नेतरे ॥१८॥ आनतप्राणतादी च श्वेतवर्णाः प्रवर्णिताः । वैमानिकविमानेषु प्रासादाः प्रस्फुरत्प्रमाः ॥९९॥ द्वयोयोर्विमानानि कल्पाटकपरेषु च । जले वाते द्वयोयोम्नि संस्थितादि यथाक्रमम् ॥१०॥ षड़यालेषु शेषेसु कल्पेषु चरमेन्द्र कात् । श्रेणीबद्धे निजावासे वसन्त्यष्टादशे तथा ॥१०॥ लाल योजन विस्तार है ।।२०।। समस्त श्रेणी-बद्ध विमानोंकी जो संख्या है उसका आधा भाग तो भू-रमण समुद्र के ऊपर है और आधा अन्य समस्त द्वीप समुद्रोंके ऊपर फैला हुआ है ॥११॥ सौधर्म और ऐशान स्वर्गमें भवनोंके मूल शिलापीठकी मोटाई ग्यारह सौ इक्कीस योजन है ।।९२॥ ऊपर प्रत्येक कल्प युगलमें निन्यानबे-निन्यानबे यो जन मोटाई कम होती है। अवेयकोंके तीनों त्रिक तथा अनुदिश और अनुत्तर विमानोंके चौदह विमानोंमें समान मोटाई होती है ॥९३।। प्रथम कल्प युगल-सौधर्म, ऐशान स्वर्ग में भवनोंकी चौड़ाई एक सौ बीस योजन, दूसरे कल्प युगल -सानत्कुमार, माहेन्द्र स्वर्ग में सौ योजन और इसके आगे प्रत्येक कल्प युगल तथा ग्रैवेयकोंके प्रत्येक त्रिकोंमें दश-दश योजन कम होती जाती है। अनुदिशों और अनुत्तरोंके चौदह विमानोंमें केवल पाँच योजन चौड़ाई रह जाती है ॥९४॥ प्रथम कल्प युगलमें भवनोंकी ऊंचाई छह सौ योजन है, दूसरे कल्प युगलमें पांच सौ योजन है और आगेके युगलोंमें पचास-पचास योजन ऊँचाई कम होती जाती है। इसके आगे अनुदिश और अनुत्तरोंके भवन मात्र पचीस योजन ऊँचे हैं ॥९५॥ प्रथम कल्प युगलमें भवनोंकी गहराई साठ योजन है, दूसरे कल्प युगलमें पचास योजन है और इसके आगेके कल्पोंमें पाँच-पाँच योजन कम होती जाती है। अनुदिश और अनुत्तर सम्बन्धी चौदह विमानोंमें मात्र ढाई योजन गहराई है ॥९६॥ सौधर्म और ऐशान स्वर्गके भवन काले, नीले, लाल, पीले और सफेदके भेदसे पाँच रंगके कहे गये हैं ॥९७॥ आगेके युगलसानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गमें नीलेको आदि लेकर चार रंगके हैं, उसके आगे चार स्वर्गों में लालको आदि लेकर तीन रंगके हैं, उसके आगे सहस्रार स्वर्ग तकके चार स्वर्गों में पीले और सफेद दो रंगके हैं अन्य रंगके नहीं हैं ॥९८॥ उसके आगे आनत-प्राणतको आदि लेकर समस्त स्वर्ग, ग्रैवेयक, अनुदिश तथा अनुत्तरविमानोंके भवन मात्र सफेद वर्ण के हैं। वैमानिक देवोंके ये भवन जगमगाती हुई प्रभासे युक्त हैं ।।९९।। सौधर्म और ऐशान स्वर्गके विमान घनोदधिके आधार हैं, सानत्कुमार और माहेन्द्र के विमान घनवातवलयके आधार हैं, आगे आठ कल्प अर्थात् सहस्रार स्वगं तकके विमान घनोदधि और घनवात दोनोंके आधार हैं और शेष विमान आकाशके आधार हैं ॥१००। छह युगलों तथा शेष कल्पोंमें अपने-अपने निवासके योग्य अन्तिम इन्द्रकके श्रेणीबद्ध १. सौधर्मयुग्मे ११२१, सानत्कुमारयुग्मे १०२२, ब्रह्मयुग्मे ९२३ इत्यादि नवनवतिहीनक्रमम् । २. १२० । ३. १००, ९०, ८०, ७०, ६०, ५०, ४०, ३०, २०, १०। ४. अनुदिशानुत्तरेषु । ५.५०० । ६. पञ्चाशदूनक्रमम् । ७. छज्जुगल सेसकप्पे अट्ठारसमम्हि सेढि वद्धम्मि । दोहीण कम दक्खिण उत्तर भागम्हि देविदा ।।४८३।।-त्रिलोकसारस्य । ८. चमरेन्द्रका: म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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