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________________ हरिवंशपुराणे - अनावृत्त प्रमुक्षो जम्बूद्वीपस्य रक्षकः । सुस्थितो लवणाम्मोधेरधिपः प्रतिपादितः ॥ ६३७॥ धातकीखण्डनाथौ तु प्रभासप्रियदर्शनौ । कालश्चापि महाकालः काकोदजलधीश्वरौ ॥ ६३८ ॥ पद्मश्च पुण्डरीकश्च पुष्करद्वीपनामेकौ । चतुष्मांश्च सुचक्षुश्च मानुषोत्तरशैलैपौ ॥६३९॥ श्रीप्रमश्रीवरौ नाथौ पुष्करोदस्य वारिधेः । वारुणीवरभूमीशौ वरुणो वरुणप्रभः ॥ ६४० ॥ वारुणीवरवार्धीशी मध्यमव्यमसंज्ञकौ । पाण्डुरः पुष्पदन्तश्च तौ क्षीरवरभूमिपौ ॥ ६४१ ॥ वार्षेः क्षीरवरस्येशौ विमलो विमलप्रभः । प्रभू घृतवरद्वीपे सुप्रमश्च महाप्रभः ॥ ६४२ ॥ कनकः कनकामश्च नाथौ घृतवरोदधेः । तथैवेक्षुरसद्वीपे पूर्ण पूर्ण प्रभौ सुरौ ॥ ६४३॥ देव गन्धमहागन्धौ नाथाविक्षुरसोदधेः । नन्दीश्वरवरद्वीपे नन्दिनन्दिप्रभौ तथा ॥ ६४४ ॥ प्रभू भद्रसुभद्रौ तु नन्दीश्वरवरोदधेः । अरुणद्वीपपौ देवावरुणश्चारुणप्रमः ॥ ६४५ ।। सुगन्ध सर्वगन्धाख्यावरुणाब्धेरधीश्वरौ । द्वौ द्वौ द्वीपाधिपावेवं परतो दक्षिणोत्तरौ ॥ ६४६ ॥ कोटोशतं त्रिषष्टप्रमशीतिश्वतुरुत्तराः । लक्षा नन्दीश्वरद्वीपो विस्तोर्णो वर्णितो जिनैः ।।६४७ ।। षट्त्रिंशच्च सहस्रं च कोटयो निर्युतानि च । द्वादशैव सहस्रे द्वे तथा सप्त शतानि च ।।६४८ ।। योजनानि त्रिपञ्चाशदान्तरः परिधिः स च । नदीश्वरवरद्वीपसंभवी परिभाषितः ।। ६४९॥ द्वारयुत्तरं कोटी सहस्रद्वितयं तथा । नियुतानि त्रयस्त्रिंशनवस्था सहितं शतम् ||६५० || पञ्चाशञ्च सहस्राणि चतुर्भिरधिकानि च । बहिः परिधिरेष स्यादष्टमद्वोपसंभवी ।। ६५१ ॥ मध्ये तस्य चतुर्दिक्षु चत्वारोऽञ्जनपर्वताः । तुङ्गाश्चतुरशीतिं ते व्यस्ताश्चाधः सहस्रगाः ।। ६५२॥ पटहा कृतयश्चित्रा वज्रमूलाः प्रमोज्ज्वलाः । भ्राजन्ते पर्वताः सर्वे सर्वतस्ते मनोहराः || ६५३ || सुकृष्णशिखराः शैलास्ते जाम्बूनदमूर्त्तयः । विकिरन्ति परां कान्ति दिङ्मुखेषु यथायथम् ||६५४|| गवा योजनलक्षाः स्युर्महादिक्षु महोभृताम् । चतस्रस्तु चतुष्कोणा वाप्यः प्रत्येकमक्षयाः ॥ ६५५॥ ११४ स्वयम्भूरमण समुद्रका अवशिष्ट भाग है ।। ६३५ - ६३६ ।। जम्बू द्वीपका रक्षक अनावृत्त यक्ष है, लवण समुद्रका स्वामी सुस्थित देव कहा गया है ||६३७॥ धातकीखण्डके स्वामी प्रभास और प्रियदर्शन, कालोदधिके काल और महाकाल, पुष्करवर द्वीपके पद्म और पुण्डरीक, मानुषोत्तर पर्वत के चक्षुष्मान् और सुचक्षु, पुष्करवरं समुद्रके श्रीप्रभ और श्रीधर, वारुणीवर द्वीपके वरुण और वरुणप्रभ, वाणीवर समुद्रके मध्य और मध्यम, क्षीरवर द्वीपके पाण्डुर और पुष्पदन्त, क्षोरवर समुद्र के विमल और विमलप्रभ, घृतवर द्वीपके सुप्रभ और महाप्रभ, घृतवर समुद्रके कनक और कनकाभ, इक्षुवर द्वीप पूर्ण और पूर्णप्रभ, इक्षुवर समुद्रके गन्ध और महागन्ध, नन्दीश्वर द्वीप के नन्दो और नन्दिप्रभ, नन्दीश्वर समुद्रके भद्र और सुभद्र, अरुण द्वीपके अरुण और अरुणप्रभ और अरुण समुद्रके सुगन्ध और सर्वगन्ध देव स्वामी हैं । इसी प्रकार आगे दो-दो देव स्वामी हैं । उनमें एक दक्षिणका ओर दूसरा उत्तरका स्वामा है ।।६३८-६४६ ॥ प्रत्येक द्वीप और सागरके जिनेन्द्र भगवान् ने आठवें नन्दीश्वर द्वीपका विस्तार एक सौ तिरेसठ करोड़ चौरासी लाख योजन कहा है || ६४७ || नन्दीश्वर द्वीपकी आभ्यन्तर परिधि एक हजार छत्तीस करोड़ बारह लाख दो हजार सात सौ योजन है तथा बाह्य परिधि दो हजार बहत्तर करोड़ तैंतीस लाख चौवन हजार एक सौ नबे योजन है || ६४८- ६५१ ।। नन्दीश्वर द्वीपके मध्य में चारों दिशाओंमें चार अंजनगिरि हैं । ये पर्वत चौरासी हजार योजन ऊंचे, उतने ही चौड़े और एक हजार योजन गहरे हैं || ६५२॥ ये सभी पर्वत ढोलके आकार हैं, चित्र-विचित्र हैं, वज्रमय मूलके धारक हैं, प्रभासे उज्ज्वल हैं और सब ओरसे मनको हरण करते हुए देदीप्यमान हैं || ६५३ || सुन्दर काले शिखरोंसे युक्त वे सुवर्णमयी पर्वत, दिशाओं में सब ओर उत्तम कान्ति बिखेरते रहते हैं || ६५४ || एक लाख योजन आगे चलकर १. नामको म. । २. शैलयोः म. । ३. लक्षाणि । ४. सहस्रं द्वितयं म । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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